मानवाधिकारों की रक्षा की चुनौतियां पर निबंध | Essay on Challenges in Protecting Human Rights in Hindi!

मानव समाज की हमेशा से यही आकांक्षा रही है कि न केवल सभी को सुख एवं सौहार्द्रमय जीवन जीने की स्वतंत्रता हो अपितु इसके साथ व्यक्ति की विशिष्टता एवं प्रतिष्ठा भी कायम रहे ।

ADVERTISEMENTS:

वैश्विक स्तर पर मानव को नैसर्गिक रूप से प्राप्त आकारों के विचार और उसकी महत्ता का अनुभव समाज ने तब किया, जब तेरहवीं शताब्दी में धार्मिक असहिष्णुता तथा सामाजिक एवं आर्थिक गुलामी के विरुद्ध स्वतंत्रता और समानता के सामूहिक स्वर तीव्र हुए, इन्हीं ने मानव अधिकारों के विचार की नींव रखी ।

जीवन तथा मानवीय स्वतंत्रता के अधिकारों को सामाजिक व्यवस्था कायम रखने की दृष्टि से नियंत्रित करने का भले ही किसी शासन या संगठित समाज को अधिकार हो परंतु इससे मानव को विवश नहीं किया जाना चाहिए । यदि इन अधिकारों का पोषण एवं सरक्षण करने में कोई समाज या शासन विफल होता है तो समस्त मानव जगत् को राष्ट्रीय सीमा का विचार किये बिना विरोध में खड़े होने का अधिकार है ।

अमेरिका के थामस जेफरसन ने 13 अमेरिकी उपनिवेशों की स्वतंत्रता की उद्‌घोषणा में कहा था ‘हम इस सत्य को स्वयं प्रमाणित मानते है कि सब मनुष्य समान रूप से जन्म लेते हैं और जन्मदाता ने इन्हें जन्म से ही कुछ ऐसे अधिकार दिए हैं, जिनका अतिक्रमण नहीं किया जा सकता । इनमें प्रमुख हैं जीवन की सुरक्षा, मानवीय स्वतंत्रता एवं सुख की प्राप्ति हेतु प्रयास करने की छूट ।’

कालांतर में जॉर्ज वाशिंगटन, जो अमेरिका के स्वतत्रता संग्राम के अग्रणी नेता थे, ने भी मानव अधिकार की 26 अगस्त, 1789 की उद्‌घोषणा में यही दोहराया था कि सभी मानव जन्म से स्वतंत्र है और समानता के व्यवहार के अधिकारी हैं । संयुक्त राष्ट्र ने मानव अधिकारों की औपचारिक घोषणा 10 दिसंबर, 1948 को की ।

इसके आधार पर भारतीय संविधान में विभिन्न मानव अधिकारों को संरक्षण प्रदान किया गया है, जैसे सभी मानव को समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14) जन्म, वंश, जाति, लिंग, धर्म के आधार पर भेद – भाव का निषेध (अनुच्छेद 15); लोक नियोजन में सभी नागरिकों को अवसर की समानता (अनुच्छेद 16); मूलभूत नागरिकों के अधिकार जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्वक निरायुध समागम या संघ, संगठन बनाने का अधिकार, भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण और निवास का अधिकार, कोई वृत्ति, उपजीविका व्यापार या कारोबार करने का अधिकार (अनुच्छेद 19); जीवन तथा प्राण या दैहिक स्वतंत्रता के सरक्षण का प्रत्येक व्यक्ति को अधिकार और शासन को उससे वैध विधि माध्यम का अवलंबन किये बिना वंचित करने का निषेध (अनुच्छेद 21) ।

ADVERTISEMENTS:

उपर्युक्त मूलभूत अधिकारों को विशुद्ध रूप से परिभाषित कर उनके संरक्षण हेतु सकारात्मक पहल करने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र द्वारा मान्य और हस्ताक्षरित दो प्रमुख अनुबंध पत्र जारी किये, जिन्हें (1) मानव के नागरिक और राजनीतिक मानव अधिकार (1976) एवं (2) मानव के सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक मानव अधिकार (1976) शीर्षक दिया गया ।

