जीवन का परम लक्ष्य पर निबंध | Essay on The Ultimate Aim of Life in Hindi!

उद्‌दाम भोग-लिप्सा के इस युग में मनुष्य मानो अपने को असहाय अनुभव कर रहा है । इस यांत्रिक युग में वह स्वयं एक यंत्र बन गया है । क्या यंत्र का भी कोई लक्ष्य होता है ? चलते-चलते घिस जाना ही उसकी नियति है ।

समझ में नहीं आता कि मानव क्या करे ? बचपन, जवानी, बुढ़ापा और मृत्यु ! इतना सारा वाग्जाल, इतना सारा ज्ञान ! उसका लक्ष्य अब भी उससे कितनी दूर है । परंतु हम भारतीयों को निराशा क्यों हो ? दिग्विजयी रघु का देश यही तो है, जिनका प्रखर प्रताप दिग-दिगंत को दीप्त करता रहा और ढलते समय क्षुद्र मृत्तिका पात्र में सिमट गया ।

बाणों की शथ्या पर सोनेवाले अजेय भीष्म की वाणी यहीं कहीं तो व्याप्त होगी, जो अपने पराक्रमपूर्ण चरित पर एक प्रश्न लिये चले गए ।तुलसीदास ने भरत के माध्यम से अपने जीवन का प्रेय, श्रेय और एकमात्र अभीष्ट- जो कुछ भी था- कह दिया है:

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”अर्थ न धर्म न काम रुचि गति न चहौं निर्वान । जनम-जनम रति राम पद यह बरदान निदान ।।

सूर के लिए तो हरि ‘हारिल की लकड़ी’ हैं । रसखान ने तो डंके की चोट पर कहा है:

”मानुष हौं तो वही रसखान,  बसौं ब्रज गोकुल गाँव के ग्वारन,  जो खग हौं तो बसेरो करों,  मिलि कालिंदी कुल कदंब की डारन ।

तुलसी के राम, सूर के कृष्ण, मीरा के गिरधर गोपाल और रसखान के रसिक नटनागर सब एक ही तो हैं, जो अखिल विश्व के कण-कण में विराजमान हैं । ईश्वर को पाना इनके जीवन का लक्ष्य है ।

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राम की उपामना ही तुलसीदास का जीवन-लक्ष्य है । इससे छोटे और सँकरे लक्ष्य की बात उन्हें नहीं जँचती । तुलसीदास के लक्ष्य की भाँति हमें भी ऊँचा लक्ष्य अपनाना चाहिए । बापू ने उन्हीं के स्वर में स्वर मिलाते हुए कहा था- “मैं उस परमात्मा के अतिरिक्त और किसी परमात्मा को नहीं जानता, जो लक्ष-लक्ष मूक प्राणियों के हृदय में मिलता है । मैं इन लाखों की सेवा करके उस परमात्मा की अर्चना करता हूँ ।”

अस्तु, आधुनिक परिस्थितियों में ‘जीवन का चरम लक्ष्य’ बदल गया है । ‘परमार्थ’ संसार में मोक्ष नहीं है, स्वर्ग की प्राप्ति नहीं है ।

दुःखी जनों की सेवा करना, पतितों को ऊपर उठाना, दलितों को सहारा देना, भूखों को अन्न, निर्वस्त्रों को वस्त्र और आश्रयहीनों को आश्रय देना ही जीवन का चरम लक्ष्य है; परमार्थ यही है और यही जीवन का सच्चा पुरुषार्थ भी । मानव-जीवन के चरम लक्ष्य के विषय में आज की दुर्दशा पर प्रकाश डालते हुए राष्ट्र कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने लिखा है :

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”अपहरण शोषण वहीं कुत्सित वही अभिमान,  खोजना चढ़ दूसरों के भस्म पर उत्थान । शील से सुलझा न सकना आपसी व्यवहार,  दौड़ना रह-रह उठा उन्माद की तलवार ।।  सृष्टि को निज बुद्धि से करता हुआ परिमेय,  चीरता परमाणु की सत्ता असीम अजेय । बुद्धि के पवमान में उड़ता हुआ असहाय,  जा रहा तू किस दिशा की ओर को निरुपाय । लक्ष्य क्या ? उद्‌देश्य क्या ? क्या अर्थ ?  यह नहीं यदि ज्ञात तो विज्ञान का श्रम व्यर्थ

अखिल विश्व में जितने प्रयत्न हो रहे हैं-यह खींचतान, यह मार-काट, यह उछल-कूद और यह दौड़-धूप-इनका सत्वर परिणाम भले ही कुछ हो, परंतु अंतिम लक्ष्य है- मानवता का विनाश । मनुष्य के लिए ही मनुष्य को होम किया जा रहा है । मनुष्य की भलाई के लिए अपने आपको निःशेष भाव देकर ही जीवन की पूर्णाहुति संपन्न हो सकती है ।

भेद और विरोध, भिन्न-भिन्न विचारधाराएँ, भिन्न-भिन्न लक्ष्य- सब ऊपरी बातें हैं; भीतर एकमात्र सत्य है मनुष्य और इसकी सच्ची सेवा करना-यही हमारे जीवन का चरम लक्ष्य होना चाहिए । चाहे हम साहित्य की सेवा करें, चाहे समाज की : चाहे वाणिज्य के माध्यम से, चाहे सेवा के पथ से- सब में यह सामान्य तत्त्व ‘मनुष्य’ निहित मिलेगा । इसी के लिए अधिक-से-अधिक कल्याणकारी साधन जुटाना ही हमारा एकमात्र कर्तव्य होना चाहिए ।

हमें अपने लक्ष्य को अपनी साधना से इतना सुगम बना लेना होगा कि जिससे   ”शक्ति के विद्युत् कण जो व्यस्त विकल बिखरे हैं, हो निरुपाय । समन्वय उनका करें समस्त विजयिनी मानवता हो जाए ।।

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मनुष्य के जीवन का एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए-राष्ट्र-सेवा, मानव-सेवा, समाज-सेवा । अपने जीवन को सफल बनाकर उसके द्वारा समाज का अधिक-से-अधिक कल्याण ही हमारा लक्ष्य होना चाहिए ।

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