भारत का भूमण्डलीकरण  | Globalisation of India in Hindi!

प्रस्तावना:

अब ऐसी बातों में कुछ नहीं धरा है कि इतिहास गवाह है कि जब-जब हमारा देश कमजोर हुआ, विदेशी ताकतें हम पर हावी हो गईं । इतिहास की ऐतिहासिकता भले ही बनी रहे, आज की दुनिया में उससे सबक सीखने का विशेष महत्व नहीं है ।

आज की दुनिया संचालित हैं- भूमण्डलीकरण से, आसमान से परोसे जा रहे बहुरंगी सामान से और खुले बाजार में बेहतर किस्म की विदेशी उपभोक्ता सामग्री से । जिसका माल खरा, उसकी साख ।

चिन्तनात्मक विकास:

आज भूमण्डलीकरण के युग में, भारतीयता खतरे में पड़ गई है । चहुँ ओर आधुनिकता का स्वर गूँज रहा है । वास्तव में आधुनिकता क्या है इसका वास्तविक अर्थ कोई नहीं जानता । भूमण्डलीकरण के कारण देश के आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षिक क्षेत्र अत्यन्त कुप्रभावित हुये हैं । इसमें कोई संदेह नहीं कि आधुनिकता प्रगति की सूचक होती है किन्तु जब यही आधुनिकता देश के लिए खतरा बनने लगे तो उस पर प्रश्न चिन्ह लग जाते हैं ।

भूमण्डलीकरण की बदौलत नई तरक्की का सुख लूटे, नवीन संस्कृति की ओर अग्रसर हों, नई सुविधाओं का भोग करें, और उसके दुष्परिणामों को नहीं भुगतना पड़े ऐसा नहीं हो सकता । विश्व प्रतिस्पर्धा में स्वदेशी का डिंडोर पीटने से काम नहीं चलने वाला है । विदेशी माल का बहिष्कार और पश्चिमी जीवन शैली और मूल्यों का तिरस्कार करने के स्वदेशी मार्का आन्दोलनों में ज्यादा दम तभी होगा जबकि हम खुले बाजार में विदेशी उपभोक्ता माल से टक्कर ले सकें ।

अब जीवन और संस्कृति अधिक उपभोक्तावादी बनती चली जा रही है इसलिये नैतिक मूल्यों एवं संस्कारों में गिरावट भी आती जा रही है । आज हम उस आसमान के नीचे हैं जहाँ से सांस्कृतिक आक्रमण हो रहे हैं और उस बाजार में हैं जहाँ विदेशी ‘अतिक्रमण’, बेहतर विदेशी सामान चकाचौंध पैदा कर रहे हैं । अत: आसान नहीं है भूमण्डलीकरण से परहेज करना ।

उपसंहार:

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि भूमण्डलीकरण से विषमताएँ अधिक ही उत्पन्न हुई हैं और हो रही हैं । यदि विकासशील देश को विकसित देश बनने की दिशा में अग्रसर होना है तो निश्चय ही उसे भूमण्डलीकरण को भी साथ-साथ लेकर चलना होगा यह सच है कि इससे खतरे अधिक हैं किन्तु आज के युग में देश को पूर्वत: ‘स्वदेशी’ बनाने हेतु हम ‘गाँधीजी’ कहाँ से लायें । यह विसंगति ही है कि आज देश महापुरुषों से विहीन है ।

आज समूची दुनिया के समग्र व्यवहार को ‘भूमण्डलीकरण’ की संज्ञा से सम्बोधित किया जा रहा है । दरअसल सोवियत संघ के विघटन के पश्चात् अमरीका समेत विश्व के कुल चार-पाँच बड़े पूंजीवादी देश और भी शक्तिशाली हो गए हैं और वे समूची दुनिया के आर्थिक-सामाजिक विकास को नियन्त्रित करने लगे हैं ।

इस भूमण्डलीकरण के कारण अनेक आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक संस्थाओ के स्वरूप में बदलाव आ जाने का खतरा पैदा हो गया है । आज विकासशील देश विकसित देशों से कर्ज लेने के लिए बाध्य है । ये देश आर्थिक विकास की महत्वाकांक्षाएं रखते हुये भी अपनी आर्थिक स्वतन्त्रता बनाये रखने में सक्षम नहीं हैं । परिणामस्वरूप आर्थिक गुलामी का असर उन देशों की सामाजिक-आर्थिक संस्थाओं पर तो पड़ ही रहा है, इन देशों की शिक्षण संस्थाएं भी प्रभावित हो रही हैं ।

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इसलिए आज जरूरी यह है कि तथाकथित भूमण्डलीकरण यानी रेदार पूजी और देशी पूजी का जो गठबंधन है, उसे तोड़ा जाये । इसके बिना देश की प्रगति नहीं है । सिंगापुर में विश्व व्यापार संगठन की बैठक में अमरीका की शर्तो के अनुसार समझौता करके की सम्पमुता को गिरवी रख दिया गया है ।

देश की सैन्य एवं प्रौद्योगिक सम्प्रभुता पर इसका असर पडेगा । दुनिया भर में हर चीज सापेक्ष है । पूंजी का केन्द्रीयकरण अन्तत: मुनाफाखोर ही निगल जाता है । विकासशील देशों को स्वयं के शोषण से बचना होगा । इसका एकमात्र का यही है कि विश्व स्तर पर साम्राज्यवाद के विरुद्ध सुविचारित-सुसंगठित मोर्चा खोला जाये । मानवता को जीवित रखना है तो पूजीवाद का खात्मा तो करना ही होगा ।

