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नवरात्र महोत्सव |Essay on Navaratra Festival in Hindi!

भारतीय हिंदू समाज में जितने पर्व और उत्सव मनाए जाते हैं, उनमें नवरात्र का विशिष्ट स्थान है । नवरात्र शक्ति की उपासना का पर्व है । शक्ति ही विश्व का सृजन करती है, शक्ति ही उसका संचालन करती है, शक्ति ही उसका संहार करती है ।

इस प्रकार शक्ति ही सबकुछ है । शक्ति ब्रह्मा की सक्रिय अवस्था है । ब्रह्मा की क्रिया का नाम ही शक्ति है । जिस प्रकार उष्णता अग्नि से सर्वथा अभिन्न है उसी प्रकार शक्ति से ब्रह्मा अभिन्न है । माया, महामाया आदि शक्ति कै पर्यायवाची हैं । महालक्ष्मी, महासरस्वती और महाकाली शक्ति के तीन व्यक्त स्वरूप हैं ।

नवरात्र पर्व पर शक्ति के इन्हीं व्यक्त स्वरूपों की उपासना की जाती है । हमारे देश में नवरात्र-पर्व वर्ष में दो वार मनाया जाता है । नवरात्र का पहला पर्व चैत्र मास में मनाया जाता है । इसका आरंभ चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होता है । हिंदू जन अपने-अपने घरों में कलश स्थापना कर दुर्गा-पाठ या तो स्वयं करते हैं या अपने कुल पुरोहित से करवाते हैं ।

वे आठ दिन फलाहार करते है । आठवें दिन दुर्गाष्टमी का पर्व मनाया जाता है । दुर्गा-पाठ के पश्चात् हवन आदि होना है । नौवें दिन रामनवमी मनाई जाती है । इसी तिथि पर भगवान् राम ने माता कौशल्या के गर्भ से जन्म लिया था । इस दिन भी लोग व्रत रखकर फलाहार करते हैं ।

नवरात्र का दूसरा पर्व आश्विन मास में मनाया जाता है । इसका आरंभ आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होता है । नवमी को दुर्गा-पाठ तथा हवन के पश्चात् इसका समापन होता है । यह उत्तर भारत में ही नहीं, गुजरात, बंगाल, महाराष्ट्र आदि राज्यों में बड़े हर्ष और उल्लास के साथ मनाया जाता है । आश्विन शरद् ऋतु का महीना है ।

शरद् ऋतु में प्रकृति की छटा दर्शनीय होती है । शक्ति की उपासना के लिए यह सर्वोत्तम समय होता है । इसलिए लोग शरद् की स्वच्छ चाँदनी में शक्तिवर्धक खेलों का आयोजन करते हैं । गुजरात में गरबा नृत्य का आयोजन नवरात्र पर्व का मुख्य आकर्षण है ।

रात होने पर चारों ओर से छेदवाले मिट्‌टी के मटके में घी का दीपक जला दिया जाता है और फिर गाँव के मुख्य चौक में उस मटके को ऊँचे स्थान पर रखकर उसके चारों ओर स्त्री-पुरुष एक साथ अथवा अलग-अलग नृत्य करते हैं; देवियों की स्तुति करते हैं और तालियाँ बजा-बजाकर अपना हर्ष-उल्लास प्रकट करते हैं । वे नौ दिनों तक व्रत रखते हैं और फलाहार करते हैं ।

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इन दिनों आवागढ़ पहाड़ पर स्थित कालिका माता तथा आबू पहाड़ पर स्थित अंबाजी माता के मंदिरों में उपासकों की विशेष चहल-पहल रहती है । महाराष्ट्र में भी यह पर्व घर-घर बड़ी श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है; परंतु बंगाल में यह पर्व जितनी धूमधाम से मनाया जाता है उतना भारत के अन्य किसी भी राज्य में नहीं मनाया जाता ।

बंगाली शक्ति के उपासक हैं, इसलिए आश्विन मास का नवरात्र उनका मुख्य पर्व है । यह दुर्गा-पूजा के नाम से प्रसिद्ध है । बंगाली लोग दशभुजी दुर्गा की पूजा करते हैं । दशभुजी दुर्गा की छोटी-बड़ी मूर्तियाँ प्रत्येक घर में ही नहीं, सार्वजनिक स्थानों में भी सजाई जाती हैं । माँ काली की स्तुति से बंगाल के गाँव और नगर गूँज उठते हैं ।

अनेक प्रकार के मनोरंजक कार्यक्रम आयोजित होते हैं और भजन-कीर्तन तथा विभिन्न प्रकार के वाद्यों के मधुर स्वर से सारा बंगाल निनादित हो उठता है । दिन-रात दर्शकों और उपासकों की भीड़ लगी रहती है । नए-नए रंग-बिरंगे वस्त्रों में बंगाली स्त्री-पुरुष तथा बाल-वृद्ध प्रफुल्लित दिखाई देते हैं । वे एक-दूसरे से मिलकर अपनी शुभकामनाएं प्रकट करते हैं ।

कोलकाता में स्थित महाकाली मंदिर की मनावट विशेष दर्शनीय होती है । श्रद्धालु बड़ी दूर-दूर से आकर महाकाली का दर्शन करते हैं । आठ दिनों नक प्रत्येक बंगाली दुर्गा-पूजा के कार्यक्रमों में इतना तन्मय रहता है कि उसे बाहरी दुनिया की कुछ खबर ही नहीं रहती । अष्टमी के दिन हवन होता है । दशमी के दिन दुर्गाजी की बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ बाजे-गाजे के साथ समारोहपूर्वक निकाली जाती हैं और पवित्र जल में उनका विसर्जन किया जाता है ।

नवरात्र का पर्व हमें सिखाता है- ‘प्रयत्न करो, पुरुषार्थ करो, परिश्रम करो, तप करो और तुम्हारे भीतर शक्ति का जो भंडार है, उसे खोल दो । तुम्हारे अंदर एक ऐसी शक्ति मौजूद है कि तुम उसकी सहायता से अपनी इच्छानुसार सबकुछ कर सकते हो ।

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