ग्राम सुधार पर अनुच्छेद | Paragraph on Village Up-lift in Hindi

प्रस्तावना:

भारत गांवों का देश है । इतना विशाल देश होते हुए भी नगरों तथा शहरों की सच्चा गांवों की तुलना में नगण्य है । भारत की तीन-चौथाई से भी अधिक आबादी गावों मे ही रहती है ।

यह बडे खेद का विषय है कि अब तक सरकार तथा सामाजिक एवं स्वयंसेवी सस्थाओं ने गांवों की तरफ अपेक्षित ध्यान नहीं दिया है । गांधी जी का कहना था कि भारत की आत्मा गांवो में बसती है और तक गांवों का सुधार नहीं होगा, देश उन्नति नहीं कर सकता ।

अत: हम सबका पुनीत कर्त्तव्य है कि गावो के सुधार की कारगर योजनायें तैयार करके उनका जल्दी से जल्दी उत्थान किया जाये, ताकि समूचा देश खुशहाल हो सके । शिक्षा का प्रसार भारत के गावों के पिछड़ेपन का सबसे बड़ा कारण वही फैली व्यापक निरक्षरता है । अत: शिक्षा प्रसार के व्यापक कार्यक्रम को चलाने की सबसे बड़ी आवश्यकता है ।

हर गाँव में कम-से-कम प्राइमरी स्कूल अवश्य खोलने चाहिए, ताकि लड़कों और लडकियो को लिखना और पढना आ सके । प्राइमरी शिक्षा को अनिवर्य और निःशुल्क किया जाना चाहिए । इतना ही नहीं, गरीब बालक-बालिकाओं के लिए किताबों और कॉपियो की व्यवस्था भी निःशुल्क की जानी चाहिए ।

इसके अलावा अनपढ़ वयरकों तथा महिलाओं की शिक्षा का विशेष प्रबन्ध भी किया जाना चाहिए । इसके अलावा अनपढ़ वयस्कों तथा महिलाओं की शिक्षा का विशेष प्रबन्ध भी किया जाना चाहिए । महिलाओं को आमतौर से दोपहर में ही कुछ अवकाश मिल सकता है तथा पुरुषों को रात में ।

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अत: सुविधाजनक समय पर प्रौढ पाठशालाओं की व्यवस्था भी की जानी चाहिए । यदि ऐसा एक साथ किया जाये, तो दस वर्ष के भीतर ही देश में कोई भी व्यक्ति निरक्षर नहीं रहेगा ।

अंधविश्वास और कुरीतियों की समाप्ति:

शिक्षा के प्रसार से गांवो में फैले अंधविश्वासों और रूढियों पर बहुत कुछ अकुश स्वत: ही लग जायेगा । इसके अलावा प्रचार-प्रसार से उनमें जागृति लानी चाहिए । सामाजिक कुरीतिया गावों में व्यापक रूप से व्याप्त हैं । सामाजिक कार्यकर्त्ताओं को इन्हें दूर करने के लिए व्यापक पैमाने पर कार्यक्रम तैयार करने चाहिए । बाल-विवाह, विधवाओं का निरादर, जादू-टोने पर विश्वास, भूत-चुडैलों आदि के डर जैसी अनेक बुराइयों को दूर करने के लिये सभी को मिलकर काम करना पड़ेगा ।

सफाई और स्वच्छता का ज्ञान:

गांवों में सफाई की व्यवस्था नहीं होती । घरों के आस-पास पानी सड़ता रहता है जिनसे मच्छर और मक्खियाँ फैलती हैं । जगह-जगह कूड़े के ढ़ेर देखे जा सकते हैं । इनके कारण मलेरिया, हैजा जैसे अनेक रोग फैलकर सैकडों लोगों की जान ले लेते हैं ।

चिकित्सा के उचित प्रबन्ध के अभाव में इन्हे ओझा-सयानों या नीम-हकीमों की शरण में जाना पड़ता है । अत: ग्रामवासियों में सफाई की आदत और स्वच्छता के लाभो का प्रचार करना पड़ेगा । साथ ही चित्किसा की समुचित व्यवस्था के द्वारा उन्हें नीम-हकीमों के चंगुल से भी निकालना आवश्यक है ।