दुनिया में पूंजीवाद उभार के लिए हमारा ढीलापन ही जिम्मेदार है । आने वाले समय में देश को उदारीकरण के नरे झेलने पडेंगे । उदारीकरण यही की मिश्रित अर्थव्यवस्था का उचित विकल्प नहीं है । आज के आम आदमी के परिश्रम से अर्जित धन का बहुत बड़ा हिस्सा विदेशों को चला जाता है । अपने समय में भारतेन्दु ने सब धन विदेश चलि जाति, इहे अति रबारी’ कहकर तथाकथित आजादी पोल खोल दी है ।

देश में पूंजी निवेश और अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तेज होने की वजह से निष्कर्ष निकालना मुनासिब होगा कि भविष्य में इसके मिश्रित परिणाम निकलने की सम्भावना । यदि पूंजी निवेश बढता गया तो उत्पादन की प्रक्रिया तेज होगी और रोजगार के नये अवसर पलब्ध होंगे ।

इसका सकारात्मक असर यह होगा कि मध्यवर्ग की आय में वृद्धि होगी । लेकिन । ध्यान रखना पड़ेगा कि इस विकास कै गर्म में कठिनाइयां, विरोधाभास और विसंगतियां भी त्तर्निहित है । इस दिशा मे हुए विकास के साथ-साथ संचार के साधनों-सडकें, परिवहन, बिजली से आधारभूत ढाचे में वृद्धि नहीं हो पा रही है । बढता पूंजी निवेश और पिछड़ती संचार-व्यवस्था बीच संतुलन कायम नहीं होने के कारण क्षेत्रीय असंतुलन बढ़ने का खतरा भी मंडरा रहा है ।

इस तरह सड़कें, परिवहन आदि ससाधनो में पर्याप्त विकास नहीं होने की वजह से पूंजी निवेश लाभ पिछडे क्षेत्रों को नहीं मिल पाएगा । परिणामस्वरूप पिछडे क्षेत्र पिछड़ते जाएंगे और विकसित क्रमश: विकसित होते चले जाएंगे । नगरी और ग्रामीण जीवन के बीच भी असंतुलन बढ रहा है । गरीब और अमीर के बीच की गाई और चौडी हो रही है ।

नगरीकरण की प्रक्रिया में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ रही है जो इसका रक्षा नहीं है । झुग्गी-झोंपडियों और गाव के लोग नगरों में आकर बस रहे हैं । परिणामस्वरूप, गरों के ससाधनों पर दबाव बढ रहा है । नगरों मे बिजली, पानी, मकान आदि बुनियादी घवश्यकताए कम पड़ती जा रही हैं ।

बाजारतंत्र के हावी होने से अमीर वर्ग के सेवा क्षेत्र गरीबों से अलग खड़े हो रहे हैं । अमीरों घेर गरीबों के लिए अलग-अलग अस्पताल और स्कूल खुल रहे हैं । आम जीवन में यह विरोधाभास घफ उभर रहा है । इसके कारण लोगो से भावात्मक विलगाव चौडा हो रहा है ।

जिस असंतुलित से बाजारतंत्र लागू हुआ हे वह हमारे लिए बडी चुनौती है । इसलिए महत्वपूर्ण सवाल यह कि सामाजिक संतुलन कैसे कायम किया जाये ? वस्तुत: मुक्त अर्थव्यवस्था या उदारीकरण का ध्येय मुनाफा कमाना है । निजी कंपनियां घाटे का कारोबार नहीं करती ।

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इसलिए सरकार को चाहिए कि वह सेवा क्षेत्रों को बाजारतंत्र के भरोसे न छोड़े । भारतीय गांव अनेक चुनौतियों से रूबरू हैं । इसकी मुख्य वजह यह है कि हमारी आबादी कृषि पर पूरी तरह निर्भर है । हम देख रहे हैं कि आबादी की बेतहाशा बढोतरी के चलते युवकों की सख्या कई गुना बढी है ।

इस अनुपात में गांवों में रोजगार के साधन काफी कम हैं । गांवों में गरीबों के प्रति सहानुभूति कम हो रही है । गांव की एक बडी आबादी शहरों की ओर पलायन कर रही है । गाँवों में जिस तरह का सामाजिक ताना-बाना बन रहा है उससे गाँव के कृषकों का गावों से मोहभंग हो रहा है । इस असलियत के बयान के साथ ही यह भी सच है कि हरित क्रांति ने विकास के अनेक प्रतिमान स्थापित किये हैं, लेकिन अब दूसरे चरण की हरित क्रांति की जरूरत से इकार नहीं किया जा सकता ।

गांवों के मध्य वर्ग का भी गांवों से मोहभंग हो रहा है । शहर का मजदूर वर्ग अपने बच्चो को जिस आय से पढा-लिखा रहा है उतनी आय से गांव का मध्यवर्गीय कृषक गांवों में ससाधन उपलब्ध करा पाता है, क्योंकि गांवों में पढाई-लिखाई, बिजली, पानी, अस्पताल जैसी बुनियादी आवश्यकताओं का अभाव रहता है ।

सवाल यह है कि इन समस्याओं एवं जटिलताओं का समाधान क्या है ? इसके निराकरण के लिए कृषि पर आधारित उद्योगों का विकास किया जाना चाहिए । कृषि और उद्योग को सामंजस्यपूर्ण ढंग से जोड़ा जाये । मौजूदा सच यह है कि कृषि में निवेश कम हो रहा है, उत्पादन गिरता जा रहा है, हमारी तकनीक पुरानी पड़ गयी है । गांवो का जीवन-स्तर उठाने के लिए ग्रामीण आबदिा को गांवों के आस-पास ही रोजगार उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए ।

