चंद्रगुप्त मौर्य पर निबंध | Essay on Chandragupta Maurya in Hindi

1. प्रस्तावना:

चन्द्रगुप्त मौर्य भारत का ऐसा प्रथम शासक था, जिसने न केवल यूनानी, बल्कि विदेशी आक्रमणों को पूर्णत: विफल किया तथा भारत के एक बड़े भू-भाग को सिकन्दर जैसे महत्त्वाकांक्षी यूनानी आक्रांता के आधिपत्य से मुक्त कराया । विस्तृत शासन व्यवस्था के होते हुए भी उसने भारत को राजनीतिक एकता प्रदान की ।

उसकी प्रशासनिक व्यवस्था इतनी सुदृढ़, सुसंगठित थी कि अंग्रेजों ने भी इसे अपना आदर्श माना । स्मिथ महोदय ने उसके विषय में लिखा है- ”वास्तव में वही प्रथम ऐतिहासिक व्यक्ति है, जिसे सही अर्थ में भारत का सम्राट कहा जा सकता है । वह एक योग्य शासक, सेनानायक, योद्धा, महान् विजेता, प्रजाहितैषी, निर्भीक शासक था।”

2. जीवन वृत्त एवं उपलब्धियां:

चन्द्रगुप्त मौर्य नन्दवंशीय शूद्र कुलोत्पन्न था । ब्राह्मण ग्रन्थ के अनुसार वह नन्द राजा की शूद्र पत्नी से उत्पन्न हुआ था । बौद्ध साहित्य के अनुसार चन्द्रगुप्त ”मोरिय” नगर के राजा का पुत्र था । राजा की मृत्यु के बाद रानी ने उसे जन्म देकर पाटलिपुत्र की एक मवेशी शाला में फिकवा दिया था ।

एक चन्दन वृक्ष के द्वारा रक्षा किये जाने के कारण उसका नाम चन्द्रगुप्त पड़ा । बड़ा होकर जब वह मवेशी चराते हुए बालकों के साथ वहीं एक ऊंची पहाड़ी पर बैठकर राजा की तरह न्याय कर रहा था, तो नन्द से प्रतिशोध लेने को उतावले गुजरते हुए चाणक्य की नजर इस बालक पर पड़ी, तो उसने चन्द्रगुप्त को उसके पालनकर्ता शिकारी से खरीद लिया और तक्षशिला में समस्त प्रकार की शिक्षा दिलाकर उसे इस योग्य बनाया कि वह न केवल साम्राज्य का समूल नाश कर सके, वरन् मगध का शासक बन सके ।

जैन साहित्य में उसे मयूर पोषकों का पुत्र कहा गया है । कथासरित्सागर में उसे नन्दराज का पुत्र बताया गया है । चन्द्रगुप्त का शैशवकाल शिकारियों, चरवाहों के मध्य व्यतीत हुआ । उसने मगध के राजा के यहां नौकरी कर ली थी । अपनी योग्यता और प्रतिभा से वह मगध का सेनापति भी बन गया था ।

कहा जाता है कि एक बार सिंहलगढ़ के राजा ने पिंजरे में बन्द एक मोम का सिंह राजा नन्द के यहां भेजते हुए यह चुनौती दी थी कि आपके राज्य का कोई व्यक्ति इसे पिंजरे का द्वार खोले बिना बाहर निकाल दे, तो मैं यह मान लूंगा कि आपके राज्य में भी कोई बुद्धिमान है । चन्द्रगुप्त ने इस चुनौती को स्वीकारते हुए शलाका को तप्त करके सिंह को पिघला दिया । इस तरह स्वयं ही वह पिंजरे से बाहर हो गया ।

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कुछ कारणवश नन्दराज चन्द्रगुप्त से नाराज हो गया और उसने उसे प्राणदण्ड दिया, तो प्राणरक्षा करते हुए चन्द्रगुप्त मौर्य साम्राज्य से भागकर उसके साम्राज्य को विनष्ट करने का दृढ़ संकल्प कर बैठा । इसी दौरान नन्द द्वारा अपमानित एक और शत्रु चाणक्य से चन्द्रगुप्त की भेंट हुई । चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को अपनी कूटनीतिक विद्या से इतना प्रशिक्षित किया कि उन दोनों ने मिलकर नन्द साम्राज्य का समूल विनाश कर डाला । इसके पश्चात् चन्द्रगुप्त मौर्य ने 322 ईसा पूर्व में मगध का राजसिंहासन हासिल किया ।

