List of five essay on ‘Indian Politics’ (written in Hindi Language0

Content:

  1. भारतीय स्वशासन: विकास एवं स्वरूप |
  2. भारतीय संविधान एवं राज व्यवस्था |
  3. भारतीय लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली |
  4. प्रजातान्त्रिक व्यवस्था और लोकमत |
  5. मौलिक अधिकार |

List of Essays on Indian Politics

Hindi Essay # 1 भारतीय स्वशासन: विकास एवं स्वरूप | Indian Self-Government : Development and Nature

1. प्रस्तावना ।

2. भारतीय स्वशासन का स्वरूप एवं कार्य विभाजन ।

(क) नगर निगम । (ख) नगरपालिकाएं ।

(ग) अधिसूचित क्षेत्र समिति ।

3. स्थानीय संस्थाओं के कार्य ।

4. आय के साधन ।

5. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

स्थानीय स्वशासन को प्रजातन्त्र का प्राण कहा जाता है; क्योंकि स्थानीय स्वशासन के माध्यम से जनता स्वयं शासन करती है । प्रशासन जनता के क्रियाशील रहता है । प्रजातन्त्र की प्राप्ति स्थानीय स्वशासन के माध्यम से ही सम्भव है ।

ADVERTISEMENTS:

स्थानीय स्वशासन का महत्त्व प्रारम्भ से ही रहा है । वर्तमान युग में राज्यों की विशालता और प्रजातन्त्र के कारण इसका महत्त्व बढ़ गया है । स्थानीय स्वशासन में राज्य को स्वायत्त शासन की छोटी-छोटी इकाइयों में बांट दिया जाता है ।

उन क्षेत्रों के विकास कार्यो का सम्पादन उक्त स्थान की जनता निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा करती है । जी॰डी॰एच॰ कोल के शब्दों में-स्थानीय स्वशासन से तात्पर्य ऐसे शासन से है, जो सीमित होने के लिए कार्य करता है तथा हस्तान्तरित अधिकारों का प्रयोग करता है ।

भारतीय संविधान में स्थानीय संस्थाओं के विकास पर जोर देकर इसे राज्य सूची में रख दिया है । इस पर राज्यों का पूर्ण अधिकार है ।

2. भारतीय स्वशासन का स्वरूप एवं कार्य विभाजन:

भारतीय स्वशासन को दो भागों-शहरी और ग्रामीण-में बांटा गया है । शहरी क्षेत्रों में मुख्यत: 3 प्रकार की स्थानीय संस्थाएं होती हैं: (क) नगर निगम, (ख) नगरपालिकाएं (ग) अधिसूचित क्षेत्र समिति ।

इसके अतिरिक्त किसी-न-किसी शहर में स्थानीय विशेषताओं के अनुसार अन्य प्रकार की संस्थाएं पायी जाती हैं, जैसे-कैंटोनमेन्ट बोर्ड व पोर्ट, ट्रस्ट, सुधार न्यास । ग्रामीण क्षेत्रों में पहले जिला बोर्ड, लोकल बोर्ड, ग्राम पंचायतें तथा मुख्य स्थानीय संस्थाएं

थी ।

अब जिला बोर्ड और लोकल बोर्ड को समाज कर इसका शासन सरकार ने अपने हाथों में ले लिया है । स्थानीय संस्थाओं के पुनर्गठन के लिए नये सुझाव के अन्तर्गत पंचायती राज को अपनाया गया है । इस प्रकार ग्रामीण स्तर पर ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद हैं ।

(क) नगर निगम:

भारत में बड़े तथा महानगरों में नगर निगम की स्थापना की जाती है । बड़े-बड़े नगरों की समस्याएं और आवश्यकताएं अपने ढंग की होती है । इनका समाधान नगर निगम करता है ।

महानगरों में ऊंचे दर्जे का शासन मुम्बई, पूना, अहमदाबाद, नागपुर, जबलपुर, पटना, कोलकाता, मद्रास आदि शहरों में है । प्रत्येक निगम की सर्वोच्च संस्था निगम परिषद कहलाती है । इसके निर्वाचित सदस्यों में कुछ पदेन मनोनीत सदस्य होते हैं । निगम का एक मेयर तथा डिपुटी मेयर होता है । एक प्रशासकीय अधिकारी होता है, जिसे कार्यपालक अधिकारी या निगम आयुक्त कहते हैं ।

(ख) नगरपालिका:

ADVERTISEMENTS:

इसकी स्थापना छोटे शहरों में की जाती है । प्रत्येक राज्यों में इसकी कुछ निश्चित शर्ते होती हैं, जिसे पूरा करने पर ही इसकी स्थापना होती है । प्रत्येक नगरपालिका में एक परिषद होती है ।

इसके कुछ सदस्य कमिश्नर कहलाते हैं । उनका निर्वाचन सार्वजनिक वयस्क मताधिकार द्वारा होता है । कुछ सदस्य मनोनीत भी होते हैं । एक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का निर्वाचन भी होता है ।

लोकल बोर्ड:

जिस तरह जिला का जिला बोर्ड होता है, उसी तरह प्रत्येक सबडिवीजन के लिए लोकल बोर्ड होता है । यह देहाती क्षेत्रों के लिए महत्त्वपूर्ण स्थानीय स्वशासन इकाई है । यह संस्था जिला बोर्ड के नियन्त्रण का काम करती है ।

इसके लिए सदस्यों का निर्वाचन नहीं होता है, बल्कि सबडिवीजन के जिला बोर्ड के सदस्य इसके भी सदस्य होते हैं । पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने के कारण जिला बोर्ड के साथ इसे भी भंग कर दिया गया ।

ग्राम पंचायत:

ADVERTISEMENTS:

भारतीय स्थानीय संस्थाओं में ग्राम पंचायत सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण संस्था है । पंचायती राज व्यवस्था के लागू होने के बाद इसका महत्त्व काफी बढ़ गया है । ग्राम पंचायत के मुख्य प्रशासकीय अंश इस प्रकार हैं: ग्राम-सभा, कार्यकारिणी समिति, मुखिया, ग्राम सेवक, ग्राम रक्षा दल और ग्राम कचहरी । ग्राम-सभा पंचायत की आम सभा है ।

कार्यकारिणी समिति में कार्यपालिका की शक्ति निहित रहती है । इसके आधे सदस्य मुखिया द्वारा मनोनीत एवं आधे सदस्य ग्राम-सभा द्वारा निवर्तचइत होते हैं । मुखिया कार्यकारिणी समिति का प्रधान होता है ।

उसका निर्वाचन प्रत्यक्ष रीति से पंचायत के समस्त सदस्यों द्वारा होता है । ग्राम सेवक एक सरकारी कर्मचारी होता है, जो पंचायत सचिव के रूप में कार्य करता है । ग्राम रक्षा दल का संगठन शान्ति और सुरक्षा द्वारा किया जाता हैए । ग्राम कचहरी पंचायत की न्यायिक इकाई है । आधे सरपंचों का मनोनयन होता है, आधे का

निर्वाचन ।

पंचायती राज:

ADVERTISEMENTS:

पंचायती राज प्रजातान्त्रिक विकेन्द्रीयकरण भारतीय प्रशासन की क्रान्तिकारी देन है । इसका अर्थ है: शासन की इकाइयों का जनता के द्वारा निर्वाचन हो, साथ-साथ नीचे की इकाइयों को निजी शक्तियां प्राप्त हों । इस योजना के अन्तर्गत देहाती क्षेत्रों के लिए त्रिस्तरीय संस्थाएं स्थापित की गयी हैं । इसलिए एक मुख्य कार्यपालक होता

है ।

सुधार न्यास:

बड़े-बड़े शहरों के सुधार, विकास तथा विस्तार के उद्देश्य से सुधार न्यास की स्थापना की जाती है । यह सरथा अस्थायी होती है । इसकी स्थापना राज्य सरकार द्वारा की जाती है । मुम्बई, कोलकाता, दिल्ली, अमृतसर, जालन्धर, मद्रास, लखनऊ, इलाहाबाद, नागपुर, पटना, रांची, गया, मुजपफरपुर आदि शहरों में सुधार न्यास की स्थापना की गयी है ।

अधिसूचित क्षेत्र समिति:

जब कोई देहात क्रमश शहर का रूप लेने लगता है, तो वहा अधिसूचइत क्षेत्र समिति की स्थापना की जाती है । समिति के सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत होते हैं । इनकी संख्या 40-50 तक होती है ।

ADVERTISEMENTS:

इसका अध्यक्ष एक सरकारी पदाधिकारी होता है । समिति का उपाध्यक्ष भी होता है । समिति के कार्य प्राय: वही होते हैं, जो नगरपालिका के होते हैं । कुछ आलोचक इसे अव्यावहारिक एवं अप्रजातान्त्रिक मानते हैं ।

पोर्ट ट्रस्ट:

भारत के बड़े-बड़े बन्दरगाहों के लिए पोर्ट ट्रस्ट की स्थापना की जाती है । मद्रास मुम्बई, कोलकाता में ये स्थापित हैं । इसके सदस्य सरकार द्वारा मनोनीत होते

हैं । इसका मुख्य कार्य बन्दरगाहों की देख-रेख, घाट की व्यवस्था, नावों तथा जहाजों का प्रबन्ध आदि है । इसकी आय के प्रमुख स्त्रोत जहाजी कर, सामानों के उतारने व लादने पर कर, गोदामों के भाड़े व सरकारी अनुदान हैं ।

कैंटोनमेन्ट बोर्ड:

कई शहरों में सेना की छावनियां होती हैं । इन छावनियों की स्थायी व्यवस्था के लिए इसकी स्थापना की जाती है । जैसे दानापुर, रामगढ़ ।

जिला बोर्ड:

