Here is an essay on the Panchayati Raj System in India especially written for school and college students in hindi language.

आज विश्व समुदाय भारत की ओर देख रहा है जो भारत का इक्कीसवीं सदी की महाशक्ति के रूप में आंकलन कर रहा है ।  इतना सब होने के बावजूद भारत की जो दूसरी तस्वीर मैं आपको दिखाने जा रहा हूँ उसे देखकर कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि हम जो दिखते हैं वो हैं नहीं और जो हैं वो दिखते नही ।

क्योंकि हमारे रोम-रोम में झूठ, बेईमानी, भ्रष्टाचार, दुराचार, जातिवाद, धार्मिक वैमनस्य आदि अनेकों बुराईयां घर कर चुकी हैं । जिनको हम सब जानते हुए कि ये बुराई है फिर भी उनका अनुसरण कर रहे है और उनको आगे बढने में मदद कर रहे हैं ।

शुरूआत करते हैं उस जगह से जहां भारत की 75 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है, जी हां मैं जिक्र कर रहा हूँ भारत के गांवो का जहां आजाद होने के 63 वर्ष बाद भी लोग बुनियादी जरूरतों से महरूम हैं जहां आज भी पक्की सड़क, बिजली, शिक्षा व पीने के शुद्ध पानी की व्यवस्था नहीं है लोग अशिक्षित हैं, कच्चे मकानों में रहते हैं, बैलों से हल चलाकर खेती करते हैं, व खेती के लिए भी वर्षा पर निर्भर हैं, मनोरंजन के लिए भी कुछ नहीं है तभी तो वो जनसंख्या बढ़ा रहे हैं क्योंकि इसके सिवाय उनके पास कोई अन्य साधन नहीं हैं, बच्चों को खेलने की कोई व्यवस्था नहीं है ।

सड़के कच्ची हैं जो शहर की मुख्य सड़कों से जोड़ती हैं, जो बरसात के मौसम में स्वत: ही बन्द हो जाती है जिनमें से इंसान तो क्या जानवर भी नहीं निकल पाते, बिजली का तो इन लोगों ने केवल नाम सुना है अभी देखा तक नहीं हैं, शिक्षा के नाम पर गांवों में स्कूल हैं जिनमें अध्यापक एक या दो हैं, जिनका अधिकांश समय जनगणना, पोलिया, वोटर कार्ड व चुनाव डयूटी में बीत जाता है जो समय बचता है उसमें ये बच्चों को न पढाने में ही अपना कर्त्तव्य समझते हैं ।

क्योंकि वेतन तो समय से मिलता नहीं इसलिए जीविका के लिए साइड में कुछ न कुछ करना पड़ता है । कुछ गांवों में अगर बिजली की व्यवस्था हो गयी है तो वहां लोगों ने बिजली के कनेक्शन ही नहीं लिये हैं क्योंकि वे मुपत में बिजली जलाना अपना नैतिक कर्त्तव्य समझते हैं, वो तारों पर कटिया डालकर अपना काम चला रहे हैं अगर बिजली विभाग का कोई कर्मचारी उनके पास पहुंचता है तो उसकी मुट्‌ठी गर्म कर दी जाती है वो भी चुपचाप चला आता है, क्या फर्क पड़ता है अपनी तो जेब गर्म हो गई देश से किसको लेना देना है ।

पीने के लिए कुंए के पानी का इस्तेमाल किया जा रहा है जिसमें गन्दगी के सिवाय कुछ नहीं है फिर भी लोग पीते हैं । बरसात के दिनों में गांवों में बीमारियों का मेला लग जाता है जिनसे छुटकारा पाने के लिए सरकार की ओर से आज तक गांवों में किसी भी डाक्टर की व्यवस्था नहीं कि गई है ।

गांव वासी गांव के ही छोलाछाप डाक्टरों से इलाज कराने को मजबूर हैं जिनको दवाईयों का कुछ ज्ञान ही नहीं है फिर भी इलाज करते हैं कुछ ठीक हो जाते हैं कुछ मर जाते हैं आखिर जायें तो जायें कहां ये तो भारत के गांवों की चिकित्सा शिक्षा सडक व पानी की व्यवस्था है, सड़कें जहां पर पक्की बन गई है उनकी स्थिति ऐसी है कि सड़क कम गडढ़े ज्यादा नजर आते हैं, आये भी क्यों नहीं जब सड़क बनाने के लिए छोड़े जाने वाले ठेके में मंत्री से लेकर इंजीनियर तक सबका हिस्सा होता है फिर ठेकेदार को भी कमाना है तो सड़कें कहां से ठीक बने फिर तो सड़क में गडढे ही नजर आयेंगे ।

गांवों में बनने वाली सड़के आमतौर पर दो से छ: महीने के अन्दर टूट जाती है शिकायत कोई करता नहीं इसलिए किसी का कुछ बिगड़ता नहीं सब कुछ नियोजित तरीके से चल रहा है । भारत देश गांवों का देश है जहां देश की पिच्छेत्तर प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है । भारत में गांवों की बाहुल्यता को देखते हुए देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू द्वारा 2 अक्टूबर 1959 को राजस्थान राज्य के नागौर जिले में पंचायती राज का शुभारम्भ किया था ।