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यह कहना उचित नहीं है कि गांवो में कृषि पर आधारित उद्योगों का विकास नहीं हुआ है पर सच्चाई यह है कि इसकी प्रक्रिया बहुत धीमी है । एक सर्वेक्षण के मुताबिक हमारे देश में साठ के दशक में दस से पन्द्रह प्रतिशत ही गैर-कृषि सेवाएं थी जो अब बढ़कर बीस से पच्चीस प्रतिशत हो गयी हैं ।

सड़कों के किनारे स्थ्ति कस्त्रों और शहरों में ढाबे, मोटर पार्टस आदि दुकानें खुली हैं । परन्तु इस प्रक्रिया को और तेज करना होगा, ताकि गांवों का कृषक शहर की ओर पलाशन न करे । मौजूदा परिवर्तन इस बात पर निर्भर करेगा कि हम किस दिशा में चल रहे हैं ।

आधुनिकीकरण के इस दौर में हो रहे परिवर्तन को सफल बनाने के लिए यह जरूरी है कि शिक्षा का व्यापक प्रसार हो । शिक्षा से ही आरक्षण का लाभ मिल पाएगा । लड़कियों की शिक्षा से परिवार नियोजन को प्रोत्साहन मिलेगा और इससे विकास को शी गति मिलेगी ।

बाजारतंत्र ने हमारी मूल संस्कृति पर भी हमला बोला है । उदारीकरण से पलायनवाद और नव-उपनिवेशवाद का संकट बढता है । इसलिए जरूरी है कि हम संचार माध्यमों को सही दिशा दें, ताकि विरोधाभास कम हो सके । मुनाफाखोरी, नव-उपनिवेशवाद, पलायनवाद की जो प्रक्रिया शुरू हो रही है उसमें भी सतुलन बनाने की जरूरत है ।

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आज स्वदेशीकरण का जो तर्क दिया जा रहा ? उससे हम सभी सहमत है, मगर स्वदेशीकरण का तात्पर्य केवल खद्दर पहन लेना ही नहीं है । हमें अपने ही धन, श्रम एवं तकनीकी क्षमता को विकसित करने के साथ पूर्णरूपेण आत्मनिर्भर होना पड़ेगा ।

फिलहाल ‘स्वदेशी’ के नारे को उछालने वालों के चरित्र को समझना होगा, क्योंकि यह लोग स्वदेशी की बात करते हैं और चुपके से एनरॉन को ठेका भी दे देते हैं । हमारा सीधा लक्ष्य फिलहाल देशी पूंजीवाद को बढ़ावा देना होना चाहिए ताकि देश की प्रगति हो और समाजवाद के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ तैयार हों ।

यदि हसानों, मजदूरों एवं शिक्षित मध्य वर्ग के जरिये यह आदोलन चले तो सार्थक परिणाम निकल सकते हैं । जहां तक विदेशी प्रिंट मीडिया को अनुमति देने का मुद्दा है तो निश्चित रूप से यह आत्मघाती कदम होगा । भारतीय प्रेस और यहां का जनमानस इस स्थिति में नहीं है कि वह विदेशी प्रिंट के आने से उत्पन्न होने वाली परेशानी का मुकाबला कर सके ।

यह सांस्कृतिक मूल्यहीनता भयावह संकट को आमंत्रण देना है । भारतीय प्रेस को अपनी चेतना तथा सामाजिक स्थिति मजबूत बनानी चाहिए । हमारे सामने अपसंस्कृति का ही सवाल नहीं है- आर्थिक, सामाजिक सभी आयामों पर इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा । यही वह महत्वपूर्ण बिंदु है, जिस पर बुद्धिजीबियों को सर्वाधिक सतर्क एवं सचेत होने की आवश्यकता है ।

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आज विद्वतगण उपभोक्ता संस्कृति, उदारीकरण की एवं अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी पर तो काफी बहसें कर रहे हैं, पर उन्हें यह ध्यान भी रखना होगा कि अभी देश की एक बहुत बडी आबादी मप्र’ सोच की जकडुबन्दी से बाहर नहीं निकल पायी है, भले ही हमारे यहां पृथ्वी-अग्नि स्टाइलों को हासिल करने की क्षमता या सुपर कम्प्यूटरीकरण की वकालत होती हो । यह संगतिपूर्ण स्थिति है ।

हमें ध्यान देना चाहिए कि अंग्रेजों ने सामंतवाद के जरिये ही हमारे सामाजिक छ पर पकड़ बनायी थी । दुनिया के जिन मुल्कों में जनवादी क्रांतियां हुईं, अमरीका ने सबसे षड्‌यंत्र रचकर उस क्रांति को असफल किया ।

क्यूबा, वियतनाम और चीन के इतिहास इस के पुख्ता गवाह हैं । आज भी कट्टरवार के गढ अमरीका व उसके मित्र सउदी अरब वगैरह है । इन देशों ने अफगानिस्तान से सोवियत फौजें भगाने के लिए ईरान से सेनाएं मंगायी । असल नकाब ओढे कट्टरपंथियों का एक चेहरा अब तालिबान के रूप में खुल बुझा है ।

साम्राज्यवाद से मुकाबला करने के लिए हमें वर्ग संघर्ष को समझना होगा । क्या आप उच्च, श्रम, पूंजीपति या धनी वर्ग से बाहर निकलकर कोई नया वर्ग तलाश कर सकते हैं ? नये वर्ग न्व्हेत्च कायम करना नयी पीढ़ी के लिए मुख्य चुनौती है ।