भारत में जिला बोर्ड का इतिहास काफी पुराना है । राज्य शासन जिले के कार्यों के संचालन के लिए इसका गठन करता है । इसकी एक परिषद् होती है । इसके तीन सदस्य होते हैं, जिनमें निर्वाचित, मनोनीत और सरकारी सदस्य होते हैं ।

जिला बोर्ड का चुनाव 6 वर्ष के लिए होता है । लोकल बोर्ड-जिस तरह जिले के लिए जिला बोर्ड होता है, सबसे ऊपर जिला स्तर पर जिला परिषद्, मध्य में पंचायत समिति, निम्न स्तर पर पंचायत होती है ।

पंचायत का चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जनता द्वारा होता है । पंचायत समिति पंचायतों के मुखिया तथा उस क्षेत्र की कुछ अन्य संस्थाओं के प्रतिनिधियों द्वारा संगठित होती

है ।

जिला परिषद का संगठन पंचायत समितियों के प्रमुखों तथा अन्य संस्थाओं के प्रतिनिधियों द्वारा होता है । पंचायत और पंचायत समितियों को अपने क्षेत्र में विकास योजनाओं का निर्माण करने तथा कर लगाने का अधिकार होगा ।

पंचायत समिति अपने क्षेत्र के सभी पंचायतों का निरीक्षण करती है तथा उसकी विकास योजनाओं को मिलाकर पूरे प्रखण्ड के लिए योजना तैयार करती है । जिला परिषद अपने अधीनस्थ पंचायत समितियों के कार्यो, योजनाओं का निरीक्षण एवं समन्वयीकरण कर निर्णय लेने का अधिकार भी रखती है ।

सिद्धान्त रूप में केन्द्रीय सरकार व राज्य सरकारों ने पंचायती राज योजना को स्वीकृति दे दी है, जिसे थोड़े बहुत संशोधनों, के बाद प्राय: सभी राज्यों में लागू कर दिया गया है ।

स्थानीय संस्थाओं के कार्य:

भारत में स्थानीय संस्थाओं के सीमित कार्य हैं । अनिवार्य तथा ऐच्छिक प्रमुख रूप से दो कार्य हैं ।

अनिवार्य कार्य:

वे कार्य, जिन्हें किन्हीं स्थानीय संस्थानों को हर हालत में करना पड़ता है । उदाहरणस्वरूप, नगरपालिका के प्रमुख अनिवार्य कार्य हैं: सड़क निर्माण एवं मरम्मत, सफाई, शिक्षा व्यवस्था, रोशनी, जल-व्यवरथा, पाखानों व नाली की सफाई आदि ।

ग्राम पंचायत के अनिवार्य कार्य:

स्वास्थ्य सुधार, मल-मूत्रों की सफाई, फसल जानवर से सम्बन्धित आवश्यक आकडो और सूचनाओं का संग्रह, आग, अकाल, महामारी, चोरी से सुरक्षा ।

ऐच्छिक कार्य:

वे कार्य, जिन्हें स्थानीय संस्थाएं अपनी आमदनी के अनुसार राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के बाद ही सम्पादित करती हैं । यातायात की व्यवस्था, पागलखाने का प्रबन्ध, अजायबघर की व्यवस्था, स्नानागार, बिजली, पार्क, आरामघर, पशुपालन

घाट ।

ग्राम पंचायत के ऐच्छिक कार्य:

गलियों में रोशनी का प्रबन्ध, सड़कों के दोनों ओर वृक्ष लगाना, पुस्तकालय खोलना, तालाब खुदवाना, धर्मशाला का प्रबन्ध, हाट व मेला लगवाना ।

4. आय के साधन:

भारत में स्थानीय स्वायत्त संस्थाओं के आय के कई साधन हैं, जिसमें नगर निगम एवं नगरपालिका के आय के साधन-चुंगी कर, सम्पत्ति कर, कर्ज और अनुदान हैं ।

ग्राम पंचायत के आय के साधन:

अनिवार्य कर, अनुपूरक कर, शुल्क व सरकारी अनुदान, सामान्य कर, जल, शौचालय, रोशनी कर, लाइसेंस फीस, मालगुजारी से पंचायतें दस प्रतिशत कमीशन प्राप्त करती हैं ।

5. उपसंहार:

इस तरह स्पष्ट है कि भारतीय स्थानीय स्वशासन प्रजातन्त्र की ऐसी श्रेष्ठ व्यवस्था है, जो छोटी-छोटी इकाइयों में भी सफलतापूर्वक कार्य निव्यादन करती है । इस तरह सरकारी नियन्त्रण तीन तरह से होता है: 1. प्रशासकीय, 2. विधायी और 3. न्यायिक व आर्थिक ।

इसके द्वारा यह देखा जाता है कि स्थानीय संस्थाएं सरकार द्वारा नियमित नियमों का पालन कर रही हैं या नहीं । पंचायती राज-व्यवस्था स्थानीय शासन की अत्यन्त सफल व व्यावहारिक योजना एवं शासन है ।


Hindi Essay # 2 भारतीय संविधान एवं राज व्यवस्था | Indian Constitution and Polity

1. प्रस्तावना ।

2. भारतीय संबिधान का दावा ।

3. संघ तथा उनका क्षेत्र ।

4. नागरिकता ।

5. संविधान की विशेषताएं ।

6. मौलिक अधिकार एवं नीति निर्देशक तत्त्व ।

7. मौलिक कर्तव्य ।

8. संघ का स्वरूप-कार्यपालिका-राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, मन्त्रिपरिषद ।

9. विधायिका-लोकसभा, राज्यसभा, संसदीय समितियां ।

10. न्यायपालिका-उच्चतम न्यायालय, मुख्य न्यायाधीश, महान्यायवादी, उच्च न्यायालय ।

11. कार्यपालिका-राज्यपाल, मन्त्रिपरिषद, विधानमण्डल, विधान परिषद, विधान सभा, केन्द्रशासित प्रदेश, अन्तर्राज्यीय परिषद, पंचायती राज ।

12. चुनाव आयोग ।

13. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया था । इसका निर्माण केबिनेट मिशन योजना के प्रावधानों के तहत किया गया । प्रारम्भ में संविधान सभा के सदस्यों की संख्या 389 थी ।

संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसम्बर, 1947 को हुई । इसके अस्थायी अध्यक्ष डॉ॰ सच्चिदानन्द सिन्हा थे । 26 जनवरी, 1949 को जब इसे अंगीकार किया गया था, तब संविधान सभा के सदस्यों की संख्या 284 हो गयी थी ।

सिन्हा के निधन के पश्चात् डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष बने । भारत का संविधान बनने में कुल 2 वर्ष 11 महीने 18 दिन लगे । 26 जनवरी, 1949 को पूर्ण होने के बाद उसे उसी दिन पारित कर दिया गया था ।

संविधान सभा के लिए विभिन्न समितियों का गठन किया गया था, जैसे-प्रक्रिया समिति, संचालन समिति, संविधान समिति, जिसमें सर्वप्रथम प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ॰ अम्बेडकर को बनाया गया था । डॉ॰ अम्बेडकर संविधान के पिता कहे जाते हैं । डॉ॰ बी॰एन॰ राव को संविधान सभा का संवैधानिक सलाहकार नियुक्त किया गया था ।

2. भारतीय संविधान का ढांचा:

भारत का संविधान ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली के नमूने पर बनाया गया है । मौलिक अधिकार, उपराष्ट्रपति, उच्चतम न्यायालय का गठन एवं शक्तियां तथा न्यायिक पुनर्विलोकन संयुक्ता राज्य अमेरिका से, संघात्मक व्यवस्था कनाडा से, आयरलैण्ड से नीति निर्देशक तत्त्व, राष्ट्रपति चुनाव प्रणाली जर्मनी से, आपात उपबन्ध तथा मौलिक कर्तव्य सोवियत रूस से, गणतन्त्र फ्रास से, आस्ट्रेलिया से समवर्ती सूची, प्रस्तावना की भाषा तथा केन्द्र राज्य के बीच शक्तियों का विभाजन दक्षिण अफ्रीका से, संविधान संशोधन जापान से व कानून द्वारा स्थापित शब्दावली ग्रहण की गयी ।

भारत का संवैधानिक ढांचा चार परिशिष्टों में है: 1. प्रस्तावना, 2. भाग 1 से 22 तक के भाग में 1 से लेकर 395 धाराएं, 3. 1 से 10 तक अनुसूचियां, 4.परिशिष्ट में संविधान को जम्यू-कश्मीर में लागू किया गया ।

3. संघ तथा उनका क्षेत्र:

संविधान की प्रस्तावना में भारत को एक सर्श्वा प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया है । संविधान के सभी उद्देश्यों में सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक न्याय दिलाना, विचारों की अभिव्यक्ति, धर्म विश्वास एवं पूजा-पाठ की स्वतन्त्रता तथा अवसरों की समानता प्रदान की गयी है ।

व्यक्ति तथा राष्ट्र की गरिमा एवं अखण्डता की रक्षा करने का वर्णन है । भारत को राज्यों का संघ माना गया है । इसके 26 भाग, 444 अनुच्छेद एवं अनुसूचियों में 28 गणराज्यों, 7 केन्द्रशासित प्रदेशों का वर्णन है ।

इसमें अधिकारों का विभाजन वीं अनुसूची में है, जिसमें केन्द्र तथा राज्यों के बीच विधायी शक्तियों का वितरण सम्बन्धित संघ के 99 विषय, राज्य सूची में 61 विषय, समवर्ती सूची में 52 विषय हैं । इसमें संघ सरकार को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त है ।

समवर्ती सूची में केन्द्र व राज्य सरकार दोनों को कानून बनाने का अधिकार प्राप्त

है । जिन विषयों का वर्णन समवर्ती सूची में नहीं है, उन पर कानून बनाने का अधिकार केवल संघ को है । अवशिष्ट शक्तियों में संघ व राज्य के द्वारा बनाये गये कानूनों में टकराव की स्थिति में संघ के कानून को मान्यता होती