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पंचायती राज की शुरूआत करने के पीछे देश के तत्कालीन नीतिकारों का विचार था कि गांवों में प्राचीन काल से ही पंचायतों का प्रभाव समाज पर रहा है । जहां छोटे-छोटे विवाद, सामाजिक समस्या, वैवाहिक विवादों को पंचायतों द्वारा ही निपटा दिया जाता था ।

इसी विचार को केन्द्र में रखकर देश के तत्कालीन नीतिकारों द्वारा पंचायती राज का शुभारम्भ कर पंचायतों को वैधानिक दर्जा दिया था जिनमें गांव विकास, प्राथमिक शिक्षा और लघुवादों के निपटारें में न्यायिक अधिकार भी सम्मिलित थे ।

पंचायती राज व्यवस्था के शुरूआती समय में पंचायतों की गरिमा उसकी मान मर्यादा का ग्रामीण लोग अत्यधिक आदर-भाव के साथ पालन करते थे । यह उस वक्त की बात है जब देश में गरीबी, अशिक्षा और भुखमरी का बोलबाला था । गावों में दस-बीस परिवारों के ऊपर एक समझदार व्यक्ति बामुश्किल होता था । जो उन बीस परिवारों का मुखिया होता था ।

इसी तरह सम्पूर्ण गांव में गिने-चुने दस-बारह लोग होते थे जिन्हें पंच कहा जाता था और इन पंचों में से ही बारी-बारी से सम्पूर्ण गांव का मुखिया या प्रधान व सरपंच चुना जाता था । ये कुछ चुनिंदा लोग ही समस्त गांव पर शासन करते थे ।

वक्त बदला, शिक्षा का प्रचार-प्रसार हुआ, लोगों की सोच विकसित हुई अपने अधिकारों के प्रति भी ग्रामीण जनता में कुछ जागरूकता आयी है । सब कुछ बदल गया । एक वह वक्त था जब गावों में अशिक्षित लोगों की भरमार थी और एक आज का वक्त है जब देश की पंचायती राज व्यवस्था का हिस्सा बनने के लिए स्नातक, परास्नातक और मैनेजमेन्ट के छात्र अपना भाग्य आजमा रहे हैं ।

पिछले पंचायती चुनावों के आंकड़े इस बात का प्रमाण है कि मैनेजमेन्ट किये हुए छात्रों ने भी पंचायत चुनावों में हिस्सा लिया और कुछ लोग तो चुनाव जीतकर पंचायत के प्रतिनिधि भी बने । सब कुछ बदला लेकिन नहीं बदला तो केवल पंचायतों का कार्य करने का तरीका ।

भारत में जब पंचायती राज की शुरूआत हुई थी तब से लेकर आज तक पंचायतों को अधिक अधिकार भी दिये गये हैं । आर्थिक सहायता भी शुरूआती समय से कई गुना हो गई है लेकिन पंचायतों का कार्य करने का तरीका केवल वही पुराना ढर्रा है जब लोग अशिक्षित हुआ करते थे और केवल एक ही व्यक्ति को सर्वोपरि मानकर पंचायती राज व्यवस्था चलती थी ।

वर्तमान समय पंचायती राज व्यवस्था के लिए अत्यधिक अनुकूल है जब ग्रामीण जनता अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती जा रही है । शिक्षा का स्तर भी काफी सुधर गया है । लेकिन इतना सब कुछ होने के बाद भी वर्तमान समय में पंचायतों की गरिमा समाप्त हो गयी है आज छोटे से छोटा वाद भी पंचायतों के द्वारा नहीं निपटाया जा सकता है । सभी के लिए पुलिस और न्यायालय का सहारा लिया जा रहा है ।

यही कारण है कि देश के न्यायालयो में वादों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है क्योंकि भारतवर्ष में पचास प्रतिशत से अधिक मुकदमें ग्रामीण क्षेत्र से सम्बन्धित होते हैं और यदि ग्रामीण मुकदमों का निपटारा पंचायतों के माध्यम से हो जाये तो निश्चित ही देश के न्यायालयों में लम्बित मुकदमों की संख्या में काफी कमी आयेगी ।

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देश की पंचायती राज व्यवस्था बहुत अच्छी है यदि ईमानदारी से इसका पालन हो लेकिन जहा तक ईमानदारी का प्रश्न है उसकी उम्मीद तो कम ही की जा सकती है क्योंकि वर्तमान समय में गांव पंचायत के चुनावों की स्थिति विधान सभा और लोग सभा चुनावों से कहीं अधिक बद्‌तर है ।

राज्य सरकार और चुनाव आयोग कितना ही प्रयास क्यों न करे लेकिन चुनाव आचार संहिता का पालन करना मुश्किल ही नहीं नामुकिन है जिसका कारण भी मौजूद है प्रशासनिक लापरवाही और मीडिया की गांवों तक पहुंच न होना ।