हमें उन लोगों से सावधान रहना जो कुछ समय से ‘विचारधारा के अंत का शोर मचाये हुये हैं । दरअसल यह दुष्प्रचार है प्रतिगामी शक्तियों को कमजोर करने के लिए की जा रही साजिश मात्र है । सच्चाई यह है जब तक जीवन रहेगा, तब तक विचार जीवित रहेगा । सवाल अपनी पक्षधरता-प्रतिबद्धता का । होता है ।

विद्वतगणों की एक और चिंता बनी हुई है और वह है हिन्दी यानी मातृभाषा का संकट । हमें ध्यान रखना चाहिए कि भाषा का विकास जीवन के आधारभूत निर्णायक व्यवहार पर निर्भर है । अंग्रेजी मूलत: मिडलैंड के आसपास की भाषा थी ।

व्यापार के चलते मिडलैंड एक बड़ा केन्द्र बना और कुछ ही समय में अंग्रेजी पूरे इंग्लैंड की भाषा बन गयी । हमारे यहा शासन-प्रशासन अन्य समितियां विश्वविद्यालयों में हिन्दी भाषा मे शिक्षण दिये जाने की घोषणा करते हैं, मगर व्यवहार में स्वयं इसका पालन नहीं करते ।

हिन्दी के प्रसार के लिए उसे आजीविका से जुड़े व्यवहार ले जाना होगा । मामला सत्ता के चरित्र से भी जुड़ा हुआ है । निजत्वबोध की रहनुमाई ही देश की भाषा, संस्कृति एवं बोलियों को विकास के आयाम दे सकती है, न कि साम्राज्यवादियों अनुगामी ।

हमारे आसपास के लोग विश्वविद्यालयों से हिन्दी भाषा में उच्च शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों में प्रतिक्रियावाद पनपने की शिकायत करते हैं । दरअसल यह विषय से अधिक वैचारिक दृष्टिबोध का सवाल है । अंग्रेजी में और भी गहरा प्रतिक्रियावाद है ।

प्रतिक्रियावादी तो सबसे पहले वह शासक वर्ग है, जो हिन्दी के उत्थान की गुहार लगाता है और आचरण में अग्रेजी के अलम्बरदार और चाटुकार की भूमिका में है । राजनीतिक चेतना इस समस्या को हल कर सकती है । विदेशी मीडिया तो हिन्दी के लिए संकट ही पैदा करेगा ।

हमें अत्याधुनिकता के व्यामोह मे फंसे उस कठमुल्लावाद से भी निपटना होगा जो भारतीय पौराणिक या अध्यात्मवाद को मात्र परलोकोन्मुखी कहकर नकार देते हैं । सच यही है कि ऋषियों की चिन्तन पद्धति में कहीं भी खामी नहीं थी । ब्रह्मसत्यम् जगत्‌मिथ्या का उद्‌घोष करने वाले शंकराचार्य तक ने सत्य को दो कोटियों में विभाजित किया था-परमार्थ का सत्य और लोक का सत्य । परमार्थ सत्य निरपेक्ष और लोकसत्य सापेक्ष रूप में सत्य है ।

दरअसल जब भारत में अंग्रेजी राज कायम हुआ तो अंग्रेजों ने कई धर्म प्रचारकों से प्रचारित करवाया कि भारत की सत्ता तो अध्यात्मवाद ही है । सामाजिक प्रगति-दुर्गति या राजनीतिक घटनाक्रमों का व्यामोह व चिंता क्षणिक दुनियादारी है ।

प्रकृति के रहस्यों-शक्तियों को ही चिन्तन का विषय बनाना चाहिए । इस तरह अंग्रेज भारतीयों का ध्यान रहस्यवाद की ओर झोंककर खुद यहां की सत्ता पर काबिज रहने का षड्‌यंत्र करते रहे । उनके लिए यही हितकारी भी था । हमें अपने मध्ययुगीन साहित्य में से प्रगतिशीलता की राह बनानी चाहिए ।

सवाल यथार्थवाद का भी है । सूरदास ने बृज, तुलसी ने अवध एवं विद्यापति ने मिथिला का भरपूर चित्रण कर यथार्थ का अवगाहन किया है । नृत्य, संगीत एवं उल्लास की ऊंचाइयों से भरे मीराबाई के भजन यानी उस समय के प्रगतिशील हिन्दी लोकगीत आज हिन्दी प्रदेश में ही नहीं, महाराष्ट्र एवं बंगाल तक में गाये जाते हैं ।

लोकभाषा के इस सांस्कृतिक उत्थान एवं धरोहर को समझने की जरूरत है । आज हम पाते हैं कि उत्तर आधुनिकतावादियों का भविष्य पूरी तरह संकटग्रस्त है । इन महानुभावों को पहले ‘आधुनिकता’ को ही सही रूप से समझने एवं परिभाषित करने की कोशिश करनी चाहिए, बाद में उत्तर आधुनिकता की चिंता ओढनी चाहिए ।

दरअसल ये सब चोंचले हैं जो पूंजीवादी व्यवस्था को बनाये रखने के लिए गढे गये हैं । हमें यह देखना चाहिए कि उत्तर आधुनिकतावादी लोग एवं पूंजीवाद के समर्थक अमरीका के पक्ष में खड़े हैं या उसके विरोध में । इधर, कुछ ज्यादा प्रगतिशील लोग मार्क्सवाद एवं समाजवाद को अप्रासंगिक तथा विश्व को एकलध्रुवीय कहने लगे है ।

उन्होंने विश्व को एक ध्रुवीय न रहने देने की बात कही है । चीन और रूस से इतर जाकर इस विषय पर ध्यान दें, तो स्पष्ट होता है कि जर्मनी व जापान भला कब अमरीका के अनुयायी बनें । इनमें परस्पर जबरदस्त तनाव बना हुआ है । हां, एटम बम के मसले पर जरूर ये शक्तियां एकध्रुवीय हैं ।