4. भारतीय नागरिकता:

भारतीय संविधान के भाग 2 में अनुच्छेद 5 से 11 तक नागरिकता सम्बन्धी उपबन्धों की विस्तार से विवेचना है । भारतीय संविधान के अनुसार-भारत के सभी नागरिकों को एकल नागरिकता का अधिकार प्राप्त है ।

सामान्य रूप से दोहरी नागरिकता की त्यवरथा है । ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को नागरिकता का अधिकार दिया गया है: 1. जो भारत मे जन्मा हो, 2. या संविधान लागू होने के पांच वर्षो पूर्व भारत में रह रहा हो ।

5. भारतीय संविधान की विशेषताएं:

1. लिखित व सर्वाधिक व्यापक संविधान है, 2. कठोर व लचीला है, 3. सर्वप्रभुत्व सम्पन्न लोकतन्त्रात्मक गणराज्य है, 4. समाजवादी राज्य है, 5, धर्मनिरपेक्ष है,

6. एकात्मक एवं संघात्मक है, 7. मौलिक अधिकार एवं कर्तव्यों का महत्त्व है,

8. नीति निर्देशक तत्त्वों की रग्ग्ष्ट व्याख्या है, 9. स्वतन्त्र न्यायपालिका की व्यवस्था है, 10. वयरचा मताधिकार को महत्व है, 11. अल्पसंख्यकों के साथ-साथ पिछड़े वर्गो के कल्याण पर बल है, 12. एकल नागरिकता की व्यवस्था है, 13. सामाजिक समानता पर बल दिया गया है, 14. संकटकालीन प्रावधानों का भी ध्यान रखा गया है, 15. लोककल्याणकारी राज्य का आदर्श है, 16. एक राजभाषा राष्ट्रभाषा हिन्दी की व्यवस्था है, 17. ग्राम पंचायतों की स्थापना पर विशेष बल दिया गया है, 18. विश्वशान्ति को समर्थन दिया गया है ।

6. मौलिक अधिकार एवं नीति निर्देशक तत्त्व:

संविधान के भाग 2 में तथा 12 से 35 तक भारतीय नागरिकों को सात मौलिक अधिकार दिये गये हैं: 1. समानता का अधिकार-कानून की समानता, धर्म, मूल, वंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध तथा रोजगार का समान अधिकार ।

2. स्वतन्त्रता का अधिकार-विचार, अभिव्यक्ति, संस्था, संघ बनाने की स्वतन्त्रता, व्यवसाय. भ्रमण करने की स्वतन्त्रता । 3. शोषण से रक्षा । 4. धर्म की स्वतन्त्रता । 5. सांस्कृतिक तथा शिक्षा का अधिकार । 6. सम्पत्ति का अधिकार । 7. संवैधानिक उपचारों का अधिकार (बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्येक्षण, अधिकार

पृच्छा ।)

नीति निर्देशक तत्त्व:

संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से । तक राज्य के नीति निर्देशक तत्त्व समाहित हैं । नीति निर्देशक तत्त्व भारत को लोककल्याणकारी राज्य बनाने के उद्देश्य से प्रेरित हैं । यह न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं ।

7. मौलिक कर्तव्य:

संविधान के 42वें संशोधन अधिनियम 1976 के द्वारा संविधान के भाग 4(क) तथा अनुच्छेद 51(क) में भारतीय नागरिकों के 10 मौलिक कर्तव्य दिये गये हैं:

1. संविधान के प्रति निष्ठा और इसके आदर्शो, संस्थाओं, राष्ट्रीयध्वज व गान के प्रति सम्मान, 2. स्वतन्त्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आन्दोलनों को प्रेरित करने वाले उच्चादर्शो को संजोये रखकर उसका पालन करना, 3. भारत की प्रभुता, एकता और अखण्डता की रक्षा कर उसे अक्षुण्ण बनाना, 4. देश की एकता, अखण्डता की रक्षा एवं राष्ट्रसेवा; 5. समस्त भारतीयों में भाईचारा एवं स्नेह को बढ़ावा देना, महिलाओं की गरिमा की रक्षा; 6. अनेकता में एकता वाली संस्कृति को संरक्षण व सम्मान देना;

7. प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें वन, झीलें और वनजीवन शामिल हैं, को संरक्षण व बढ़ावा देना, जीवित प्राणियों के प्रति रनेह भाव रखना; 8. वैज्ञानिक सोच, मानवता और ज्ञानार्जन की चेतना का विकास; 9. सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करना और हिंसा का त्याग करना; 10. व्यक्तिगत एवं सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता लाने का प्रयास, जिससे राष्ट्र निरन्तर उन्नति व सफलता की ओर बढ़े ।

8. संघ का स्वरूप कार्यपालिका:

संघीय कार्यपालिक के शीर्ष पर भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमन्त्री के नेतृत्व में एक मन्त्रिपरिषद् होता है । सघ की कार्यपालिका की शक्ति अनुच्छेद 53 के अनुसार राष्ट्रपति में निहित होती है । इसका प्रयोग वह संविधान के अनुसार स्वयं अथवा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों द्वारा करेगा ।

राष्ट्रपति:

राष्ट्रपति का निर्वाचन एक निर्वाचक मण्डल के सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा करते हैं । इस निर्वाचक मण्डल में संसद के दोनों सदनों एवं राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य होते हैं ।

राष्ट्रपति का कार्यकाल 5 वर्षो का होता है । वह इस पद पर पुन: चुना जा सकता

है । उसे अनुच्छेद 61 में निहित कार्यविधि एवं महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है । कार्यपालिका के सभी अधिकार राष्ट्रपति में निहित हैं ।

वह इसका प्रयोग संविधान के अनुसार कर सकता है । रक्षा सेनाओं की सर्वोच्च कमान भी राष्ट्रपति के पास होती है । राष्ट्रपति को संसद का अधिवेशन बुलाने, उसे स्थगित करने, उसमें भाषण देने, लोकसभा भंग करने, संवैधानिक, संकटकालीन स्थितियों में अध्यादेश जारी करने, अपराधी की सजा कम करने, माफ करने, उसमें परिवर्तन करने का अधिकार है ।

किसी राज्य में संवैधानिक व्यवस्था असफल हो जाने पर उस सरकार के सम्पूर्ण अधिकार तथा कुछ अधिकार राष्ट्रपति के पास आ जाते हैं । संकटकालीन परिस्थितियों, बाह्य आक्रमण, युद्ध तथा विद्रोह के समय आपातकाल की घोषणा कर सकता है ।

आर्थिक संकट की स्थिति में सरकारी कर्मचारियों के वेतन में कमी भी कर सकता

है । वह प्रधानमन्त्री की सलाह से मन्त्रिपरिषद के सदस्यों को पद व गोपनीयता की शपथ दिलाता है । वह उपराष्ट्रपति, राज्यपालों, न्यायाधीशों, मुख्य न्यायाधीश, लोकसेवा आयोग के अध्यक्ष आदि की नियुक्ति करता है । राष्ट्रपति की अनुमति के बिना कोई भी वित्त विधेयक संसद में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है ।

उपराष्ट्रपति:

उपराष्ट्रपति राज्यसभा का पदेन सभापति होता है । जब राष्ट्रपति बीमारी या अन्य किसी कारण से कार्य करने में असमर्थ रहता है, तो नये राष्ट्रपति के चुने जाने तक वह कार्यवाहक राष्ट्रपति होता है ।

उपराष्ट्रपति का चुनाव भी आनुपातिक प्रतिनिधित्व के एकल संक्रमणीय मत द्वारा दोनों सदनों के सदस्य एवं निर्वाचक मण्डल के सदस्यों द्वारा होता है । इनका कार्यकाल 5 वर्ष का होता है ।

मन्त्रिपरिषद:

यद्यपि राष्ट्रपति को गणतन्त्र का संवैधानिक अध्यक्ष माना गया है, तथापि वास्तविक धरातल पर सर्वाधिक शक्तिशाली संस्था व सत्ता और राजनीति का स्त्रोत मन्त्रिपरिषद है । प्रधानमन्त्री ही वास्तविक कार्य निबाहता है ।

संविधान के अनुच्छेद 352 में राष्ट्रपति को आपातकालीन स्थिति का विशेषाधिकार दिया गया है, लेकिन वह आपातकाल तभी लगा सकता है, जब उसे मन्त्रिमण्डल का लिखित परामर्श मिल जाये ।

प्रधानमन्त्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करता है तथा अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमन्त्री की सलाह से करता है । प्रधानमन्त्री का कर्तव्य है कि वह भारत संघ के कार्यो, प्रशासन, मन्त्रिपरिषद् के निर्णयों व कानूनों से राष्ट्रपति को अवगत कराता

रहे ।

मन्त्रिपरिषद् में 3 तरह के मन्त्री होते हैं: 1. केबिनेट मन्त्री (वे मन्त्री, जो मन्त्रिमण्डल के सदस्य होते हैं) 2. राज्यमन्त्री (जो विभाग का स्वतन्त्र रूप से कार्य संभाले हो) और

3. राज्य तथा उपमन्त्री ।

9. विधायिका:

संघ की विधायिका को संसद कहते हैं । इसमें राष्ट्रपति और संसद के दोनों सदन-लोकसभा और राज्यसभा-शामिल हैं । संसद की बैठक 6 माह में पिछली बैठक के बाद अवश्य बुलानी चाहिए । कुछ मौकों पर संयुक्त अधिवेशन होता है ।

लोकसभा:

लोकसभा के सदस्य वयस्क मताधिकार के आधार पर सीधे चुने जाते हैं । संविधान में इस समय 552 सदस्यों का प्रावधान है । इनमें से 530 सदस्य राज्यों और 20 सदस्य केन्द्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करते है ।