तभी तो पंचायत चुनावों से कई महीने पहले भावी प्रत्याशी दावत और शराब का दौर चला देते हैं । भोली-भाली ग्रामीण जनता शराब के नशे में धूत होकर पंचायती राज व्यवस्था को पलीता लगाते हैं । यदि देश की पंचायती राज व्यवस्था का सही रूप से दर्शन किया जाये तो उसके लिए सर्वाधिक उपयुक्त समय पंचायत चुनाव से लगभग दो-तीन महीने पहले और पंचायत चुनाव के लगभग छ: महीने बाद तक भारतवर्ष के गांवों की जो तस्वीर हम देखेगें उसको देखकर देश के पंचायती राज व्यवस्था के सूत्रधार यदि आज जिंदा होते तो अपने आपको गौरवान्वित महसूस करने के स्थान पर पश्चाताप का एहसास करते दिखायी देते ।

जो तस्वीर इन दिनों में देश की देखने को मिलती है वह किसी भी अर्थ में भारतवर्ष की सभ्यता, संस्कृति, मूल्यों और दर्शन के विरूद्ध ही प्रदर्शित होती है । जब हम देखते हैं कि ऐसे युवक जो अभी रकूल से निकले ही हैं और कॉलिज जाने की तैयारी में ही थे ।

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लेकिन गांव पंचायत के चुनावों में मुक्त शराब के दौर से शराब की लत के आदी हो गये । देश के ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक पांच वर्ष बाद होने वाले पंचायती चुनावों के कारण ग्रामीण युवकों का एक वर्ग शराब के नशे का आदी हो जाता है क्योंकि पंचायती चुनावों में गांवों में पंचायत चुनाव के प्रत्याशियों द्वारा रोजाना मुफ्त शराब परोशी जाती है ।

प्राप्त जानकारी के अनुसार एक गांव पंचायत के प्रधान पद के चुनाव में आमतौर पर पांच से छ: लाख रूपये शराब, दावत व वोट के लिए नकद भुगतान आदि पर एक प्रत्याशी द्वारा खर्च कर दिया जाता है तब जाकर गांव का प्रधान बन पाता है ।

इतना खर्च करने के पीछे प्रत्याशी का तर्क भी साफ है कि एक बार गांव का प्रधान बनने पर सक्रिय राजनीति के द्वार खुलते है फिर छ: लाख रूपये खर्च करने के उपरान्त यदि चालीस से पचास लाख रूपये की आमदनी हो जाये तो कोई घाटे का सौदा नहीं है ।

यही कारण है कि वर्तमान समय में उच्च शिक्षित युवक पंचायत चुनाव में भाग्य आजमा रहे हैं । जिसका मूल कारण है राज्य सरकार, केन्द्र सरकार व वित्त आयोग द्वारा गांवों के विकास के लिए मिलने वाला भारी भरकम विकास अनुदान जो कुछ ही समय में पंचायत चुनाव जीतने वाले व्यक्ति की आर्थिक स्थिति को बदल देता है ।

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सभी अधिकारी इस बात से अनभिज्ञ नहीं है कि गांवों के विकास के लिए आने वाला बजट गांवों में बामुश्किल दस प्रतिशत ही लग पाता है अन्यथा गांव प्रधान और गांव सचिव द्वारा अपना-अपना तय प्रतिशत हिस्सा लेकर कागजों में ही गांव का विकास करा दिया जाता है । इसके अलावा गांव प्रधान की कई अन्य स्रोतों से भी आय होती है ।

जैसे विधान परिषद चुनाव में मत देने के एवज में मिलने वाली रकम, गांव स्तर पर होने वाली नियुक्तियों में मिलने वाली रकम, साथ ही जो प्रधान पुलिस की मुखबरी का कार्य करता है । उसकी आय कुछ अधिक ही हो जाती है जो गांव में होने वाले छोटे-छोटे विवादों में पुलिस से मिलकर पहले आरोपियों को पकड़वाने, तदोपरान्त छुडवाना, ग्राम प्रधान की आय का एक अच्छा स्रोत बन जाता है ।

गांव पंचायत के चुनावों के दौरान दो-तीन माह पहले जो वातावरण गांवों का होता है उसे देखकर कोई भी व्यक्ति सहज ही अंदाजा लगा सकता है । यह भारतीय पंचायती राज व्यवस्था का एक ऐसा अनछुआ पहलू है जिसकी शायद कल्पना भी न की गई हो । जब हम देखते हैं कि गांव में जगह-जगह गली, मौहल्लों में चौपालों पर शाम होते ही शराब के जाम छलकने शुरू हो जाते हैं तथा गांव की तंग गलियों में शराबियों के झुंड रोजाना दिखायी देते हैं । जो केवल शराब पीने का ही कार्य करते हैं ।

यह स्थिति तब तक बनी रहती है जब तक चुनाव की मत पेटी बंद नहीं हो जाती और चुनाव की मतपेटी बन्द होने पर जो आपसी चुनावी रंजिश का वातावरण तैयार होता है उसमें कई बार तो लोगों की जान तक भी चली जाती हैं जब यह देखा जाता है कि अमुख व्यक्ति द्वारा अमुख प्रत्याशी को वोट दिया गया था तो स्थिति अत्यन्त भयानक होती है यह मारपीट का दौर आगामी कई महीनों तक चलता रहता है ।

