मुहम्मद अली जिन्ना पर निबंध | Essay on Muhammad Ali Jinnah in Hindi

1. प्रस्तावना:

बीसवीं शताब्दी में मुस्लिम विचारधारा के प्रबल प्रतिनिधि के रूप में मोहम्मद अली जिन्ना का नाम प्रमुख है । वे एक कट्टर मुसलमान थे । वे भारतवर्ष को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद करवाना चाहते थे ।

आजादी की इस लड़ाई में उन्होंने अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया । उनकी राजनीतिक विचारधारा भारत की आजादी के समय ऐसे परिवर्तित हुई, जिसके फलस्वरूप अंग्रेजों ने दो राष्ट्रों के सिद्धान्त को जन्म दिया । उनके विचार में हिन्दू तथा मुसलमान दो पृथक-पृथक राष्ट्र हैं ।

इस रूप में वे भारतीय मुसलमानों की सामाजिक एवं राजनीतिक पृथकता व स्वशासन को स्वीकार करते थे । ”पाकिस्तान लेकर रहेंगे” कहकर उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच की खाई को अपनी कूटनीतिक चाल से और अधिक बढ़ा दिया । वे पाकिस्तान के ”मसीहा” और ”कायदे आजम” के रूप में जाने जाते हैं ।

2. जीवन परिचय, विचार एवं कार्य:

मोहम्मद अली जिन्ना का जन्म एक समृद्ध खोजा परिवार में 23 दिसम्बर सन् 1876 में करांची में हुआ था । उन्होंने बैरिस्टर की परीक्षा इंग्लैण्ड से उत्तीर्ण की । वहां से आकर वे बम्बई में वकालत करने लगे । सन् 1913 से 1918 तक वे हिन्दू-मुस्लिम एकता के समर्थक थे । सन् 1916 में उन्होंने कांग्रेस और मुस्लिम लीग में समझौता करवाया था । 1920 में कांग्रेस की सरकार के विरुद्ध असहयोग नीति के कारण वे कांग्रेस से अलग हो गये ।

1928 में उन्होंने साइमन कमीशन के विरोध में मोतीलाल नेहरू और लाला लाजपतराय का साथ दिया । 1928 के बाद जिन्ना ने राजनीतिक नीति में आश्चर्यजनक परिवर्तन करते हुए अपनी जाति का विश्वास प्राप्त करने के लिए साम्प्रदायिक नीति को अपनाया और इसका प्रयोग राजनीति में किया, जिसकी वजह से मुसलमान जाति उन्हें अपना देवता मानने लगी ।

उन्होंने 1929 में 14 शोर्तों वाला कार्यक्रम लीग के सामने प्रस्तुत किया । केन्द्रीय और प्रान्तीय व्यवस्थापिका में एक तिहाई प्रतिनिधित्व मुसलमानों के लिए मांगा और साम्प्रदायिक निर्वाचन प्रणाली पर जोर दिया । सन् 1935 के अधिनियम के कार्यान्वित होने के बाद प्रान्तों में उनका प्रभाव मुसलमानों पर बढ़ने लगा ।

1944 में उन्होंने मुस्लिम सम्प्रदाय को यह समझाया कि संयुक्त भारत में बहुमत के शासन का अर्थ-सदा के लिए मुसलमानों को गुलाम बनना होगा और इस्लाम संकट में पड़ जायेगा । अपने प्रारम्भिक राजनीतिक जीवन में वे राष्ट्रवादी तथा हिन्दू-मुस्लिम एकता के प्रतीक माने जाते थे । मुस्लिम लीग में प्रवेश के बाद कट्टर मुसलमानों के सम्पर्क में आकर हिन्दू-मुस्लिम एकता सम्बन्धी विचारों को त्याग दिया और साम्प्रदायिकता तथा कांग्रेस विरोधी विचारों को ग्रहण किया ।

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जिन्ना ने गांधीजी की नीतियों और सिद्धान्तों का भी विरोध किया । उन्होंने 1928 की नेहरू रिपोर्ट में कही गयी मुसलमानों को अधिक प्रतिनिधित्व की बात को भी नहीं माना । मुस्लिम लीग के प्रभाव में आकर उन्होंने ”द्विराष्ट्र” के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया । 1940 में मुस्लिम लीग के लाहौर अधिवेशन में इसे स्वीकृत भी करा लिया।

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जिन्ना ने भारत-पाकिस्तान विभाजन को प्राकृतिक आवश्यकता बताते हुए यह कहा- ”हम मानते हैं कि हिन्दू और मुसलमान दो बड़े राष्ट्र हैं । हम चाहे कोई भी परिभाषा या परीक्षा लागू करें, हम दस करोड़ मुसलमान एक राष्ट्र हैं । हमारी सभ्यता और सस्कृति अलग है । हमारी भाषा, साहित्य, कला, नाम, उपनाम, मूल्य, धारणाएं, कानूनी नियम, नैतिक कोड, कस्टम और कैलेण्डर, इतिहास, परम्परा, हमारी इच्छाएं तथा जीवन का अलग दृष्टिकोण है ।”

जिन्ना ने दृढ़तापूर्वक यह कहा कि हिन्दू और मुसलमानों के मतभेदों को समाप्त करने का एकमात्र यथार्थवादी और व्यावहारिक तरीका देश का विभाजन ही है । इसमें वे भारत और पाकिस्तान को दो राष्ट्रों में बांटकर कोई समझौता करना ही नहीं चाहने थे ।

जिन्ना ने अपनी इस जीत पर बने रहते हुए मित्रलीगी मुसलमानों के साथ मिलकर साम्प्रदायिक दंगे करवाये तथा डायरेक्ट एक्शन के नाम पर बंगाल की सोहरावर्दी सरकार का समर्थन करते हुए तीन दिनों तक हिन्दुओं का कत्लेआम करवाया ।

3. उपसंहार:

इस प्रकार स्पष्ट है कि अपने प्रारम्भिक राजनीतिक जीवन में वे भले ही राष्ट्रवादी, हिन्दू-मुस्लिम एकता तथा लोकतन्त्र के प्रबल समर्थक थे, किन्तु जातिगत स्वार्थ व पद लिप्सा के प्रभाव से ग्रसित होकर वे कट्टर मुसलमान बन गये । वे दो राष्ट्रों के सिद्धान्त के जन्मदाता व ‘पाकिस्तान के मसीहा’ भले ही हों, किन्तु भारत की अखण्डता व हिन्दुओं के प्रबल शत्रु थे ।

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