लेकिन जहां तक पूंजी के केन्द्रीकरण एवं मुनाफे का सवाल है, इनके रास्ते भिन्न-भिन्न हैं । बाजार और पूंजी को लेकर विकासमान राष्ट्रों के भी अपने अंतर्विरोध हें । इसलिए विश्व कभी एकलध्रुवीय नहीं रह सकता ।

हां, यहां यह स्पष्ट करना भी समीचीन है कि आज मार्क्सवाद की अप्रासंगिकता का ढोल पीटने वाले देश रूस, चीन की वर्तमान स्थितियों का खुलासा बडी चालाकी से करते हैं, यह सच है कि रूस में भुखमरी, वेश्यावृति, लूटपाट जैसे अनेक किस्म के अपराधों का बोलबाला है, लेकिन पूंजी देश अपने यहां की वेश्यावृत्ति और अपराधों की संख्या में आयी बेशुमार वृद्धि ।

‘टाइम’ जैसी अमरीकी पत्रिकाएं इन नकारात्मक कृत्यों को उभारने में सशक्त रही हैं । परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि अमरीका में काले लोगों के गिरजाघर गोरे लोग धर्म एक होने के बावजूद नस्तवाद की घृणा का ही यह परिणाम है । उधर, उत्तरी गोरे ईसाई प्रोटेस्टेंट कैथोलिक ईसाईयों के चर्च में आग लगा रहे हैं । रूस में ऐसा हुआ ।

ऐसी नौबत ब्रिटेन, आयरलैण्ड एवं अमरीका में ही आयी है । अब वे हमें भी है कि हिन्दू-मुस्लिम दंगे हों और एक-दूसरे के घर साम्प्रदायिक उन्माद की बलि नियन्त्रण प्रगतिशील स्वदेशी परिकल्पनाओं के आधार पर होना चाहिए, न किडि विकास के मॉडल पर । अब कुछ लोग जिरह करने लगे हैं कि गांधीवाद सचमुच गया है ।

नयी आर्थिक नीति के परिणामों को देखने के बाद अब पुन: गाधीवादी (स्वदेशी उद्योग) की बात की जाने लगी है । गांधीवाद को लेकर अधिकतर है कि गांधीजी ने स्वतंत्र एवं सुसंगत ढंग से स्वदेशी आदोलन को कारगर । गांधीजी ने बार-बार ‘ट्रस्टीशिप का तर्क दिया, यानी जमींदारी खत्म करनी हो म्मं खत्म करो और पूंजीवाद खत्म करना हो तो पूंजीपति ट्रस्टी ।

इसका नतीजा पूंजीपति भी भारत में आकर ट्रस्टी बन गया । वैसे तो ट्रस्टीशिप का सिद्धांत यह अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना है, मगर दूसरी ओर विदेशी पूंजीपति को ट्रस्टी बनाकर का गला ही घोंट देने का मौका देते हैं । इसलिए गांधीवाद में जहां तक पूंजीवाद है, तो उससे सच्चे देशभक्त ही सहमत हैं और यही देशभक्त स्वदेशी आन्दोलन हैं लेकिन यदि गांधीवाद एव पूंजीवाद में समझौता करने की बात आती है तो हो जाता है ।

परन्तु यदि हम यह कहें कि हम विश्व बैंक से कर्ज नहीं लेंगे और स्वयं खड़े होंगे तो यह भी सम्मव नहीं है क्योंकि ऐसा करना होगा-अपना वर्तमान देना । विश्व बैंक से कर्ज लेना एवं पूंजीवाद का हित साधना ऐसे प्रश्न हैं, जहां हम सभी को सतर्क रहने की जरूरत है ।

कहना गलत नहीं होगा कि आने वाले समय में भारत की तस्वीर बहुत ही भयावह और चुनौतीपूर्ण होगी । भयावह इसलिए कि देश में फिर से विदेशियों का कारोबार जमना उनको हस्तक्षेप करने तक पहुंचाएगा । स्वदेशी सोच, हमारी असामयिक लकवाग्रस्त करने वाली गयी है । भारतीय राजनीति में गहराई से बैठे अवसरवाद एवं क्षेत्रीयतावाद उलड उनको भरपूर लाभ का मौका देगी । देश में सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक एवं राजनीतिक मूल्यहीनता की स्थिति दिनोंदिन घटाटोप बनती जा रही है ।

इसके लिए शासक ज्यादा जिम्मेदार हैं । पश्चिम पूर्व की ओर बढ़ रहा है । वहां नैतिक आधार तो पहले जा चुका था । धन-अर्जन ही उनका उद्देश्य था । आपराधिक वृत्ति उनका मानव था । भारत ने भी उदारीकरण की ओर अपना कदम बढाया और विकेन्द्रीकरण की ओं की ठानी ।

परन्तु यहां, यह तो अच्छा हुआ कि, ‘सिर मुंडाते ही ओला पड़ गया’ । बल 3-4 वर्षों के अंतराल में ही विभिन्न आर्थिक घोटालों का ढेर लग गया । शायद हम रसातल जाने से बच जायें । इस चुनौतीपूर्ण स्थिति में अब वक्त गंवाने का समय नहीं है ।

आज साम्राज्यवाद के षड्‌यन्त्र को समझने और उससे मुकाबला करने की ताकत मिलने की जरूरत है । नयी पीढी को अपने देश के क्रांतिकारी इतिहास से सबक एवं दिशा लेनी चाहिए । कमी भगत सिह ने नौजवान भारत सभा के जरिये तथा कई अन्य प्रगतिशील संगठनों ने साम्राज्यवादियों के खिलाफ जेहाद छेड़ा था ।