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पुलिस थाने इस बात को प्रमाणित करते हैं कि पंचायत चुनावों के बाद गांवों में मारपीट की वारदात बहुत ही तेजी से बढ़ती है और कई बार तो मारपीट की इन वारदातों का परिणाम हत्या तक पहुंच जाता है जिस कारण सम्पूर्ण गांव का वातावरण तनावपूर्ण हो जाता है और इस तनावपूर्ण वातावरण का प्रभाव गांव के बच्चे, बुजुर्ग, महिला, पुरूष और छात्रों पर भी पड़ता है जो पढ़ाई के स्थान पर गांव की गतिविधियों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं ।

यह किसी भी एक गांव का उदाहरण नहीं है बल्कि सम्पूर्ण भारतवर्ष के सम्पूर्ण राज्यों में यही हालात है वैसे अपवाद प्रत्येक स्थान पर विद्यमान हैं फिर भी वर्तमान समय में पंचायती राज व्यवस्था गांवों में विकास व स्थानीय लोकतंत्र के स्थान पर गांवों का विकास तो अवरूद्ध कर ही रहा है साथ ही लोकतांत्रिक व्यवस्था को चोट पहुंचाने के साथ ही ग्रामीण समाज मे आपसी वैमनस्य पैदा करने का कार्य पंचायती राज व्यवस्था द्वारा ही किया जा रहा है ।

वर्तमान समय में ग्रामीण जनता का पलायन शहरों की ओर तेजी से हो रहा है । शहरों में तेजी से बढ रही जनसंख्या के पीछे जो एक अहम पहलू है उसे भी नकारा जाना सत्य को झूठलाना जैसा ही है । जिस गांव में आपसी रंजिश इतनी बढ़ जाती है कि रंजिश में हत्या तक भी हो जाती है तो उस गांव के समझदार व्यक्ति गांव से अपनी पुश्तैनी जमीन जायदाद को बेचकर शहर की ओर रूख करने में ही अपनी व अपने परिवार की भलाई समझते हैं और यह सब होता है ।

भारतीय पंचायती राज व्यवस्था की कमियों के कारण और साथ ही इन सबके लिए उत्तरदायी है हमारी पुलिस व प्रशासनिक व्यवस्था जो ऐसे अवैधानिक कार्य करने वाले लोगों पर नकेल कसने में नाकाम साबित होती है और बेचारे कमजोर ग्रामीण गांवों से पलायन करना ही उचित समझते हैं ।

पहले तो कोई ग्रामीण ऐसे दबंग लोगों की शिकायत करने की हिम्मत तक नहीं जुटा पाता और बामुश्किल किसी ने ऐसे दबंगों की शिकायत करने की हिम्मत जुटा भी ली तो पुलिस प्रशासन कमजोर लोगो की मदद करना मुनासिब नही समझता ।

अगर बहुत अधिक मिन्नत पैरवी की गई तो मुश्किल से एन.सी.आर (नार्मल कम्पेलेन्ट रिपोर्ट) दर्ज की जाती है । जिसमें खड़े-खड़े जमानत मिल जाती है या फिर 107,106 सी॰आर॰पी॰सी॰ की कार्यवाही कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं ।

यह हमारी प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था का सहयोग, कमजोर ग्रामीण जनता के लिए होता है जो पंचायती चुनाव के बाद दबंगों द्वारा उत्पीड़ित किये जाते हैं । उक्त व्यवस्था को देखकर क्या हम कह सकते हैं कि भारतीय पंचायती राज व्यवस्था अपने उद्देश्य में सफल हो रही है अर्थात कदापि नहीं । बल्कि पंचायती राज व्यवस्था के दुष्परिणाम इस देश को झेलने पड़ रहे हैं ।

जहाँ गांवों से शहरों की ओर ग्रामीण जनता शान्ति की तलाश कर रही है तो कहीं अपनी जान बचाकर शहरों में छुप रहे हैं तो कहीं ग्रामीण उत्पीड़न से बचने के लिए लोग शहरों में निवास कर रहे हैं । इनके अलावा ग्रामीण विकास की बात करना तो अमावस्या के दिन चांद के दर्शन करना जैसा है ।

जो व्यक्ति गांव पंचायत चुनाव में दो महीने पहले शराब, दावत आदि पर लाखों रूपये खर्च कर चुनाव जीता है तो क्या हम ऐसे व्यक्ति से ग्रामीण विकास की अपेक्षा कर सकते हैं । हमारा मानना है कि शायद ऐसे व्यक्ति से ग्रामीण विकास की अपेक्षा करना शेर की मांद में मांस तलाश करना जैसा ही है । कुछ इस तरह भारतीय पंचायती राज व्यवस्था अपनी वृद्धावस्था की ओर अग्रसर हो रही है जिसको लगभग सम्पूर्ण ग्रामीण भारतीय जनता का समर्थन भी हासिल है ।