राष्ट्रपति को एग्लोइण्डियन समुदाय के सदस्यों को उस स्थिति में मनोनीत करने का अधिकार है, जब उन्हें लगे कि इस समुदाय को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला है । लोकसभा का कार्यकाल 5 वर्षो का होता है । आपातकाल में यह स्थिति बढ़ाई जा सकती है, किन्तु आपातकाल के दौरान 6 महीने से अधिक नहीं है ।

राज्यसभा:

राज्यसभा के सदस्यों की संख्या 250 से अधिक नहीं होगी । इसमें 12 सदस्य साहित्य, संगीत, विज्ञान, कला और समाज सेवा में ज्ञान एवं अनुभव रखने वाले व्यक्ति होंगे । शेष 238 सदस्य राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशों के होंगे ।

राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव सम्बन्धित विधान सभाओं के चुने हुए सदस्यों द्वारा एकल संक्रमणीय मत के आधार पर आनुपातिक प्रणाली से होती है । केन्द्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधियों का चुनाव संसद द्वारा निर्धारित कानून के अन्तर्गत किया जा सकता है । राज्यसभा कभी भंग नहीं होती । इसके एक तिहाई सदस्य हर 2 वर्ष बाद अवकाश ग्रहण करते हैं । इसका कार्यकाल 6 वर्ष का होता है ।

संसदीय समितियां:

संसद के कार्य के सुचारु संचालन के लिए स्थायी तथा तदर्थ दो प्रकार की समितियां हैं ।

10. न्यायपालिका:

राज्य की तीसरी शक्ति कार्यपालिका है । इसे संविधान की मौलिक विधि कहा गया है । यह स्वतन्त्र है । इसके अन्तर्गत केन्द्र तथा राज्य सरकार द्वारा बनाये हुए कानूनों की संवैधानिकता का परीक्षण करते हैं ।

यदि संविधान के अनुसार असंवैधानिक पाया जाता है, तो न्यायालय को अमान्य करने का पूर्ण अधिकार है । कार्यपालिका एवं विधायिका द्वारा बनाये गये कानूनों का परीक्षण करने का अधिकार उच्चतम न्यायालय को प्राप्त है ।

उच्चतम न्यायालय:

उच्चतम न्यायालय भारत का सर्वोच्च अपीलीय न्यायालय है । इसे देश के राज्यों के उच्च न्यायालयों के निर्णय के विरुद्ध अपील सुनने का अधिकार है । जम्मू-कश्मीर में कुछ विशेष संवैधानिक प्रावधान है ।

उच्चतम न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश व 7 अन्य न्यायाधीश होते हैं । वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश व 25 न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय के लिए निर्धारित हैं ।

मुख्य न्यायाधीश:

मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है । अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय वह मुख्य न्यायाधीश एवं अन्य उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों का परामर्श ले सकता है । राष्ट्रपति इन्हें अपनी इच्छानुसार हटा भी सकता है या संसद इसे महाभियोग द्वारा दो तिहाई मत द्वारा हटा सकती है ।

महान्यायवादी (एटार्नी जनरल):

भारत के महान्यायवादी की नियुक्ति राष्ट्रपति ही करता है । राष्ट्रपति की इच्छानुसार वह पद पर बना रह सकता है । महान्यायवादी का कर्तव्य है कि वह भारत सरकार को उन विधि सम्बन्धी कार्य करने व कर्त्तव्यपालन की सलाह दे, जो राष्ट्रपति द्वारा सौंपे गये हैं ।

इसे भारत के सभी न्यायालयों में सुनवायी करने व संसद की कार्रवाई में भाग लेने को अधिकार प्राप्त है, किन्तु संसद में मतदान का अधिकार नहीं दिया गया ।

उच्च न्यायालय:

देश-भर में 19 उच्च न्यायालय हैं । प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश व द्बप्य न्यायाधीश होते हैं, जिनकी नियुक्ति राष्ट्रपति व राज्यपाल के परामर्श से की जाती है । इन्हें महाभियोग द्वारा हटाया जा सकता है ।

11. कार्यपालिका:

भारत के राज्यों के लिए भी संसदीय प्रणाली के अनुसार कार्यपालिका की व्यवस्था की गयी है । इसके अन्तर्गत राज्यपाल, मन्त्रिपरिषद्, विधानमण्डल, विधान परिषद, विधान सभा, केन्द्रशासित प्रदेश, अन्तर्राज्यीय परिषद, पंचायती राज आते हैं ।

राज्यपाल:

राज्य की कार्यपालिका के अन्तर्गत राज्यपाल, मुख्यमन्त्री तथा उसकी मन्त्रिपरिषद होती है । राज्यपाल की नियुक्ति भारत का राष्ट्रपति 5 वर्षो के लिए करता है । मुख्यमन्त्री के नेतृत्व में उसकी मन्त्रिपरिषद् राज्यपाल को उनके कार्यो में सहायता करती है तथा उसे सलाह भी देती है ।

मन्त्रिपरिषद:

मुख्यमन्त्री राज्यपाल द्वारा नियुक्त किया जाता है तथा उसी के द्वारा मुख्यमन्त्री की सलाह से अन्य मन्त्रियों की नियुक्ति की जाती है । मन्त्रिपरिषद् सामूहिक रूप से विधानसभा के प्रति उत्तरदायी होता है ।

विधानमण्डल:

प्रत्येक राज्य में एक विधानमण्डल होता है, जिसके अन्तर्गत राज्यपाल के अतिरिक्त 1 या 2 सदन होते हैं । बिहार, महाराष्ट्र, कर्नाटक, जम्मू-कश्मीर, उत्तरप्रदेश में विधानमण्डल के दो सदन हैं, जिन्हें विधान परिषद एवं विधान सभा कहते हैं । संसद कानून बनाकर किसी राज्य में एक ही सदन की व्यवस्था कर सकती है ।

विधान परिषद:

प्रत्येक राज्य की विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या राज्य की विधान सभाओं की कुल संख्या के एक तिहाई से अधिक तथा 40 से कम नहीं होगी । परिषद के एक तिहाई सदस्य उस राज्य की विधान सभा द्वारा उन व्यक्तियों में से निर्वाचित किये जाते है, जो विधान सभा के सदस्य नहीं हैं ।

एक तिहाई सदस्यों का निर्वाचन नगरपालिका, जिला बोर्डों, राज्य के अन्य स्थायी निकायों के सदस्यों के निर्वाचक मण्डल करते हैं । साहित्य सेवा, समाज, विज्ञान, कला तथा सहकारिता आदि में प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्ति इसके सदस्य होते हैं । इसका विघटन नहीं होता । एक तिहाई सदस्य दूसरे वर्ष की समाप्ति पर सेवा निवृत्त होते रहते

हैं ।

विधान सभा:

किसी राज्य की विधान सभा में अधिक-से-अधिक 500 तथा कम-से-कम 60 सदस्य होते हैं । इनका निर्वाचन राज्य के प्रत्येक क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों के जनसंख्या और निर्धारित स्थानों के बीच संख्या अनुपात जहां तक सम्भव हो राज्य में बशर्ते समान रहे के आधार पर होता है । इसका कार्यकाल 5 वर्षो का है ।

केन्द्रशासित प्रदेश:

केन्द्रशासित प्रदेशों का शासन राष्ट्रपति द्वारा चलाया जाता है । वह अपने ही नियुक्त प्रशासक के माध्यम से कार्य करता है । अण्डमान-निकोबार, दिल्ली, पाण्डिचेरी के शासक उच्च राज्यपाल कहलाते हैं ।

अन्तर्राज्यीय परिषद:

राज्यों के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए परिषद होती है, जो अन्तर्राज्यीय विवादों की जांच-पड़ताल करती है । पारस्परिक हितों से सम्बद्ध विषयों पर विचार-विमर्श व शोध करती है ।

पंचायती राज:

सत्ता के विकेन्द्रीयकरण के लिए भारत के विभिन्न राज्यों में गांव तथा जिलों के स्थानीय स्वशासन की त्रिस्तरीय व्यवस्था है । इसके तीन अंग हैं: 1. ग्राम पंचायत, 2. पंचायत समिति, 3. जिला परिषद । इसका कार्यकाल 5 वर्षो का है । पंचायती राज का मूल उद्देश्य ग्रामीण स्वशासन संस्थाओं का नियोजन करना तथा विकास कार्यक्रमों में सक्रिय भागीदारी निभाना है ।

12. चुनाव आयोग:

संसद और प्रत्येक राज्य के विधान सभा के जनप्रतिनिधियों के निर्वाचन हेतु एक स्वतन्त्र चुनाव आयोग का गठन किया गया है, जिसका प्रमुख आयुक्त होता है, जिसे अध्यक्ष कहा जाता है, जिसकी नियुक्ति समय-समय पर राष्ट्रपति द्वारा निश्चित की जाती है ।

यह पहले एक सदस्यीय था, अब बहुसदस्यीय बनाया गया है । इसका कार्यकाल 5 वर्षो का होता है । इसकी कार्य व शक्तियां हैं: मतदाता सूचियां बनाना, संसद व राज्य विधान मण्डलों के लिए निर्वाचन, राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति का निर्वाचन, राजनैतिक दलों को मान्यता देना, चुनाव चिह आबंटित करना, निर्वाचन की तिथियां एवं कार्यक्रम घोषित करना, आचार संहिता बनाना, मतदाता सूचियों की तैयारी एवं मुद्रण, मतदान अधिकारियों एवं कार्यकर्ताओं की नियुक्ति, प्रत्याशियों का नामांकन, जांच व नाम वापसी, चुनाव प्रचार पर निर्धारित अवधि के पश्चात् रोक, चुनाव स्थगन, पुनर्मतदान, मतगणना व परिणाम की घोषणा करना, चुनाव विवाद का निपटारा, व्यय का विवरण रखना । यह एक संवैधानिक प्राधिकरण आयोग है ।