कृषि के वैज्ञानिक तरीके:

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भारत के गांवों का मुख्य व्यवसाय खेती है । आज परम्परागत रूप से खेती करने पर बहुत कम पैदावार मिलती है । हमारे किसान बड़े किसान मेहनती हैं, फिर भी यही की प्रति एकड़ पैदावार संसार में शायद सबसे कम है ।

भारतीय वैज्ञानिकों ने कृषि के उन्नत औजार तथा संकर बीजों का निर्माण कर लिया है, जिनके प्रयोग से पैदावार बहुत बढ़ सकती है । इसके अलावा रासायनिक खाद और कीटनाशक दवाइयों का प्रयोग भी पैदावार को बढ़ाता है और कीटो से फसल को नष्ट होने से बचाता है ।

उनके बीच खेती के वैज्ञानिक ढंग के लाभों का प्रचार करके उन्हें ये साधन सुलभ कराये जाने चाहिये । सिंचाई के लिए कुओं और तालाबों आदि के खोदने में सरकार को मदद करनी चाहिए, ताकि भारतीय किसान केवल वर्षा पर ही निर्भर न रहे ।

कुटीर उद्योगों का प्रसार:

खेती एक प्रकार का मौसमी धंधा है । वर्ष के 5-6 महीनों में किसान के पास करने को कुछ नहीं होता । यदि गांवो में छोटे कुटीर उद्योग-धंधों का विकास किया जा सके, तो ये ग्रामीण अपनी आमदनी बढ़ाकर खुशहाल हो सकेंगे ।

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इसके लिये ऐसे अनेक कुटीर उद्योग लगाये जा सकते हैं, जिनमें न बड़े-बड़े यंत्रो की आवश्यकता न हो और न कच्चे माल को बाहर से मंगाने की आवश्यकता हो । फल और सब्जियो के संरक्षण और डबाबदी का प्रशिक्षण देकर ग्रामीणों को अपनी उपज का अधिक लाभ मिल सकेगा ।

मुर्गीपालन, पशुपालन, दुग्धशालायें, कागज की लुग्दी और मिट्‌टी के खिलौने, मधुमक्खी पालन, रेशम के कीड़े पालन, बांस और बेंत की टोकरियाँ तथा फर्नीचर बनाना, कढाई-बुनाई जैसे अनेक काम हैं, जो गाव मे आसानी से शुरू किए जा सकते हैं और जिनसे ग्रामीणों की आर्थिक दशा में पर्याप्त सुधार हो सकता है ।

सहकारिता को बढ़ावा:

गांवों में सहकारिता का विकास किया जाना चाहिए । तरह-तरह की सहकारी समितियों के द्वारा ग्रामीणों को सस्ते ब्याज पर धन उपलब्ध हो सकता है और साथ ही दलालों, बिचौलियों के शोषण से मुक्ति मिल सकती है । दलाल और आढ़तिये फसल पर किसानों से उनकी उपज बहुत सस्ती खरीद लेते हैं और मण्डियों में ले जाकर उनकी मनमानी कीमत वसूल करते हैं ।

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सहकारी समितियाँ किसानों की उपज को इकट्‌ठा करके सीधे ही मण्डी में ले जाकर बेच सकती हैं और इस प्रकार किसानों को उनकी पैदावार का उचित मूल्य मिल सकता है । इसी प्रकार ग्रामीणों के रोजमर्रा के काम आने वाली तथा खेती के काम आने वाली वस्तुयें सहकारी संमितियो के माध्यम से उन्हें उचित कीमत पर मिल सकती हैं ।

उपसंहार:

यदि उपर्युक्त उपायो को काम में लाया जाये, तो जल्दी ही हमारे गांवों का नक्शा बदल जायेगा और देश उन्नति के शिखर पर पुन: पहुँच जायेगा ।

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