कर्नाटक में अमरीकी प्रतिष्ठानों के खिलाफ चलाया गया आदोलन भी काफी कारगर रहा था । ऐसा ही कुछ अब भी किये जाने की सख्त जरूरत है । नगर-नगर, ग्राम-ग्राम का एक ही उद्देश्य हो कि विदेशी माल यहां नहीं बिकना है ।

विदेशी पूंजी यहां नहीं आने देनी है । हमें अपने देश की ही पूजी, श्रम एवं प्रतिभा में अपने लिए वस्तुएं पैदा करनी होंगी, विकास के नये आयाम छूने होंगे तथा क्रांतिकारियों की राह पर चलना होगा और हां, जहां तक साम्यवाद के पुनर्जागरण का सवाल है तो दुनिया में आज मुख्य समस्या साम्यवाद या समाजवाद नहीं है ।

हमारी मूल समस्या या चुनौती है यहां का औद्योगिक विकास । मौजूदा वक्त सामंती अवशेषों से बाहर निकलने का है तथा जनवादी क्राति का है । आज हमें एक नये लोकवादी तंत्र की आवश्यकता है । वस्तुत: कहा जा सकता है कि हमारे देश में भूमण्डलीकरण और क्षेत्रीय उमारों के बीच भारतीयता सकट में पड़ गई है ।

भारतीयता को अब पिछडापन माना जाता है अथवा एक घायल स्वप्न । भारतीय समाज की पुरातन दरारें अभी भर ही रही थीं और भारतीय राष्ट्रीयता अपना आषुनिक आकार ले ही रही थी कि संकीर्ण अवधारणाओं का व्यापक रूप से हमला हुआ । इसका नतीजा राजनैतिक खग्लास के रूप में सबके सामने हैं-भरी दोपहर में अंधेरा ।

कहा जा सकता है कि इस दुखद नतीजे के लिए जिम्मेदार वे लोग हैं, जो अपने को राष्ट्रीय एकता और विकास का ध्वजवाहक कहते है । फिलहाल भूमंडलीकरण और क्षेत्रीयता की जीत को अंतिम जीत और भारतीयता की हार को अंतिम हार न भी माना जाए, लेकिन यह स्पष्ट होता जा रहा है कि राजसत्ता तक पहुंचने के रास्ते तेजी से बदल रहे हैं ।

अब सांप्रदतयिक-जातिवादी संकीर्णता और क्षेत्रीयता के दरवाजे ही बचे हैं, जो सत्ता की ओर खुलते हैं । फलत: आज का आदमी सीधे ‘भूमंडलीय’ है या ‘स्थानीय’ । वह बहुराष्ट्रीय है या हिंदू-मुसलमान-सिख, ब्राह्मण-क्षत्रिय-यादव- दलित, तमिल-मराठी-कश्मीरी । सत्ता का कुक्कुट-संघर्ष जितना तेज हो रहा हंऐ, भारतीयता उतनी विलुप्त हो रही है ।

हमारे समाज मे भारतीयता पहली बार तिरस्कृत नहीं हो रही है और संकीर्णताएं पहली बार पुरस्कृत नहीं हो रही है । सकीर्णताओ, अंतर्कलह और भोगवाद का भारतीय इतिहास हजारों साल पुराना है । भारत अब तक किसी पुराने बर्बर देश-साही एक कबीलाई देश होता, यदि बीच-बीच में यहां आदर्शवादी प्रतिध्रुव नहीं बने होते ।

यदि कर्मकांडी को चुनौती देकर आध्यात्मिक अखंडता के वैदिक स्वर नहीं गूजे होते, जैन-बौद्ध धर्म नहीं आते, दार्शनिक बहसें नहीं होतीं, शंकर और रामानंद नहीं आते, भक्ति आदोलन नहीं फैला होता, या नवजागरण और श्रमिक जागरण के सूर्य न उगे होते, तो हमारा देश आज भी भीषण संकीर्णताओं, अंतर्कलह और भोगवाद पर टिका एक बर्बर उपमहाद्वीप भर होता ।

उपर्युक्त प्रतिध्रुव हमारे इतिहास में ‘मध्यांतर’ की तरह आए और तुरंत दबोच लिए गऐ । क्या भारतीयता, भारतीय राष्ट्रीयता की मिश्रित संस्कृति को एक वैसा ही मध्यातर माना जाए भारतीय समाज की सबसे बडी विडबना यह है कि यहां के लोगों में ‘दूसरे’ के अस्तित्व का सामान्य जनतांत्रिक भाव न पनप सका ।

यहां हर आदमी अपने से कमजोर दमनात्मक रुख रखता है । सिर्फ अमीर ही गरीब को नहीं, एक गरीब भी अपने से ज्यादा को, एक औरत अपने से कमजोर औरत को, एक पिछड़ी जाति का आदमी अपने से ज्यादा को या हर बड़ा अपने से छोटे को गाहे-बगाहे दबाता-सताता रहता है ।

वह एक भी मौका नहीं चाहता । हमारे देश मे फासिक्य का मुख्य आधार दमन की इसी सर्वग्रासी आकांक्षा । यह अचंभे में डालने वाली बात है कि इतने अद्वैतवाद, संतों के उपदेश, भक्तों की वाणी, सेवा और जन-आदोलन चले, फिर भी नदियां की नदियां भाप बनकर उड गईं ।