13. उपसंहार:

निष्कर्षत: भारतीय संविधान हमारी लोकतान्त्रिक प्रणाली का आईना है । हमारे संविधान में सर्वोपरि जनता है । जनता के हितों की रक्षा के साथ-साथ समूचे राष्ट्र के लक्ष्यों, आक्श्यकताओं, आकांक्षाओं को इसमें स्थान दिया गया है ।

राज्य की विधि व्यवस्था का गठन, जनता व सरकार के पारस्परिक सम्बन्धों का निर्धारण इसी के द्वारा होता है । देश के नागरिकों में अपने संविधान के प्रति प्रतिबद्धता एवं सम्मान का भाव होना चाहिए ।


Hindi Essay # 3 भारतीय लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली |  Indian Democratic Governance

1. प्रस्तावना ।

2. लोकतन्त्र की अवधारणा ।

3. लोकतन्त्र के प्रकार ।

4. लोकतन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक गुण ।

5. लोकतन्त्र शासन के गुण ।

6. लोकतन्त्र के दोष ।

7. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

संसार में अनेक शासन प्रणालियां प्रचलित हैं, उनमें से लोकतन्त्रीय शासन व्यवस्था को लोकहित की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना गया है । भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है ।

भारत का ही अनुकरण कर उसके पड़ोसी देशों ने लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था को अपना आधार बनाया है । अमेरिका में भी लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली प्रचलित है । लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में नागरिकों का स्थान सर्वोपरि है ।

नागरिकों का महत्त्वपूर्ण दायित्व उत्तम सरकार के लिए निर्वाचन में भाग लेना है । लोकतन्त्र में सभी महत्त्वपूर्ण निर्णय जनता की सहमति से उसके दबुने हुए प्रतिनिधियों द्वारा लिये जाते हैं ।

अत: शासन प्रणाली द्वारा मनमाने निर्णय लेने की सम्भावना नहीं रहती । स्वतन्त्रता के बाद भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतन्त्रात्मक गणराज्य घोषित किया गया है ।

2. लोकतन्त्र की अवधारणा:

लोकतन्त्र, अर्थात् लोक का तन्त्र । जनता का शासन होता है । लोकतन्त्र में चूंकि जनता की सरकार होती है, अत: शासन की प्रभुसत्ता जनता के हाथ में होती है । प्रभुसत्ता का अर्थ है: निर्णय करने की सर्वोच्च शक्ति । ऐसी शक्ति, जिसके ऊपर कोई शक्ति नहीं हो सकती है ।

अब्राहम लिंकन के अनुसार:

“लोकतन्त्र जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन है ।”

डायसी के अनुसार:

लोककतन्त्र वह शासन व्यवस्था है, जिसमें राष्ट्र की जनता का अपेक्षाकृत बड़ा शासन होता है ।

सीले के अनुसार:

जुजातन्त्र वह शासन है, जिसमें प्रत्येक मनुष्य भाग लेता है ।

महात्मा गांधी:

“प्रजातन्त्र का अर्थ हैसमाज के प्रत्येक व्यक्ति को उन्नति का समान अवसर देना ।’

इस तरह लोकतन्त्र की विशिष्ट जीवन पद्धति है, जिसमें समाज के लोग अपने व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में स्वतन्त्रता, समानता और बन्दुत्व के आदर्शो का पालन करते हैं ।

लोकतन्त्र में जाति, वंश, धर्म, रंग, लिंग, भाषा, वर्ग आदि के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं किया जाता । आर्थिक स्वतन्त्रता के बिना राजनीतिक स्वतन्त्रता का कोई महत्त्व नहीं होता है ।

इसीलिए लोकतान्त्रिक शासन में आर्थिक असमानता के आधार पर भी किसी का शोषण नहीं किया जाना चाहिए । सभी को उन्नति के समान अवसर देकर विकास प्रदान करना प्रजातन्त्र की अवधारणा है । लोकतन्त्र जीवन का एक रूप, नैतिक धारणा एवं सामाजिक दर्शन भी है ।

3. लोकतन्त्र के प्रकार:

लोकतन्त्र शासन प्रणाली के मुख्यत: 2 प्रकार होते हैं: (क) प्रत्यक्ष लोकतन्त्र,

(ख) अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र ।

(क) प्रत्यक्ष लोकतन्त्र:

इस लोकतन्त्र में जनता स्वयं अपने शासन का संचालन करती है । यह लोकतन्त्र का शुद्ध रूप है । इस प्रकार के लोकतन्त्र में जब कोई महत्त्वपूर्ण निर्णय लेना होता है, तो समस्त जनसमुदाय उस प्रक्रिया में भाग लेकर निर्णय स्वयं ही लेता है । यह एक आदर्श व्यवस्था है । आज भी स्वीटजरलैण्ड के छोटे समुदायों में सरकार का प्रत्यक्ष लोकतान्त्रिक रूप देखने को मिलता है ।

(ख) अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र:

प्रत्यक्ष लोकतन्त्र सरकार का एक आदर्श स्वरूप है, किन्तु आधुनिक समय में अधिकांश राज्यों में प्रत्यक्ष लोकतन्त्र सम्भव नहीं है; क्योंकि उनका क्षेत्रफल और उनकी जनसंख्या बहुत अधिक है ।

अत: आधुनिक राज्यों में प्रतिनिधिमूलक अथवा अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र अपनाया गया

है । इस शासन प्रणाली में भी जनता सरकार पर नियन्त्रण रखती है । परन्तु वह ऐसा प्रत्यक्ष रूप से नहीं करती है । जनसाधारण तो प्रत्यक्ष रूप से न तो प्रशासनिक निर्णय लेते हैं और न कानून बनाते है ।

यह कार्य जनता के प्रतिनिधि करते हैं । अत: अप्रत्यक्ष लोकतन्त्र में प्रतिनिधियों के चयन का कार्य अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है । सामान्यत: प्रत्येक 5 वर्ष पश्चात् लोग विधायिका के लिए अपने प्रतिनिधियों का निर्वाचन करते हैं ।

ये निर्वाचित प्रतिनिधि जनता की ओर से देश के लिए कानून का निर्माण व निर्णय करते हैं । कार्यकाल की समाप्ति के पश्चात् इनका पुन: निर्वाचन करना पड़ता है ।

4. लोकतन्त्र की सफलता के लिए आवश्यक गुण

लोकतन्त्र की सफलता के लिए सबसे बड़ा गुण है:

(क) नागरिकों का अनुशासित व शिक्षित होना:

वे अपने निजी, क्षुद्र व संकुचित हितों को त्यागकर राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि माने । इस हेतु लोकतन्त्र की सफलता में नागरिकों को शिक्षित होना अनिवार्य है । निरक्षरता को लोकतन्त्र की सबसे बड़ी बाधा माना गया है; क्योंकि शिक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है, जो मनुष्य में विवेक जागत करती है, जिसके द्वारा कह सही एवं गलत का सटीक निर्णय कर पाता है ।

(ख) नागरिकों में श्रेष्ठ चारित्रिक गुणों का होना:

लोकतन्त्र में नागरिकों में देशप्रेम, समाजप्रेम, दया, सहानुभूति, परोपकार, मानवता, धार्मिक सहिष्णुता जैसे नैतिक मूल्यों का होना आवश्यक है । यदि नागरिक लोभी, स्वार्थी, बेईमान, भ्रष्टाचारी, पक्षपाती होंगे, तो सही निर्णय नहीं कर पायेंगे ।

(ग) आर्थिक व सामाजिक समानता का भाव:

लोकतन्त्र में सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से सभी को समान अवसर उपलब्ध हैं ।

(घ) नागरिक अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति सजग हो:

लोकतन्त्र की सफलता का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि नागरिकों को अपने अधिकार और कर्तव्यों का पूरा-पूरा ज्ञान होना चाहिए । अधिकारों के लिए लड़ते हुए कर्तव्यों का पूरी निष्ठा, लगन व ईमानदारी से पालन करना चाहिए ।

(ड.) कुशल नेतृत्व:

लोकतन्त्र में नागरिकों का चरित्र जहां उत्तम हो, वहीं देश के नेताओं में कुशल नेतृत्व की क्षमता होनी चाहिए । नेता ऐसे हो, जो राजनैतिक निर्णय लेने में समर्थ व सक्षम हो । सरकार के नीति-नियमों पर विवेकपूर्ण विचारों को प्रकट कर सके । दूसरे दलों की बात सुने तथा संसद की कार्रवई में बाधा उपस्थित न होने दे ।

(च) प्रजातान्त्रिक शासन प्रणाली के गुण:

प्रजातान्त्रिक शासन प्रणाली का सर्वप्रमुख गुण है:

(1) यह प्रणाली सर्वोच्च जन तथा मानव प्रणाली है,

(2) मतदान की प्रक्रिया को महत्त्व,

(3) सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष गणराज्य के रूप में संविधान में महत्त्व,

(4) संसदीय शासन प्रणाली,

(5) समस्त वास्तविक शक्तियां मन्त्रिपरिषद के पास,

(6) संघात्मक एवं एकात्मक का समन्वय,

(7) धार्मिक विचार व अभिव्यक्ति, शिक्षा व संस्कृति सम्बन्धी आदि की स्वतन्त्रता,

(8) मौलिक अधिकार व कर्तव्यों को महत्त्व,

(9) नीति निर्देशक तत्त्व,

(10) लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना,

(11) राष्ट्रपति के पद एवं स्थिति को महत्त्व,

(12) प्रधानमन्त्री व उसके मन्त्रिपरिषद को महत्त्व, जिसमें संसद को सर्वोच्च मानते हुए लोकसभा व राज्यसभा के सम्बन्ध एवं राष्ट्रपति और मन्त्रिपरिषद से इसका सम्बन्ध स्थापित किया गया है,

