शिक्षा का मौलिक अधिकार पर निबंध | Essay on The Fundamental Right to Education in Hindi!

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हमारे देश का संविधान विश्व का सबसे विस्तृत संविधान है । देश की स्वतंत्रता के 52 वर्षों तक हम शिक्षा को वह महत्व नहीं दे पाए जो उसे मिलना चाहिए । देश का प्रत्येक पाँचवाँ बच्चा अशिक्षित है ।

बड़ी ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि हमारे देश में आज भी लगभग पंद्रह करोड़ बच्चे अशिक्षित हैं । इसका कारण यह है कि प्रतिवर्ष विभिन्न कारणों से लगभग 20 प्रतिशत बच्चे स्कूल के दर्शन से अभी भी वंचित रह जाते हैं।

देश में शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए पचास वर्षो से जद्‌दोजहद जारी है । संविधान में धारा-45 में शिक्षा हेतु विशेष महत्व दिया गया । बच्चों को शिक्षा प्रदान करने हेतु इसे संविधान के ‘राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों’ में तो शामिल किया गया था परंतु हमें आशातीत सफलता प्राप्त नहीं हुई ।

नवंबर 2001 के संविधान संशोधन विधेयक को पारित कर 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने हेतु शिक्षा को ‘मौलिक अधिकार’ का रूप दिया गया है । निस्संदेह सरकार द्‌वारा उठाया गया यह एक सरहनीय कदम है ।

शिक्षा को मौलिक अधिकारों में शामिल करने से जहाँ आशा की नई किरण जगी है वहीं दूसरी और इसकी सफलता हेतु अनेक प्रश्न भी उठ खड़े हुए हैं । प्रश्न यह उठता है कि प्रारंभ से ही शिक्षा के अधिकार को जब ‘ राज्य के नीति निर्देशन ‘ तत्वों में शामिल किया गया था तो वास्तविक रूप में इसे मौलिक अधिकार का रूप देना अनिवार्य

था ? क्या मात्र कानून पारित करने से ही शिक्षा के स्तर में मूलभूत सुधार लाए जा सकते हैं ? जबकि इसे सार्थक रूप देने के लिए आर्थिक रूप में कोई भी आधारभूत ढाँचा तैयार नहीं किया गया है तो क्या फिर शिक्षा के मौलिक अधिकार को सरकार ने वोट बैंक के रूप में प्रयोग किया है ?

6 से 14 वर्ष के बच्चे जो शिक्षा ग्रहण नहीं कर सकते वे केवल निर्धन परिवारों से ही हो सकते हैं अन्यथा कौन समर्थ परिवार अपने बच्चों को शिक्षा नहीं देना चाहेगा । प्रश्न यह उठता है कि क्या एक निर्धन परिवार अपने इस मौलिक अधिकार की रक्षा हेतु उच्च न्यायलय या मानवायोग अधिकार समिति के समक्ष लड़ सकता है ।

शिक्षा को मौलिक अधिकार बना देने भर से सरकार अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकती । उसकी अपनी शिक्षा-व्यवस्था ही व्यवहारिक रूप से इतनी लाचार है कि जिसके तहत शिक्षा के लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन है । जहाँ स्कूल हैं वहाँ शिक्षक नहीं हैं और जहाँ स्कूल का भवन ही नहीं है ।

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प्राथमिक विद्यालयों में ब्लैकबोर्ड, फर्नीचर, भवन, पेयजल, शौचालय, आदि की व्यवस्था बड़ी गंभीर स्थिति में है । महानगरों में निगम तथा अन्य सरकारी विद्‌यालयों में बच्चों का नामांकन दिनों-दिन कठिन होता जा रहा है । ऐसे में प्राथमिक शिक्षा के लक्ष्य की प्राप्ति सरल नहीं है ।

यदि हम इसके सकारात्मक पहलुओं की ओर अपना ध्यान केंद्रित करें तो निस्संदेह यह एक सराहनीय कदम है । अब बच्चों को शिक्षा देने की जिम्मेदारी सरकार और परिवार दोनों की होगी । कोई भी संसाधनों की अपूर्णता आदि का बहाना बना कर अपनी जिम्मेदारियों से पीछे नहीं हट सकता है । आवश्यकता है कि दोनों ही शिक्षा में व्याप्त असमानता को दूर करने का प्रयास करें ।

पूर्व में ‘कोठारी समिति’ द्‌वारा ‘कॉमन स्कूल सिस्टम’ अर्थात् सभी को समान शिक्षा का एक सराहनीय प्रारूप तैयार किया गया था । यदि हम कुछ नए प्रकार की व्यवस्था लाने में सक्षम होते हैं और पंचायती राज व्यवस्था आदि को सुचारू रूप से लागू करते हैं तो वह दिन दूर नहीं जब शिक्षा में व्याप्त असमानता व गुणवत्ता की समस्या को दूर किया जा सकता है ।

भारत में जनसंख्या की वृद्धि दर बहुत अधिक है, अत: बच्चों को शिक्षित करने के प्रयासों में पूर्ण सफलता नहीं मिल पाती है । अत: पूर्ण शिक्षा के लक्ष्य को हासिल करने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपनी जनसंख्या वृद्‌धि दर पर लगाम कसें ।

इसी स्थिति में शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने के फायदे मिल सकते हैं । शिक्षा के साथ-साथ केंद्रीय तथा राज्य सरकारों को अपनी जनसंख्या संबंधी नीति में भी मौलिक परिवर्तन लाने की आवश्यकता है ।

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