समाज में ‘दूसरे’ के अस्तित्व को आदर देने और सहने की सामान्य जनतांत्रिक चेतना इतनी डि अवस्था में होगी, उस समाज में राष्ट्रीयता का भाव भी लकवाग्रस्त होगा और, जिस में राष्ट्रीयता लकवाग्रस्त होगी, उस समाज को साम्राज्यवाद और सामंती संकीर्णताओं के बार-बार आहत करेंगे ।

क्या भारतीयता की रचना में राजसत्ता का कोई वास्तविक योगदान कभी था ? साम्राज्य-विस्तार व प्राचीन स्वप्नों से लेकर समसामयिक विज्ञापन-संसार के आधुनिक मिथकों तक भारतीयता अजन्मे शिशु की निश्छल छटपटाहट रही है ।

बल्कि राजसत्ता की भूख भारतवर्ष और भारतीयता में हमेशा बाधक बनी । भारत को जाना था वैदिक साहित्य की रचना करने वालों ने । और कौरवों ने नहीं जाना था, वेदव्यास ने जाना था भारतवर्ष को । उनकी काव्यमयी आखों कर विविधताओं से भरी एक भू-सांस्कृतिक इकाई है, जहां गंगा, सिंधु, सरस्वती, गोदावरी, वितस्ता, सरयू, गोमती, कावेरी आदि नदियां बहती हैं ।

वेदव्यास ने महाभारत में जातीय और संघर्ष की जगह पारिवारिक अतर्कलह की कथा उपस्थित की । ‘विष्णु पुराण’ दूं कहा है भारतवर्ष समुद्र के उत्तर और हिमालय के दक्षिण में है । वहां के लोग भारती अर्थात् की सतान हैं । फाहियान और हेनसाग असे विदेशी यात्रियो ने भी जाना था भारत को । वे यात्री गांधार, तक्षशिला, मगध, कौशल, अवंती, कोकण या आध्र नहीं आए थे, वे भारतवर्ष में आए थे ।

(399-411 ई.) बौद्ध धर्म और भारतीय संस्कृति को जानने में इतना खो गया कि वह अपने यात्रा-वृत्तांत में चंद्रगुप्त द्वितीय का कहीं नाम तक नहीं लेता, जिसके राज्य में वह आया ऋषि, कवि, दार्शनिक, यात्री, भक्त, संत, सुधारवादी, स्वाधीनता-सेनानी ही तो थे, जिन्होने भारतीयता को रचा, पनपाया और उसकी अर्थ-चेतना का विस्तार किया, अन्यथा अपने लघु राज्य साम्राज्य से बंधे शासक और जमीनों से बंधे सामंतों मे भारतवर्ष के गहन सौंदर्य को महसूस की नैतिक शक्ति कहां थी ?

भारत को जानने वालों में थे उस लोक संस्कृति में रचे-बसे लोग, जिसे ज्ञान की पश्चिमी दुनिया में उपेक्षा रहे स्वडाल्टर्न कल्वर (निम्नवर्गीय संस्कृति या लोक संस्कृति) कहा जाता है । लोक संस्कृति में रचे-बसे लोग अपने अभात और अधूरेपन के बीच भी आकांक्षाओं से भरे होते हैं ।

लोक संस्कृति के पुराने केंद्र ग्राम समाज थे । इसमे दो तरह के लोग थे- स्थिर और भ्रमणशील । ग्राम के भ्रमणशील लोग बाजार, नगर, तीर्थ आया-जाया करते थे । उनका मन बाहरी दुनिया खुला होता था । वे स्थिर ग्रामवासियो और दूसरी जातियों के बीच सेतु थे ।

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ग्राम समाज के लोगों में राजसत्ता वर्ग के प्रति समर्पण और विरोध दोनों तरह के भाव होते थे । विरोध का ही साधारण लोक और इससे जुडे भ्रमणशील भक्तों, चिंतकों, कलाकारों और श्रमजीवियों राजसत्ता के संकीर्ण दमनमूलक दृष्टिकोण के पार देखने की प्रेरणा देता था ।

यही वजह 6 लोक संस्कृति के बीच से आए बुद्धिजीवियों ने राजसत्ता की प्रचलित संकीर्णतावादी धारणाओं परवाह न कर हमेशा एक उच्चतर भावधारा और मूल्य दृष्टि दी, जबकि सत्ता वर्ग ने अपने के लिए अक्सर संस्कृति पर फूहडता लादी, पृथकतावाद बढाया और लोगों की बौद्धिक चेतना कुंठित करके अपारदर्शी बनाने की कोशिश की ।

भारतीय जातियों की सह-अस्तित्व की भावना ने प्राचीन काल से ही किसी किस्म के अंध-द्रवाद और अलगाववाद के सामाजिक विस्तार को अवसर नहीं दिया । सत्ता के जो भी खेल साधारण लोक हमेशा साझा-जीवन, साझा-संस्कृति लेकर चला ।

इसने जीवन के सत्य को गधारी वर्ग के नजरिए से नहीं देखा इसलिए राजसत्ता की धर्म, राष्ट्र और क्षेत्रीय अस्मिता की में भले कूपमंडूकता, अंध-राष्ट्रवाद और अलगाववाद के बीज न हों, लोक संस्कृति के पक्ष अथवा इससे जुड़ कर जब भी कोई व्याख्या आई तो उसमें हमेशा एक उच्चतर विवेकपरकता, रतीयता और मानवतावादी विश्व दृष्टि रही है ।