भारत में कानूनों की वृद्धावस्था की कड़ी में एक ओर नाम जोड़ते हुए भारतीय पंचायती राज अधिनियम भी है जो कि आजादी के समय सन् 1947 ई॰ का कानून है जिसके द्वारा भारत में पंचायती राज की कल्पना की जा रही है । जिसकी सैद्धान्तिकता और व्यवहारिकता में अत्यधिक अन्तर होने के बाद भी भारत में पंचायती राज कायम है ।

बेशक पंचायती राज का कोई लाभ भारतीय ग्रामीण जनता को न मिल रहा है लेकिन कम से कम आंकड़ों की जादूगरी में तो हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में सबसे बड़े पंचायती राज के मालिक हैं । यह बात अलग है कि ”हम जो दिखते हैं वो हैं नहीं और जो हम हैं वो हम दिखते नहीं” यही कारण है कि सम्पूर्ण विश्व भ्रमित है कि भारत का लोकतंत्र इतना मजबूत कैसे है ।

शोध किये जा रहे हैं आंकड़े जुटाये जा रहे हैं और तो और अपने प्रबन्धन के छात्रों को हिन्दी सीखाकर भारत में अध्ययन करने के लिए भेजा जा रहा है कि भारत की आर्थिक प्रगति का राज क्या है ?  भारत में कैसे लोग विश्व आर्थिक मंदी के शिकार होने से भी बच गये । जब पूरा विश्व आर्थिक मंदी के जाल में फंसा था तब भारतीय बैंक और भारतीय उद्योग भारतीय जनता को रोजगार उपलब्ध करा रहे थे ।

भारत में पंचायती राज व्यवस्था के कारण ही भारतीय सामाजिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो रही है । उसको छिन्न-भिन्न करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं भारतीय पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था जो अपने कर्त्तव्यों का पालन करने के स्थान पर उल्टे पीड़ित को ही और अधिक उत्पीड़ित करने का कार्य कर रहे हैं ।

यही कारण है कि भारतीय पंचायती राज व्यवस्था अपने मूल उद्देश्य में सफल नहीं हो रही है । वर्तमान समय में भारतीय पंचायती राज व्यवस्था सियासत दारों अर्थात राजनेताओं की सहायक सिद्ध हो रही है । जिस प्रकार बहुराष्ट्रीय कम्पनी को अपने उत्पाद बेचने हेतू ऐजेंटों की आवश्यकत होती है ठीक उसी तरह भारतीय राजनेताओं को अपनी पार्टी चलाने हेतू पंचायत प्रतिनिधियों की आवश्यकता होती है ।

जो भारतीय राजनीतिक पार्टियों के प्रचार-प्रसार के साथ ही ग्रामीण स्तर पर किसी भी पार्टी प्रत्याशी को चुनाव जीतने के लिए वोट डलवाने का कार्य भी पंचायत प्रतिनिधि को निजी व सार्वजनिक, सभी प्रकार के लाभ उपलब्ध कराये जाते हैं ।

अगर यह कहा जाये कि भारतीय राजनीति का आधार स्तम्भ भारतीय पंचायती राज व्यवस्था है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि देश के गांवों का विकास हो या न हो लेकिन भारतीय पंचायती राज व्यवस्था के बिना भारतीय राजनीति का विकास कराना सम्भव नहीं है ।

भारतीय पंचायती राज व्यवस्था भारतीय राजनीति की पूरक है यदि भारतीय पंचायती राज व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाये तो निश्चित ही भारतीय राजनेता और भारतीय राजनीति की तस्वीर बदल जायेगी ।

भारतीय पंचायती राज व्यवस्था के कारण ही भारतीय राजनीति और भारतीय राजनेता अपना विकास कर रहे हैं यह बात अलग है कि भारतीय पंचायती राज व्यवस्था का अस्तित्व भारतीय राजनीति में दर्शित नहीं होता है ।

जमीनी हकीकत यह है जिसे हम झूठला नहीं सकते कि भारतीय राजनीति से भारतीय पंचायती राज व्यवस्था को अलग करने पर या समाप्त करने पर भारतीय राजनीति पंगू हो जायेगी क्योंकि भारतीय पंचायती राज व्यवस्था के कारण ही भारतीय राजनेताओं को अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों में कोई विशेष मेहनत करने की आवश्यकता नहीं होती और वे नेता अपना चुनाव जीत जाते हैं ।

जहां पंचायती राज व्यवस्था लागू है और ऐसी जगह जहाँ पंचायती राज व्यवस्था लागू नहीं है ऐसे स्थानों पर भारतीय राजनेताओं को अपेक्षाकृत अधिक मेहनत करनी पड़ती है और फिर भी चुनाव जीतना मुश्किल हो जाता है ।

भारतीय पंचायती राज व्यवस्था राज्य राजनीति और राष्ट्रीय राजनीति लिए एक ऐसा अंग है जिसके बिना जीवन अधूरा है । भारत में कहने तो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन वास्तविकता यह है कि लोकतंत्र में नेता सीधे जनता के सम्पर्क में होना चाहिए था जबकि भारतीय लोकतंत्र में नेता जनता के स्थान पर एजेन्टों के सम्पर्क में होते है और वे एजेन्ट ही नेताजी को उसकी जीत के लिए आश्वस्त करते      हैं ।