(13) संविधान का संरक्षक उच्चतम न्यायालय को माना गया है ।

(छ) प्रजातान्त्रिक शासन प्रणाली के दोष:

हिटलर ने प्रजातन्त्र को मूर्खों का शासन, पागलों तथा कायरों की व्यवस्था कहा है, तो मुसोलिनी ने सड़ा हुआ शव तथा संसद को बकवास की दुकानें कहा है । इस प्रणाली के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं:

(1) लम्बी कार्यप्रणाली,

(2) भ्रष्टाचार एवं रिश्वतखोरी का बोलबाला,

(3) सरकारी योजनाओं एवं नौतियों का सही क्रियान्वयन नहीं होना,

(4) विपक्ष द्वारा जनता के वास्तविक मुद्‌दों से हटकर व्यर्थ की आलोचना में जनता का समय तथा धन बर्बाद करना,

(5) खर्चीली प्रणाली,

(6) मतदान तथा निर्वाचन प्रक्रिया में धन, बल का दुरुपयोग,

(7) चुनाव जीतने के पश्चात् नेताओं की जनता तथा देश के प्रति उत्तरदायित्व व कर्तव्यों के प्रति उदासीनता,

(8) ढीली-ढाली कार्यप्रणाली,

(9) जाति, धर्म व क्षेत्रीयतावाद के द्वारा राजनैतिक दलों का लोकतन्त्र को शक्तिहीन बनाना,

(10) दलगत दूषित राजनीति के प्रभाव के कारण राष्ट्रीय एकता एवं सामाजिक भावनाओं का प्रदूषण होना ।

7. उपसंहार:

वस्तुत: लोकतान्त्रिक शासन व्यवस्था संसार की सर्वोत्तम शासन प्रणाली है । भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है । हमारे देश में प्रचलित लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली का उद्देश्य जनकल्याण है ।

भारत को लोककल्याणकारी राज्य के रूप में स्थापित करते हुए इसे संविधान में सम्पूर्ण प्रमुत्च सम्पन्न समाजवादी धर्मनिरपेक्ष गणराज्य माना गया है । यदि जनता शिक्षित होगी, तो ही वह योग्य प्रतिनिधियों का चुनाव कर सकेगी ।

कहा गया है कि: “यथा राजा तथा प्रजा” । इस कथन के आधार पर जनप्रतिनिधि ईमानदार, योग्य, सक्षम व कर्मठ हो, तभी लोकतन्त्र सफल है । लोकतन्त्र की सफलता कठोर, परिश्रमी, ईमानदार, देशभक्त व रबस्थ नागरिकों पर ही अवलम्बित है ।

जातीयता, क्षेत्रीयता, भाषावाद, अशिक्षा, बेकारी, जनसंख्या विस्फोट, भ्रष्टाचार लोकतन्त्र व राष्ट्रहित के शत्रु हैं । सबसे आवश्यक बात यह है कि लोकतान्त्रिक शासन प्रणाली में सभी नागरिकों की गहरी आस्था होनी चाहिए; क्योंकि यह तो जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए शासन है ।


Hindi Essay # 4 प्रजातान्त्रिक व्यवस्था और लोकमत | Democracy and Public Opinion

1. प्रस्तावना ।

2. लोकमत की अवधारणा ।

3. लोकमत के तत्त्व ।

4. लोकमत का महत्त्व ।

5. लोकमत निर्माण में बाधाएं: 1. अज्ञानता व अशिक्षा, 2. वर्गवाद और साम्प्रदायिकता, 3. दलगत राजनीति, 4. संकीर्णता, 5. दरिद्रता, 6. राजनीति व धर्म ।

6. लोकमत निर्माण और अभिव्यक्ति के साधन:  समाचार पत्र/सार्वजनिक सभाएं/राजनीतिक दल/रेडियो, दूरदर्शन, सिनेमा एवं समाचार पत्र/शिक्षण संस्थाएं/निर्वाचन/धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्थाएं ।

7. लोकमत निर्माण हेतु आवश्यक शर्तें व परिस्थितियां:

शिक्षित जनता/सामाजिकता/आवश्यक धन/व्यापक विचार/निष्पक्ष समाचार-पत्र/ शान्तिमय विचार/राजनैतिक दलों का गठन एवं आदर्शवादी विचार ।

6. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

लोकतन्त्र में लोकमत का सर्वाधिक महत्त्व है । कोई भी सरकार लोकमत की अवहेलना नहीं कर सकती है; क्योंकि सरकार की समूची शासन प्रणाली जनता की प्रतिक्रिया पर ही निर्भर करती है ।

यदि लोकमत प्रबुद्ध है, जागरूक है, तो सरकार जनता के अधिकारों का अनादर करने का साहस कदापि नहीं कर सकती है । यदि सरकार जनता के विचारों को महत्त्व नहीं देगी, तो लोकतन्त्र तथा सरकार की सत्ता खतरे में पड़ सकती है ।

2. लोकमत की अवधारणा:

लोकमत शब्द ”लोक’ तथा ”मत” दो शब्दों के योग से बना है, जिसमें से लोक का अर्थ है-जनता और मत का अर्थ है: राय या विचार । इस तरह लोकमत का अर्थ है: जनता का विचार, अर्थात् जनता के बहुसंख्यक, जो सम्पूर्ण जनता के हित के अनुकूल हों और अल्पसंख्यक वर्ग उससे सहमत न होते हुए भी कम-से-कम अस्थायी रूप से उसे स्वीकार करने के लिए तैयार रहे ।

जनता के सामूहिक मत का यहां उद्देश्य है-जो स्वार्थरहित विवेकबुद्धि पर आधारित स्थायी विचार हो, जिसका उद्देश्य जनकल्याण हो । वह विवेकशील लोगों का मत है, जो सामान्य नागरिकों की स्वीकृति प्राप्त कर लेता है ।

लार्ड बाइस के अनुसार: ”लोकमत मनुष्यों के उन विभिन्न दृष्टिकोणों का योग है, जो सार्वजनिक हित से सम्बद्ध विषयों के बारे में विचार रखते हों ।”

डा॰ बेनीप्रसाद के अनुसार: “वह मत वास्तव में लोकमत है, जो जनकल्याण की भावना से प्रेरित होता है ।”

इस तरह लोकमत समाज द्वारा प्रचलित निर्णयों का ऐसा प्रतिपादित एवं स्थायी रूप होता है, जिसको मानने वाले लोग सामाजिक समझते हैं । लोकमत साधारण जनता का ऐसा तर्क पर आधारित मत है, जिसका उद्देश्य समस्त जनसमुदाय का कल्याण करना है ।

3. लोकमत के तत्त्व:

लोकमत का तात्पर्य यह नहीं है कि देश की सम्पूर्ण जनता किसी एक विषय पर एकमत हो, क्योंकि सार्वजनिक विषयों पर सम्पूर्ण जनता का एकमत हो जाना एक असम्भव बात है ।

किसी मत को तब तक लोकमत नहीं कहा जा सकता है, जब तक कि समाज का प्रधान भाग आधिकारिक रूप से उससे सहमत न हो । जिस मत को जितने अधिक लोग मानते हैं, वही लोकमत है ।

लोकमत का आधार सबका हित, अर्थात् सार्वजनिक हित होता है । किसी वर्ग विशेष पर आधारित मत को लोकमत नहीं कहा जाता । उसमें अल्पसंख्यकों का हित भी होना चाहिए । जिस मत का आधार अनैतिकता व अन्याय है, वह लोकमत नहीं है ।

4. लोकमत का महत्त्व:

लोकमत लोकतन्त्र में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण इसीलिए है; क्योंकि: 1. एक सबल विकसित एवं विचारपूर्ण तथा स्थायी लोकमत संगठित शासन की स्थापना करता है ।

2. सचेत और प्रबुद्ध लोकमत ही स्वस्थ लोकतन्त्र की प्रथम आवश्यकता है ।

3. जनता की इच्छा का दूसरा नाम लोकतन्त्र है । इसीलिए लोकतन्त्र लोकमत की अवहेलना नहीं कर सकता । निरंकुश शासकों ने भी लोकमत को महत्त्व दिया है । तभी तो नेपोलियन जैसे तानाशाह ने कहा था: “मुझे एक लाख तलवारों से भय नहीं लगता, परन्तु तीन समाचार-पत्रों से भय लगता है ।”

लोकमत सामाजिक जीवन को प्रभावित करता है । समाज भी लोकमत से प्रभावित होता है । लोकमत राजनैतिक संस्थाओं के सदस्यों को जनहित विरोधी कार्य करने से रोकता है ।

4. लोकमत व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका पर नियन्त्रण रखता है । एक कानून का निर्माण करते समय लोकमत का विशेष ध्यान रखना पड़ता है ।

5. लोकमत प्रत्येक शासन को स्वेच्छाचारी होने से रोकता है ।

6. वह नागरिकों के अधिकारों एवं स्वतन्त्रता की रक्षा करता है । स्वस्थ लोकमत के लिए जनता का शिक्षित व जागरूक होना अत्यन्त आवश्यक है ।

5. लोकमत निर्माण में बाधाएं:

लोकमत निर्माण में सर्वप्रमुख बाधा अज्ञानता, अशिक्षा, वर्गवाद, साम्प्रदायिकता, जातीयता, राजनैतिक दलदल, गरीबी, धर्म में राजनीति का प्रवेश है ।

6. लोकमत निर्माण और अभिव्यक्ति के साधन:

लोकमत निर्माण करने में तथा उसके अभिव्यक्ति के साधन में सर्वप्रमुख समाचार-पत्र महत्त्वपूर्ण साधन है । इसके अन्तर्गत पत्र-पत्रिकाएं एव, अन्य प्रकार के साहित्य भी आते है ।