संयुक्त राष्ट्र की मानव अधिकार घोषणाओं के आधार पर और उसके अन्तर्गत आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अनुबंधों में उल्लेखित मानव के अधिकारों को समाहित करने के लिए संविधान के खंड-4 के अंतर्गत अनुच्छेद 36 से 51 नीति निर्देशक तत्व या सिद्धांत समाहित किये गये । कालांतर में यह आवश्यक प्रतीत हुआ कि मानव अधिकारों को सुरक्षित रखने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर प्रत्येक नागरिक से मानव कर्त्तव्यों के अनुपालन की अपेक्षा करना आवश्यक है । इस उद्देश्य से सन् 1976 में संविधान में इस हेतु भाग-4 को संशोधन से जोड़ा गया ।

यदि भारत के सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल पिछले 40 वर्षो की जनहित याचिकाओं में दिए गए निर्णयों पर दृष्टिपात करें तो प्रकट होगा कि कई नीति निर्देशक तत्व हैं जो मानव जीवन के प्रतिष्ठापूर्ण संरक्षण के लिए आवश्यक हैं, जैसे शिक्षण, स्वास्थ्य, स्वच्छ पर्यावरण, आश्रय और उस हेतु अति आवश्यक नागरिक सुविधाएं । इन सभी मुद्दों पर न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 21 में प्रदत्त जीवन और मानवीय स्वतंत्रता के संरक्षण को मूलभूत अधिकार मानते हुए बंधनकारी आदेश/निर्देश जारी किये ।

ADVERTISEMENTS:

इसी सन्दर्भ में अनुच्छेद 51 में वर्णित नीति निर्देशक तत्व, जिसमें कहा गया है कि ‘राज्य अंतर्राष्ट्रीय शांति एवं सुरक्षा की अभिवृद्धि का, साथ ही राष्ट्रों के बीच न्यायसंगत और सम्मानपूर्ण संबंधों को बनाए रखने का, संगठित लोगों को एक-दूसरे से व्यवहारों में अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधि बाध्यताओं के प्रति आदर बढ़ाने का तथा राष्ट्रीय विवादों को मध्यस्थ द्वारा निपटारे के लिए प्रोत्साहन देने का सतत प्रयास करेगा ।’

अनुच्छेद-21, जो राज्य द्वारा मानव जीवन और मानवीय स्वतंत्रता दिए जाने की वचनबद्धता सुनिश्चित करता है तथा नीति-निर्देशक तत्व 51, जो अंतर्राष्ट्रीय विधि और संधियों के प्रति आदर बढ़ाने का निर्देश देता है, इन दोनों संवैधानिक प्रावधानों की मानव हित में सुसंगत व्याख्या करने के पश्चात यही प्रकट होता है कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी घोषणाएं एंव उस आधार पर सदस्य राष्ट्रों द्वारा किए गये अनुबंध, सदस्य राष्ट्रों की सीमाओं में विधि के रूप में प्रवर्तनीय माने जायेंगे ।

संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित मानव अधिकार उन पर आधारित अनुबंध सदस्य राष्ट्रों पर उनकी भौगोलिक सीमाओं में बंधनकारी होंगे या नहीं यह विवाद अब विश्व में बढ़ती हिंसा और शोषण के कटु अनुभवों के चलते धीरे-धीरे खत्म होता प्रतीत होता है ।

वर्तमान भारत में शासन की जो भी नीतियां या राजनीतिक विचारधारा हो, जनता अपने कटु अनुभवों के कारण, मानव अधिकारों के संरक्षण की अधिक बेसब्री से मांग कर रही है । जनता चाहती है कि आर्थिक समानता के साथ राजनीतिक स्वतंत्रता एवं सक्रिय सहभागिता भी उसे प्राप्त हो । इसमें दो मत नहीं कि मानव अधिकारों के संरक्षण के मार्ग में अनेक अवरोध और कठिनाइयां है ।

ADVERTISEMENTS:

मानव अधिकारों के प्रति आदर और इनको साकार करने के लिए सदस्य राष्ट्रों को स्वयं स्वविवेक से पहल करने की अपेक्षा है । मानव अधिकारों का हनन रोकने के लिए बंधनकारी आदेश जारी करने का संयुक्त राष्ट्र के पास आज कोई अधिकार नहीं है परतु विद्यमान विषम परिस्थितियों में यह सुस्पष्ट होता जा रहा है कि केवल आदर्श के रूप में नहीं अपितु मानव जगत के अनुभवों के आधार पर आम आदमी की मानव अधिकारों के संरक्षण की मांग बढती ही जानी है ।

Home››Law››Human Rights››