भारतीय लोकतंत्र में शायद ही कोई ऐसा नेता होगा जो आम जनता से सीधे सम्पर्क में हो अन्यथा अधिकतर नेता जनता से सीधे सम्पर्क स्थापित ही नहीं कर पाते । वोटों के ठेकेदारों के बल पर राजनीति करते हैं । ठेकेदार जैसा समझाते हैं वैसा ही वह नेताजी समझते हैं ।

वोटों के ठेकेदार कोई ओर नहीं बल्कि भारतीय पंचायती राज व्यवस्था के पंचायत प्रतिनिधि होते हैं । जो अपना पंचायत प्रतिनिधि होने का भरपूर लाभ उठाते हैं । भारतीय राजनीति के तथाकथित नेताजी भी कम मेहनत में अधिक परिणाम दिखाते हैं ।

यही कारण है कि न तो भारतीय राजनीति के स्तर में सुधार हो पाया है और न ही भारतीय पंचायती राज व्यवस्था में । वर्तमान समय में भारतीय पंचायती राज व्यवस्था और भारतीय राजनीति दोनों एक सिक्के के दो पहलू बन गये हैं । जिसमें एक के बिना दूसरा अधूरा तो है ही साथ ही एक के लक्ष्ण दूसरे में दर्शित भी होते हैं ।

यदि अधिनियम की बात करें तो पंचायती राज अधिनियम 1947 में ऐसे प्रावधान मौजूद हैं कि भारतीय पंचायती राज व्यवस्था किसी अन्य देश की व्यवस्था से भी अधिक सशक्त दिखायी दे लकिन ऐसा तभी सम्भव हो सकता है जब पंचायती राज अधिनियम 1947 का सच्चाई और ईमानदारी के साथ पालन हो अन्यथा स्थिति इससे भी बदतर हो जायेगी ।

उ॰प्र॰ पंचायती राज अधिनियम 1947 कहता है कि धारा-11 के अनुसार वर्ष में दो बार ग्राम सभा की बैठक होना अनिवार्य है । लेकिन सम्पूर्ण भारतवर्ष में जहा पंचायती राज व्यवस्था है ग्राम सभा की बैठक मात्र औपचारिकता है जिसे ग्राम प्रधान व ग्राम सचिव चुपचाप कागजी कार्यवाही कर पूरा कर लेते हैं । इसी प्रकार पंचायती राज व्यवस्था चलती रहती है ।

इसके अलावा पंचायती राज अधिनियम की धारा-11 (3)(क) के अनुसार ग्राम पंचायत के खातों का वार्षिक विवरण, पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष की प्रशासन रिपोर्ट और अन्तिम लेखा परिक्षा टिप्पणी का ब्यौरा ग्राम सभा को देना आवश्यक होता है ।

जबकि ग्राम पंचायतों में ऐसा कुछ भी नहीं किया जाता है जो पंचायती राज अधिनियम की सार्थकता सिद्ध होती दिखायी दे सब कुछ औपचारिकता पूर्ण ही किया जाता है । अधिनियम की धारा-11 (3)(ख) के अनुसार ग्राम पंचायत के विकास कार्यक्रम और चालू वित्तीय वर्ष के दौरान लिये जाने वाले प्रस्तावित विकास कार्यक्रमों की रिपोर्ट दी जाती है । लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं किया जाता जो कुछ होता है ।

वह कुछ इस प्रकार है कि ग्राम सभा के सदस्यों के हस्ताक्षर भी प्रस्तावित कार्यक्रमों पर फर्जी तरीके से ही किये जाते हैं । उन ग्राम सभा के सदस्यों को भनक तक भी नहीं लगती और सब कुछ कार्य विधिवत निपटा दिया जाता है ।

अधिनियम की धारा-29 (2) के अनुसार ग्राम पंचायत की प्रत्येक समिति में एक अनुसूचित सदस्य का होना आवश्यक है जबकि अधिकतर ग्राम पंचायतों में देखा गया है कि अनुसूचित जाति का सदस्य समिति में होना तो बहुत बड़ी बात है अनुसूचित जाति के सदस्य को आज भी नजदीक नहीं आने दिया जाता है ।

देश आजाद है संवैधानिक प्रावधान भी मौजूद हैं लेकिन अस्प्रश्यता का अंत आज भी नहीं हुआ है तभी तो उत्तर प्रदेश के प्राथमिक विद्यालयों में खाना बनाने के लिए अनुसूचित जाति की महिलाओं की नियुक्ति करने पर प्राथमिक विद्यालय के बच्चों ने खाना खाने से इंकार कर दिया ।

यह बच्चों के दिमाग की उपज नहीं थी बल्कि यह विचार उन समाज के ठेकेदारों का था जो कहने को तो समाज में समानता की बात करते हैं अस्प्रश्यता के अंत की बात करते हैं । लेकिन अपनी संकीर्ण मानसिकता को इतनी विस्तृत सोच रखने की हिमाकत नहीं कर सकते और यह सब केवल गांव स्तर पर ही हो रहा है ।