समाचार-पत्र स्वतन्त्र, निष्पक्ष और न्यायप्रिय होना चाहिए । सरकार की गलत नीतियों की आलोचना कर सत्य और न्याय के पथ पर चलकर अपने दायित्वों का भली-भांति निर्वाह कर सकते हैं । सार्वजनिक सभाएं भी अपने सार्वजनिक भाषणों के माध्यम से लोकमत का निर्माण करती हैं ।

इसके लिए कुशल व प्रबुद्ध वक्ता का होना नितान्त आवश्यक है । लोकमत के निर्माण में स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय आदि शिक्षण संस्थाओं का महत्त्वपूर्ण स्थान

है ।

पढ़ने के साथ-साथ विद्यार्थी अपने अध्यापकों से वाद-विवाद करते हैं । राजनैतिक दल भी लोकमत के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं । रेडियो, सिनेमा तथा दूरदर्शन के विभिन्न चैनलों पर प्रश्नोत्तरी, वाद-विवाद जैसे कार्यक्रमों में विषय विशेषज्ञों को बुलाकर स्वस्थ जनमत तैयार किया जा सकता है, जिसका प्रत्यक्ष लाभ लाख-करोड़ों जनता को एक साथ पहुंचता है ।

निर्वाचनों का परिणाम लोकमत के निर्माण में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है । साहित्य एवं अफवाहों का भी लोकमत निर्माण में विशेष स्थान है ।

7. लोकमत निर्माण हेतु आवश्यक शर्ते व परिस्थितियां:

इस हेतु सर्वप्रथम जनता का शिक्षित, योग्य, विवेकी होना आवश्यक है, तभी वह किसी भी विषय पर अपने स्वस्थ विचार व मत दे सेकते हैं । स्वस्थ जनमत हेतु सामाजिक व्यवस्था ऐसी हो, जिसमें संकीर्णता, जातिभेद तथा राष्ट्रविरोधी कुटिल भावनाओं का स्थान न हो ।

स्वरथ जनमत हेतु समाज में रहने वाले लोगों के पास इतनी सुविधा अवश्य हो कि वे अपने आपको न्यूनतम स्तर पर स्थापित कर सकें । अशान्तिमय वातावरण में जनमत नहीं पनप सकता । जनता के विचारों में क्रमबद्धता होनी चाहिए ।

साम्प्रदायिकता, द्वेषभाव, वर्गभेद लोकमत में बाधक हैं । समाचार-पत्रों को निष्पक्षता व निर्भीकता के साथ जनता की बातों को छापना चाहिए । लोकमत में जनता को अपने भावों, विचारों, भाषणों और लेखन की पूर्ण स्वतन्त्रता प्रत्येक परिस्थिति में मिलनी चाहिए । लोकमत का आधार भारतीय सांस्कृतिक, उदारवादी दृष्टिकोण होना

चाहिए ।

8. उपसंहार:

यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि लोकतन्त्र के निर्माण एवं सुदृढ़ीकरण में लोकमत सर्वप्रमुख है । लोककल्याण की भावना पर आधारित लोकमत के निर्माण में आने वाली बाधाओं का चुनौतीपूर्ण सामना करना होगा ।

लोकतन्त्र की शक्ति है: लोकमत । जनता के हित के बिना लोकमत एवं लोकतन्त्र अप्रभावी है, निष्फल है, शक्तिहीन है, अस्तित्वविहीन है ।


Hindi Essay # 5 मौलिक अधिकार | Fundamental Rights

1. प्रस्तावना ।

2. मौलिक अधिकारों की विशेषताएं ।

3. संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का स्वरूप ।

4. मौलिक अधिकारों पर रोक ।

5. मौलिक अधिकारों के गुण एवं दोष ।

6. उपसंहार ।

1. प्रस्तावना:

प्राय: सभी लोकतान्त्रिक देशों में संविधान द्वारा नागरिकों को कुछ अधिकार दिये गये हैं । ये अधिकार सामाजिक जीवन की वे बुनियादी परिस्थितियां हैं, जिसके बिना साधारणत: कोई मनुष्य अपना पूर्ण विकास नहीं कर पाता ।

इन्हीं अधिकारों के फलस्वरूप नागरिक स्वतन्त्रताओं का उपयोग और अपने व्यक्तिव का सर्वागीण विकास करते हैं । भारत के नागरिकों को भी संविधान द्वारा कुछ महत्त्वपूर्ण अधिकार दिये गये हैं । कानून की भाषा में इसे मौलिक अधिकार कहते हैं । ये अधिकार दो प्रकार से मौलिक हैं:

1. संविधान द्वारा देने के कारण यह देश का मौलिक कानून है, अत: संविधान इनकी रक्षा की व्यवस्था भी करता है ।

2. सरकार इन मौलिक अधिकारों के विरुद्ध या इसे सीमित करने के लिए कोई कानून बनाती है, तो ऐसा कानून असंवैधानिक होगा, जिसे न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है । न्यायालय उसे अमान्य घोषित कर सकता है ।

मानव के मौलिक पहलुओं और प्राकृतिक पहलुओं पर होने के कारण ये सार्वभौमिक अधिकार होते है । न्यायाधीश के॰ सुबाराव ने कहा था परम्परागत प्राकृतिक अधिकारों का दूसरा नाम मौलिक अधिकार है, जो व्यक्ति के जीवन के लिए मौलिक तथा अपरिहार्य होने के कारण संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदान किये जाते हैं । व्यक्ति के इन अधिकारों में राज्य द्वारा हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता ।

2. मौलिक अधिकारों की विशेषताएं:

श्री एन॰एन॰ पालकीवाला के अनुसार: “मौलिक अधिकार राज्य के निरंकुश स्वरूप से साधारण नागरिकों की रक्षा करने वाले कवच हैं ।” मौलिक अधिकारों को भारत संविधान की आत्मा औए हृदय भी कहा जा सकता है । भारतीय संविधान में भारतीय नागरिकों को जो 6 प्रकार के मौलिक अधिकार दिये गये हैं, उनकी विशेषताएं इस प्रकार हैं:

1. सर्वाधिक व्यापक अधिकार:

भारतीय संविधान के तृतीय भाग में अनुच्छेद न 2 से 30 तक तथा 32 से 35 तक मौलिक अधिकारों का वर्णन है । मौलिक अधिकारों की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि विश्व के अन्य देशों के संविधानों की तुलना में सर्वाधिक विस्तृत एवं व्यापक है ।

2. समानता पर आधारित:

भारतीय संविधान में वर्णित अधिकार भेदभाव बिना समानता के आधार पर सभी को प्राप्त है । अल्पसंख्यक, अनुशचइत जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों, पिछड़े वर्गों की उन्नति के लिए विशेष व्यवस्थाएं इसमें की गयी हैं । समाज के सभी वर्गो धर्मो के लिए समान मौलिक अधिकार दिये गये हैं ।

3. व्यावहारिक:

भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकार कोरे सिद्धान्त न होकर व्यावहारिकता पर आधारित हैं ।

4. नकारात्मक एवं सकारात्मक अधिकार:

भारतीय संविधान में नागरिकों को दिये गये अधिकार सीमित व मर्यादित हैं । उन्हें सकारात्मक अधिकार कहा जाता है । नकारात्मक अधिकारों में निषेधाज्ञा के रूप में वे अधिकार आते हैं, जो शक्तियों को सीमित व मर्यादित करते हैं ।

5. सरकार की निरंकुशता पर अंकुश:

मौलिक अधिकार प्रत्येक भारतीय की पहचान एवं उसकी स्वतन्त्रता के द्योतक हैं । भारतीय सरकार इस पर मनमानी करते हुए प्रतिबन्ध नहीं लगा सकती ।

6. राज्य के सामान्य कानूनों से ऊपर:

मौलिक अधिकार को देश के सर्वोच्च कानूनों में सर्वोच्च स्थान दिया गया है ।

7. न्यायालय द्वारा संरक्षित:

मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रत्येक भारतीय अनुच्छेद 32 के अनुसार सर्वोच्च न्यायालय में शरण ले सकता है ।

8. भारतीय नागरिकों तथा विदेशियों में अन्तर:

भारतीय तथा अप्रवासी विदेशी नागरिकों के लिए दिये गये मौलिक अधिकारों में यह अन्तर है कि विदेशियों को जीवन व व्यक्तिगत स्वतन्त्रता का अधिकार है, किन्तु वे भारतीय नागरिकों की तरह समस्त मौलिक अधिकारों का उपभोग नहीं कर सकते ।

3 मौलिक अधिकारों का स्वरूप:

मौलिक अधिकारों के स्वरूप में निम्नलिखित बातें महत्त्वपूर्ण हैं:

(क) समता का अधिकार यह अधिकार इस बात की व्यवस्था करता है कि कानून के समक्ष सभी नागरिक समान हैं ।

जाति, लिंग, स्थान तथा वर्ण आदि के आधार पर राज्य नागरिकों से कोई भेदभाव नहीं करेगा । किसी भी नागरिक को सार्वजनिक भोजनालयों, दुकानों, मनोविनोद, धार्मिक स्थलों पर जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर जाने से नहीं रोका जा सकेगा ।

सभी को राज्य के अधीन नौकरियों में नियुक्ति के अधिकार बिना किसी भेदभाव के प्राप्त हैं । इस अधिकार में अस्पृश्यता का अन्त कर इसे दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है ।

सैनिक तथा शिक्षा सम्बन्धी उपाधियों को छोड़कर अन्य सभी उपाधियों और खिताबों को समाप्त कर दिया गया है । इसके अन्तर्गत यह अपवाद है कि सरकार बच्चों, स्त्रियों, अनुसूचित जाति, जनजाति, पिछड़ी जातियों को विशेष सुविधा प्रदान करेगी ।