इसलिए धर्म, जाति या राष्ट्र की व्याख्याओं को समय हमें सावधानीपूर्वक देखना होगा कि वे निरंकुश राजसत्ताओं के संदर्भ में हैं या सामान्य के संदर्भ में । सबाल्टर्न की ओर झुके अशोक, हर्षवर्द्धन, अकबर और नेहरू जैसे सत्ताधारी पक्ति इस देश के निरंकुश राजाओ, बादशाहों और आधुनिक मंत्रियों से इसी अर्थ में भिन्न थे कि उन्होंने कभी कूपमंडूकता, अंध-राष्ट्रवाद और अलगाववाद को उत्तेजित नहीं किया, जो स्वेछाचारी शासन के लिए जरूरी होते हैं ।

यह सवाल अवश्य महत्वपूर्ण है कि भारतीय सबाल्टर्न क्या भूमंडलीकरण और हहुराष्ट्रीय रुपनियों के फैलते तिलिस्म से अब तक इतना अप्रभावित बचा है कि संकीर्णताओं और पृथकतावाद का प्रतिरोध कर सके ? क्या वह साझा-जीवन, साझा-संस्कृति के परंपरागत भारतीय आदर्श को पुनर्स्थापित कर सकेगा ? वर्तमान गांवों में पुराने अंधविश्वासों और रूढियों के अलावा फूहडता, कलह और हिंसा की जो नई व्याधियां फैली हैं और टीवी लोगों को जैसी अबौद्धिक खुराक दे रहा है, उसमें क्या कहीं से उम्मीद की जा सकती है कि भारतीय सबाल्टर्न भारतीयता, भारतीय राष्ट्रीयता और साझा-जीवन, साझा-संस्कृति का पुनर्निर्माण करेगा ?

भारतीय सबाल्टर्न की शक्ति का सबसे बडा प्रमाण है, कि यह गांवों में ही नहीं, शहरों, महानगरो में भी अपनी हजारों साल की सांस्कृतिक विरासत के साथ मौजूद है । भारतीय लोक में सत्ता वर्ग के प्रति समर्पण का एक भाव हो सकता है, लेकिन उसमें प्रतिरोध शक्ति खत्म नहीं हुई है, जो उसे सत्ताधारी वर्ग के दृष्टिकोण के पार उस चेतना की ओर ले जाती है जिसकी जड़ें भारतीय नवजागरण और स्वाधीनता आदोलन में ही नहीं, वैदिक साहित्य और जैन, बौद्ध धर्मो से लेकर भक्ति आदोलन तक फैली हैं ।

भारतीय सभ्यता दुनिया में अनोखी है । इसकी बुनियादी संरचना की तीन मुख्य खूबिया हैं । यहा हर धर्म, जाति और क्षेत्र के लोगों की कुछ मामलो में अपनी विशिष्ट पहचान है जो भारतीयता की स्थानीयता का आयाम है । बाकी, मामलों में वे सामान्य सर्वभारतीय चेतना से जुडे हैं ।

पुन: कुछ मामलों में भारत के निवासियों का परिप्रेक्ष्य वैश्विक है जो निश्चय ही इधर प्रचलित भूमंडलीकरण सामाजिक से एक भिन्न मामला है । स्थानीयता, सामान्य सर्वभारतीय चेतना और विश्वबोध ये भारतीय त्रिआयाम है । इन्हें भारतीयता और भारतीय मानस का बौद्धिक त्रिभुज कहा जा सकता है । आधुनिक भारत का भविष्य इसी अनोखे त्रिभुज की रक्षा पर निर्भर करता है ।

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किसी जाति या समुदाय का कोई कोण कभी बहुत ऊचा और कोई कोण कभी बहुत नीचा हो सकता है लेकिन उपर्युक्त बौद्धिक त्रिभुज के बिना भारत का हर आदमी अधूरा है । भारतीय त्रिआयाम के किसी भी आयाम के टूटने या लडखडाने से भारतीयता पर संकट छाता है । इसलिए स्थानीयता, सर्वभारतीयता ओर वैश्विकता के रिश्ते को बार-बार जांचने की जरूरत है ।

खासकर सामान्य सर्वभारतीय चेतना का जितनी आत्माहुतियों के बाद विकास हुआ है, जब उतने ही अधःपतन के साथ उसका दुरुपयोग होने लगे, केंद्र एक प्रहसन बन जाए, तब विश्वबोध का भूमंडलीकरण मे और स्थानीय विशिष्टता का स्थानीय या क्षेत्रीय महत्वकांक्षाओं में रूपांतरण स्वाभाविक है ।

कुछ चिंतक कहते है कि उग्र स्थानीयता दरअसल भूमंडलीकरण का जवाब है । सांप्रदायिक रुझानो के कारण भारतीय इतिहास को हिंदू इतिहास में सीमित करने की कोशिश, जातिवाद, उप-सस्कृतियो और उपभाषाओं के प्रति बढ़ा आकर्षण और क्षेत्रीय दलों की बढती संख्या को जडों की ओर वापसी कहा जाता है ।

वास्तविकता यह है कि ये परिघटनाएं न भूमंडलीकरण की सही प्रतिक्रिया हैं और न सही जड़ों की ओर वापसी । भूमंडलीकरण और उग्र स्थानीय महत्वाकांक्षाओं के बीच कोई तनाव नहीं है बल्कि इनके रिश्ते को कहा जा सकता है, जुगलबंदी ।

भूमंडलीकरण और स्थानीयता के विभिन्न उपकरणों-संप्रदायवाद, जातिवाद या उग्र क्षेत्रीय अस्मिता की जुगलबंदी का लक्ष्य सामान्य सर्वभारतीय चेतना को कमजोर करना और भारत के लोगों को लगातार संकीर्णता की ओर धकेलना ही नहीं है, बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद और घरेलू उपनिवेशवाद के नए जाल बिछाना भी है ।

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