जहां लोग शिक्षित होने के बाद भी अपनी मानसिकता का विकास नहीं कर पाये हैं । पंचायती राज अधिनियम की धारा-32 प्रावधान करती है कि ग्राम निधि का प्रयोग पंचायत के कर्त्तव्यों व दायित्वों को निभाने में प्रयोग करने का प्रावधान करती है ।

लेकिन आमतौर पर देखा जा सकता है कि ग्राम प्रधान ग्राम निधि का प्रयोग गांव हित के स्थान पर निजी हित में अधिक उपयोगी मानते हैं । उसके पीछे उनका तर्क भी होता है कि जब चुनाव के समय लाखों रूपये गांव वाले शराब व दावत आदि पर खर्च करा देते हैं ।

पहले तो वह पैसा ही वसूल किया जाता है तदोपरान्त गांव विकास के विषय में सोचा जा सकता है । अन्यथा गांव विकास और गांव हित से सर्वोपरि अपना विकास और अपना हित ही होता है । यही कारण है कि कानून में प्रावधान होने के बाद भी गांव पंचायत के प्रतिनिधि उनका पालन करना आवश्यक नहीं समझते और निश्चित होकर अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करते हैं तथा इस कार्य में सहयोगी की भूमिका में होते हैं जिला स्तर के और ब्लाक स्तर के विकास अधिकारी जो उन पंचायत प्रतिनिधियों को गांव के विकास कार्य को आने वाले धन को गांव प्रधान द्वारा हज्म करना सिखाते हैं ।

कोई भी व्यक्ति जो सर्वप्रथम चुनकर आता है या ऐसे क्लर्क जो नयी नियुक्ति पाते हैं । शुरूआती समय में ईमानदारी और सच्चाई नामक बीमारी से ग्रसित होते हैं । लेकिन जैसे-जैसे वह अपना समय व्यतीत करते हैं ईमानदारी और सच्चाई नामक बीमारी से स्वस्थ होकर लालच और रिश्वत रूपी सागर में डुबकी लगाना शुरू कर देते हैं ।

जिसका परिणाम हम सभी जनता के सम्मुख होता है कि विकास कार्यों के लिए आने वाले धन में विकास अधिकारियों से लेकर गांव सचिव, अभियन्ता, क्लर्क आदि अपना-अपना हिस्सा पहले ही सुरक्षित कर लेते हैं और जब सभी लोग अपना हिस्सा तय कर लेते हैं तो गांव प्रधान भी क्यों पीछे रहे ।

वह तो फिर यही कौशिश करता है कि गांव का विकास हो या न हो अपना विकास करना ही उसका लक्ष्य बन जाता है क्योंकि वह भली-भांति जानता है कि किसी का कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला चाहे जितना बड़ा गबन किया जाए सब कुछ मिल बांटकर चलता रहता है । यही भातरीय पंचायती राज व्यवस्था है ।

जिसमें सब कुछ विद्यमान है धन भी है । प्रतिनिधि भी है । कानून भी है सरकार का सहयोग भी है । लेकिन अगर कुछ नहीं है तो वह है । दृढ इच्छा शक्ति का अभाव जो गांव पंचायत प्रतिनिधि गांव विकास के लिए नहीं दिखा पाता, हाँ स्वयं का विकास उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता का हिस्सा होता है ।

तभी तो एक योजना गांव प्रधान रहने वाला व्यक्ति अगली योजना जिला पंचायत सदस्य बनने का सपना संजोने लगता है । वह जानता है कि गांव पंचायत के पैकेज से बीस-तीस गुना पैकेज जिला पंचायत सदस्य का होता है ।

यही कारण है कि वह सम्पूर्ण ताकत के साथ जिला पंचायत सदस्य के पैकेज के लिए संघर्ष करता है ओर यदि सौभाग्य से जिला पंचायत सदस्य बन जाता है तो फिर वह व्यक्ति पीछे मुड़कर नहीं देखता है और निश्चित रूप से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय होने का सपना संजोने लगता है उसके पीछे एक ठोस कारण भी विद्यमान है कि एक जिला पंचायत सदस्य लगभग बीस से तीस गांवों का प्रतिनिधित्व करता है और इतने गांवों का प्रतिनिधित्व करने के साथ ही जन सम्पर्क भी अधिक हो जाता है । अपने फालोअर भी बन जाते हैं ।

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साथ ही जिला पंचायत सदस्य को अपने क्षेत्र का विकास कराने के लिए भी कई करोड़ रूपये का पैकेज मिलता है जिसमें जिला पंचायत सदस्य महोदय अपने क्षेत्र के समस्त विकास कार्य अपने चहेते ठेकेदार द्वारा ही कराते हैं ।

जिसमें ठेकेदार महोदय सदस्य महोदय को अच्छा मोटा कमीशन उपलब्ध कराते हैं । जिसमें सुना तो यहाँ तक जाता है कि किसी भी कार्य को अपने चहेते ठेकेदार से कराने पर पच्चीस से तीस प्रतिशत कमीशन जिला पंचायत सदस्य महोदय को मिल जाता है ।

