मेरे प्रिय शिक्षक पर निबंध | Essay on My Favourite Teacher on in Hindi!

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मैं जब चार-पाँच वर्ष का ही था तब एक ‘शिशु शिक्षा मंदिर’ में मेरा प्रवेश हुआ । इसमें शिशुओं को अक्षर-ज्ञान कराने के साथ-साथ उनके मनोरंजन, पहनावे, चरित्र, आहार-विहार और उनकी शारीरिक शुद्धता पर अधिक ध्यान दिया जाता था ।

प्रशिक्षित अध्यापिकाएँ अध्यापन कार्य के साथ-साथ बच्चों का मातृवत् मार्गदर्शन करती थीं ।इसलिए शिशु-विद्यार्थी कुछ समय के लिए अपने माता-पिता को भूल जाते थे । सब अध्यापिकाओं का व्यवहार शिशुओं के प्रति इतना स्नेहिल होता था कि उनमें से कौन मुझे प्रिय है, यह मैं निश्चय नहीं कर सका ।

वहाँ से निकलने के बाद मुझे जूनियर पाठशाला में पढ़ना पड़ा । पिताजी का स्थानांतरण होता रहता था और मुझे भी एक पाठशाला में कुछ समय तक अध्ययन कर दूसरी पाठशाला की शरण लेनी पड़ती थी । कक्षा आठ तकपहुँचते-पहुँचते मेरे अध्ययन का यही क्रम रहा । किसी पाठशाला में कुछ वर्षों तक जमकर न पढ़ने के कारण मैं अपने अध्यापकों के संबंध में अपनी कोई निश्चित धारणा नहीं बना सका ।

आठवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् जब मैं नौवीं कक्षा में पहुँचा तब मेरा प्रवेश स्थायी रूप से मुंबई के एक प्रसिद्ध विद्यालय में हुआ । इसमें लगभग १,००० विद्यार्थी और ५० अध्यापक थे । इसमें साहित्य, समाजशास्त्र, कला, विज्ञान आदि कई विषयों की शिक्षा दी जाती थी । प्रधानाचार्य एक कुशल और अनुभवी शिक्षाशास्त्री थे । वे छात्रों की पढ़ाई-लिखाई पर ध्यान रखने के साथ उनके स्वास्थ्य, आचरण, उनकी वेशभूषा, मनोरंजन के साधनों आदि पर भी पूरा ध्यान देते थे ।

वे अनुशासनप्रिय और रोब-दाबवाले व्यक्ति थे । इसलिए शरारती और उद्‌दंड प्रकृति के छात्र उनका नाम सुनकर ही काँप उठते थे । ऐसे प्रधानाचार्य की देख-रेख में जब मेरा प्रवेश नौवीं कक्षा के अनुभाग ‘स’ में हुआ तब मैं पहले तो बहुत घबराया, किंतु जब मैंने छात्रों के प्रति प्रधानाचार्य के स्नेहिल व्यवहार का अनुभव किया तब मुझे बहुत प्रसन्नता हुई ।

नौवीं कक्षा के अनुभाग ‘स’ के छात्रों को कई अध्यापक विविध विषयों की शिक्षा देते थे । उन अध्यापकों में एक थे- पं. रामनरेश द्विवेदी । द्विवेदीजी उत्तर प्रदेश के निवासी थे । उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम.ए. और हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग से ‘साहित्यरत्न’ की परीक्षाएँ उत्तीर्ण की थीं । उनकी वेश-भूषा अत्यंत सादा थी । वे खादी की धोती और कुरता पहनते थे ।

जूते की अपेक्षा चप्पल पहनना उन्हें अधिक प्रिय था । ऊँचे कद का भरा-पूरा मांसल गोरा शरीर, सिर पर अंग्रेजी ढंग से कढ़े हुए काले चमकीले बाल, गोल चेहरा, चेहरे पर काली-काली मूँछें, चिकनी दाढ़ी, काले फ्रेम के चश्मे के भीतर से झाँकती हुई बड़ी-बड़ी आँखें, गोल-सुडौल कलाई पर सुनहरी चेन में कसी हुई चौकोर घड़ी-ऐसा आकर्षक था उनका व्यक्तित्व । उनके आते ही कक्षा में सन्नाटा छा जाता था । पहले ही दिन उन्होंने मुझे अपने प्रभावशाली व्यक्तित्व से अपनी ओर आकृष्ट कर लिया और फिर वे मेरे प्रिय शिक्षक बन गए ।

द्वेदीजी एक कुशल और अनुभवी अध्यापक हैं । लगभग दस वर्षों से अध्यापन कार्य कर रहे हैं । वे हिंदी पढ़ाते हैं । अध्यापक के लिए अपने विषय का विद्वान् होना आवश्यक नहीं है । अपने विषय का उचित ज्ञान रखनेवाला ही एक कुशल अध्यापक हो सकता है ।

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द्विवेदीजी अपने विषय के विद्वान् होने के साथ-साथ शिक्षण-कला में भी पटु हैं । वे अपने छात्रों के मानसिक स्तर का पता लगाकर अपनी शिक्षा-शैली का रूप निश्चित करते हैं । इससे न तो उनके छात्रों को पाद-विषय को समझने में कठिनाई होती है और न उन्हें विशेष श्रम करना पड़ता है ।

वे स्वाभाविक और मनोरंजक ढंग से शिक्षा देते हैं । इसलिए उनके छात्र बड़े ध्यान से उनकी बातें सुनते हैं और उन्हें अपनी स्थायी स्मृति का अंश बना लेते हैं । वे पढ़ाकर अपने छात्रों का मात्र ज्ञानवर्धन ही नहीं करते बल्कि उनकी लेखन-शक्ति का विकास करने पर भी बहुत बल देते हैं ।

आदर्श छात्र उत्पन्न करने केलिए शिक्षक को स्वयं एक आदर्श व्यक्ति होना चाहिए । एक सत्यवादी, सदाचारी, परिश्रमी, निष्पक्ष, भेदभाव से रहित, अपने छात्रों के प्रति पितृवत्-स्नेहपूर्ण व्यवहार करनेवाला व्यक्ति ही आदर्श अध्यापक होता है । आदर्श अध्यापक बनना सरल काम नहीं है । आदर्श अध्यापक बनने के लिए तप और त्याग करना पड़ता है ।

यह इसलिए कि देश के भावी नागरिकों के निर्माण का भार उसी पर रहता है । वही देश का भावी निर्माता होता है । द्विवेदीजी इसी अर्थ में एक आदर्श अध्यापक हैं । वे अपने छात्रों को पढ़ाने-लिखाने के साथ-साथ उनके आचरण और उनके स्वास्थ्य पर विशेष ध्यान देते हैं । वे छात्रों को मार-पीटकर नहीं सुधारते । यदि किसी छात्र से कोई भूल हो जाती है तो उसे उस भूल को स्वीकार करने की प्रेरणा देते हैं । इससे शरारती बालक शीघ्र ही सुधर जाते हैं ।

शरारती बालकों को सुधारने की इस कला में द्वेदीजी इतने प्रवीण हैं कि विद्यालय के उद्‌दंड प्रकृति के छात्रों को सुधारने का भार उन्हीं को सौंपा गया है और उन्होंने अपने व्यवहार से अनेक छात्रों को आदर्श छात्र बना दिया है । अपनी इस विशेषता के कारण वे मेरे ही नहीं विद्यालय के सभी छात्रों के प्रिय शिक्षक हैं ।

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