(ख) स्वतन्त्रता का अधिकार:

इस अधिकार के अन्तर्गत 6 प्रकार की स्वतन्त्रता प्रदान की गयी है: 1. भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता । 2. शान्तिपूर्ण एकत्र होने की स्वतन्त्रता । 3. संघ तथा समुदाय बनाने की स्वतन्त्रता । 4. भारतीय क्षेत्र के भीतर कहीं भी आने-जाने की स्वतन्त्रता । 5. व्यापार, आजीविका तथा कारोबार की स्वतन्त्रता । 6. भारत के किसी भी भाग में बसने तथा निवास करने की स्वतन्त्रता ।

ये सभी स्वतन्त्रताएं मानव विकास के लिए आवश्यक हैं । सरकार देश की प्रमुसता एवं अखण्डता के हित में नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था के हित में इन अधिकारों को सीमित कर सकती है ।

संविधान में यह महत्त्वपूर्ण व्यवस्था है कि किसी भी व्यक्ति को अपने विरुद्ध गवाही देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है । जब तक किसी व्यक्ति ने किसी कानून की अवहेलना का अपराध न किया हो, तब तक उसे जीवन या सम्पत्ति से वंचित नहीं किया जा सकता ।

किसी भी व्यक्ति को गिरफतारी से पूर्व उसका कारण बताना आवश्यक है । प्रत्येक व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घण्टे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सम्मुख पेश करना अनिवार्य है ।

ऐसे व्यक्ति को स्वयं तथा वकील के माध्यम से अपनी सफाई पेश करने का अवसर दिया जाता है । संविधान में इस बात का ध्यान भी रखा गया है कि किसी व्यक्ति की स्वतन्त्रता का अनुचित ढंग से उपहरण नहीं होना चाहिए ।

यदि देश की एकता, अखण्डता, शान्ति, सुरक्षा का मामला है, तो उसे 24 घण्टे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष बन्दी बनाये जाने वाले व्यक्ति को पेश करना अनिवार्य नहीं रहता । इसको नजरबन्दी कहते हैं ।

सामान्यत: किसी व्यक्ति को 3 माह से अधिक समय के लिए नजरबन्द नहीं किया जा सकता । इससे अधिक देर तक नजरबन्द करने के लिए उच्च न्यायालय की सिफारिश के अनुसार नियुक्त मण्डल के समक्ष मामले को रखना पड़ता है ।

न्यायालय में 5 उपचार उपयोग में लाये जाते हैं:

1. बन्दी प्रत्यक्षीकरण:

इसका अर्थ है-सशरीर उपस्थिति । यदि बन्दी बनाये गये व्यक्ति के विरुद्ध पर्याप्त कारण नहीं हैं, तो उसे रिहा किया जा सकता है ।

2. परमादेप्तीं लेख:

इसका अर्थ है: हम आज्ञा देते हैंजब कोई सरकारी विभाग या अधिकारी सार्वजनिक कर्तव्यों का पालन नहीं करता, जिसके परिणामस्वरूप मौलिक अधिकारों का हनन होता है, तो न्यायालय के द्वारा इस लेख से अधिकारी को कर्तव्य पालन का आदेश दे सकता है ।

3. प्रतिशेध लेख:

इसका अर्थ है-रोकनए । यह आज्ञापत्र उच्चतम न्यायालय द्वारा अपने अधीनस्थ न्यायालय को किसी मुकदमे की कार्रवाई स्थगित करने के लिए निर्गत किया जाता

है । उनके द्वारा यह आदेश दिया जाता है कि वे मुकदमे की सुनवायी न करे, तो उनके अधिकार क्षेत्र के बाहर है ।

4. उत्सेक्षण लेख:

इस लेख का अर्थ है-पूर्णत: सूचित करना । जब कोई मुकदमा उस न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर होता है और न्याय के प्राकृतिक सिद्धान्तों के दुरूपयोग की सम्भावना होती है, तो उच्च न्यायालय अपने अधीनस्थ न्यायालय से किसी मुकदमे के विषय में सूचनाएं भी लेख के आधार पर मांग सकता है ।

5. अधिकार पृच्छा लेख:

इस लेख का अर्थ है-किसी अधिकार से जब कोई व्यक्ति किसी सार्वजनिक पद को अवैधानिक तरीके से प्राप्त कर लेता है, तो न्यायालय इसके द्वारा उसके विरुद्ध पद को खाली करने का निर्देश देता है ।

इस आदेश द्वारा न्यायालय सम्बन्धित व्यक्ति से यह पूछता है कि वह किस अधिकार से इस पद पर कार्य कर रहा है ? जब तक इस प्रश्न का सम्यक एवं सन्तोषजनक उत्तर नहीं मिल जाता, तब तक वह उस पद पर कार्य नहीं कर

सकता ।

(ग) धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार:

भारत धर्मनिरपेक्ष राज्य है अत: हमारे देश के सभी नागरिकों को अपने धर्म में विश्वास रखने, उसका प्रचार करने का अधिकार प्राप्त है ।

(घ) सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक अधिकार:

ADVERTISEMENTS:

इस अधिकार के अनुसार भारत या उसके भू-भाग में रहने वाले प्रत्येक नागरिक या नागरिक समूहों को अपनी भाषा-लिपि एवं संस्कृति को बनाये रखने का अधिकार

होगा ।

किसी भी नागरिक को राजकीय अनुदान प्राप्त करने वाले विद्यालयों में जन्म भाषा, प्रदेश, धर्म एवं प्रजाति के आधार पर प्रवेश देना अस्वीकार नहीं किया जा सकता, पर धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यकों को अपनी इच्छानुसार विद्यालय खोलने व प्रशासन का अधिकार है ।

यह अधिकार शैक्षणिक हितों के लिए इस आधार पर दिया गया है कि वह संस्था अनैतिक व्यापार, राष्ट्रीय, सामाजिक अशान्ति को बढ़ावा न देती हो ।

(ड.) संवैधानिक उपचारों का अधिकार:

इस अधिकार के तहत सभी नागरिकों को मौलिक अधिकारों की सुरक्षा की सहायता लेने का अधिकार है । न्यायालय नागरिकों के मौलिक अधिकारों का संरक्षक है । यदि सरकार कोई संस्था या किसी व्यक्ति किसी नागरिक समूह के मौलिक अधिकारों का हनन करती है, रोक लगाती है, अपहरण करती है, तो आवेदन करने पर सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय न्यायपालिका के माध्यम से उसके अधिकारों की रक्षा करती है ।

उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति को पुलिस ने गिरपतार कर लिया है, तो उस व्यक्ति के मित्र या रिश्तेदार न्यायालय में निवेदन कर सकते हैं कि उस व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष उपस्थित कर यह पूछा जाये कि उसे क्यों बन्दी बनाया गया ? कारण अस्पष्ट होने पर व्यक्ति को छोड़ा जा सकता है ।

4. मौलिक अधिकारों पर रोक:

यदि सरकार नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करती है, तो नागरिक सरकार के विरुद्ध न्यायपालिका की शरण में जा सकता है । सर्वोच्च न्यायालय उक्त कार्रवाई को अवैध घोषित कर सकता है ।

भारतीय संविधान के 352वें अनुच्छेदानुसार राष्ट्रपति द्वारा आपातकाल घोषित किये जाने पर भाषण, विचार, अभिव्यक्ति, शान्तिपूर्ण सभा करने, निःशस्त्र प्रदर्शन करने, सभा या समुदाय बनाने, देश में भ्रमण करने तथा किसी भाग में बसने की स्वतन्त्रता स्थगित हो जाती है ।

व्यवस्थापिका एवं कार्यपालिका द्वारा निर्मित कानून न्यायालय भी इसे अवैध घोषित नहीं करेंगे । आपातकाल में संवैधानिक उपचारों के अधिकारों पर भी स्थगन लग जाता है ।

5. मौलिक अधिकार के गुण एवं दोष:

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मौलिक अधिकार हमारे संविधान का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंग है । इन अधिकारों के अभाव में स्वतन्त्रता का कोई अर्थ नहीं रह जाता है । यह अधिकार व्यावहारिकता पर आधारित हैं । समानता के सिद्धान्त पर आधारित हैं ।

शासन की निरंकुशता पर रोक लगाते हैं । सामाजिक बुराइयों का अन्त करते हैं । इसके विपरीत इन अधिकारों का दोषपूर्ण पक्ष यह है कि समानता का अधिकार एक दिखावा है । आज भी भारतीय समाज में काफी असमानताएं हैं ।

विशेष वर्ग ही सुविधा का लाभ ले रहे हैं । आपातकाल में मौलिक अधिकारों का हनन हो जाता है । कार्यपालिका द्वारा शक्ति के दुरूपयोग की सम्भावनाएं हैं । आपातकाल मे राष्ट्रपति द्वारा स्वतन्त्रता तथा संवैधानिक उपचारों के निलम्बन एवं स्थगन को इसका सबसे बड़ा दोष माना जाता है ।

6. उपसंहार:

निःसन्देह यह कहा जा सकता है कि मौलिक अधिकारों की व्यवस्था में गुण एवं दोष तो विद्यमान हैं, किन्तु यह सत्य है कि हमारी लोकतान्त्रिक व्यवस्था और संविधान में मौलिक अधिकारों का स्थान सर्वोपरि है ।

मौलिक अधिकार न केवल व्यक्ति की स्वतन्त्रता की रक्षा करते हैं, वरन उन्हें समानता का अवसर भी प्रदान करते हैं । ये अधिकार राज्य और व्यक्ति के बीच व्यवस्था की एक महत्त्वपूर्ण कड़ी हैं । राज्य की आधारशिला हैं । राष्ट्रीय एकता, समानता तथा शक्ति में वृद्धि करते हैं ।


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