इसके अलावा जो जीत का उपहार सबसे पहले जिला पंचायत सदस्य महोदय को मिलता है वह होता है जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए होने वाले चुनाव में मुँह मांगी रकम जिसमें बामुश्किल पन्द्रह से बीस जिला पंचायत सदस्य एक जिले में होते हैं ।

उनमें से ही किसी एक को जिला पंचायत अध्यक्ष बनाया जाता है जो धन, बल और सत्ता बल के सम्मिश्रण का संयोजन होता है । जिस सदस्य के पास धन, बल, बाहुबल व सत्ता बल होता है वह सदस्य जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव जीतकर कई करोड का मालिक तो बनता ही है साथ ही जो अधिकार उसको मिलते हैं ।

वह भी कुछ कम नहीं होते । जिला पंचायत अध्यक्ष जिलाधिकारी के साथ बैठकर विकास कार्यो को कराने की समीक्षा करते हैं । साथ ही लालबत्ती लगी सरकारी गाड़ी, सुरक्षा गार्ड और ड्राईवर के साथ मिलती है तो ऐसे राजशाही ठाठ की कौन इच्छा नहीं करता ।

जिला पंचायत अध्यक्ष पद का चुनाव जीतने के लिए प्रत्याशी प्रति जिला पंचायत सदरच पच्चीस से तीस लाख रूपये तक की बोली लगाई जाती है और सहर्ष जिला पंचायत सदस्य इतनी रकम प्राप्त कर सम्बंधित प्रत्याशी के पक्ष में मतदान कर उसको जिला पंचायत अध्यक्ष बनवाने का कार्य करते हैं ।

अब जिस व्यक्ति को इतनी मोटी रकम पंचायत राजनीति से प्राप्त होती है तो क्या ऐसा व्यक्ति अपनी महत्वाकांक्षा को रोक पायेगा । वह निश्चित रूप से प्रदेश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का प्रयत्न करेगा ।

इस तरह हम कह सकते हैं कि भारतीय पंचायती राज व्यवस्था भारतीय राजनीति का दर्पण है । जिसके बिना भारतीय राजनीति में भागीदारी करना असम्भव है । उ॰प्र॰ पंचायती राज अधिनियम की धारा-40 प्रावधान करती है कि प्रत्येक वर्ष ग्राम पंचायत की लेखा परीक्षा होगी ।

लेकिन वास्तविकता यह है लेखा परीक्षा तो अवश्य होती है । कुछ भी टिप्पणी या स्पष्टीकरण नहीं मागा जाता और इसी से उत्साहित होकर पंचायत प्रतिनिधि विकास कार्यो को मिलने वाले धन को डकारते रहते हैं । इस बात के प्रमाण उपलब्ध हैं कि गांवों का विकास केवल कागजी कार्यवाही तक ही सिमट कर रह जाता है ।

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जिस पर चाहे कितना ही हायतौबा क्यों न होता रहे लेकिन स्थिति में सुधार कर पाना न तो सरकार के बूते की बात है और न ही गांव के निवासियों की । पंचायती राज अधिनियम की धारा-41 प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ग्राम पंचायत के बजट का प्रावधान करती है लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि ऐसा कोई बजट न तो बनाया जाता है और न ही पारित किया जाता है सब कुछ परम्परागत रूप से चल रहा है ।

यह केवल एक राज्य विशेष का प्रकरण नहीं है बल्कि अधिकतर राज्यों की ग्राम पंचायतों में यही हाल है । इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि अधिनियमानुसार ग्राम पंचायत और वास्तविक ग्राम पंचायत में बहुत भारी अन्तर है ।

केन्द्र सरकार द्वारा लागू महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना अधिनियम का हश्र भी ग्राम पंचायतों की तरह ही रहा है जिनमें ग्राम प्रधानों द्वारा केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी योजना को भी धराशायी कर दिया है । उक्त योजना में ग्रामीण क्षेत्रों में बेराजगार लोगों को सौ दिन का सौ रूपये प्रतिदिन के हिसाब से मजदूरी मिलती है ।

लेकिन उसमें जो खेल खेला जाता है उसको देखकर तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि जब ऐसी योजना जिस पर केन्द्र सरकार सीधे-सीधे हस्तक्षेप कर रही है और उसके बाद भी ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों द्वारा योजना का इन्तकाल कर दिया गया ।

जिसमें न तो कोई काम किया गया और भुगतान कर दिया गया और मजदूरों की सूचि में ऐसे लोगो के नाम लिख दिये गये । जिन लोगों की शरीरिक क्षमता मजदूरी तो दूर स्वय अपना बोझ उठाने में सक्षम नहीं है वे मनरेगा का लाभ उठा ले गये । जिससे प्रतीत होता है कि भारतीय पंचायती राज व्यवस्था अपने कितने बुरे दौर से गुजर रही है और जिसको सुधार पाना अब मुश्किल ही नहीं नामुंकिन जान पड़ता है ।

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