राज्यसिंहासन प्राप्त करने के पश्चात् चन्द्रगुप्त ने सर्वप्रथम मगध पर एकाधिकार किया । उसके पश्चात यूनानी शासन का उन्मूलन करते हुए पंजाब पर अधिकार किया । मगध पर पुन: आक्रमण करते हुए उसने राजा पोरस से सहायता प्राप्त की और उसे मगध का आधा साम्राज्य देने का वचन दिया तथा चाणक्य की सहायता से एक विषकन्या के माध्यम से राजा नन्द की हत्या करवा दी ।

326 ईसा पूर्व में सिकन्दर विश्वविजेता बनने का स्वप्न लिये भारत पर आक्रमण कर बैठा । तब चन्द्रगुप्त मौर्य ने उसके इस स्वप्न को धूमिल कर दिया । सिकन्दर के सेनापति सेल्यूकस से चन्द्रगुप्त का युद्ध हुआ । इस युद्ध में सेल्यूकस को मुंह की खानी पड़ी । सेल्यूकस से की गयी सन्धि में चन्द्रगुप्त मौर्य ने 500 हाथी के बदले पूर्वी अफगानिस्तान, बलूचिस्सान और सिन्धु नदी का क्षेत्र उसे दे दिया । इसके बाद सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलेना का विवाह चन्द्रगुप्त से कर दिया ।

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सेल्यूकस ने मेगस्थनीज को राजदूत बनाकर चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में भेजा । उसने अपने ग्रन्थ ”इण्डिका” में भारत तथा चन्द्रगुप्तकालीन शासन-पद्धति का वर्णन लिखा है । चाणक्य द्वारा रचित ग्रन्थ ”अर्थशास्त्र” के अनुसार-चन्द्रगुप्त का शासन प्रबन्ध अत्यन्त ही सुसंगठित, वैभवशाली था ।

चन्द्रगुप्त ने अपने शासन प्रबन्ध को केन्द्र, प्रान्त, स्थानीय, ग्रामीण, नगरीय क्षेत्रों में बांटा था । सम्पूर्ण शासन का संचालन सम्राट तथा उसकी राजधानी पाटलिपुत्र को केन्द्र मानकर किया जाता था । सम्राट सर्वेसर्वा होता था । उसकी सहायता के लिए मन्त्रिपरिषद होती थी, जो सम्राट को आवश्यक परामर्श दिया करती थी, परन्तु सम्राट उनके परामर्श को मानने के लिए बाध्य नहीं था ।

शासन को सुचारु रूप से चलाने के लिए उसे कई विभागों में बांट दिया गया था । प्रत्येक विभाग को एक-एक तथा दो-दो विषय दिये गये थे । इन 18 विभागों में अमात्य के अतिरिक्त अनेक पदाधिकारी और कर्मचारी होते थे । राज्य में आन्तरिक शान्ति और सुव्यवस्था के लिए पर्याप्त पुलिस विभाग का गठन किया गया था । इसे ”रक्षिन” कहा जाता था ।

राज्य के कोने-कोने से किये जाने वाले अपराधों, षड्‌यन्त्रों, कुचक्रों का पता लगाने के लिए राज्य में गुप्तचरों का जाल-सा बिछा हुआ था । इसमें वेश्या, दासी, भिक्षुणी, शिल्पकारिका आदि भी काम किया करती थीं । चन्द्रगुप्त के शासनकाल में न्याय व्यवस्था अत्यन्त उत्तम थी ।

सम्राट का निर्णय ही अन्तिम माना जाता था । उसके शासनकाल में दण्ड-विधान में जुर्माने के साथ-साथ अंग-भंग तथा मृत्युदण्ड का भी विधान था । इस व्यवस्था की वजह से अपराध तथा अपराधियों की संख्या में अत्यधिक कमी हो गयी थी । अकसर लोग बिना ताले लगाये ही घरों से बाहर चले जाया करते थे ।

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राज्य की सुरक्षा हेतु सैन्य विभाग का गठन भी किया गया था, जिसमें विशाल सेना को पैदल, अश्वारोही, रथ, हस्ति, जल सेना में विभाजित किया गया था । सेना के लिए एक चिकित्सा विभाग भी था । सेना का अध्यक्ष स्वयं राजा होता था, जो सेना का संचालन, निरीक्षण करता था । इसके अलावा 5 समितियां भी थीं । सैनिकों को सम्राट द्वारा वेतन तथा समुचित सुविधाएं प्रदान की गयी थीं ।

राज्य की आय का एक बहुत बड़ा भाग सेना, शासन तथा लोककल्याण में खर्च किया जाता था तथा चाणक्य के अनुसार-राजा को प्रजा का हमेशा सेवक और ऋणी होना चाहिए । अत: उसे प्रजा के ऋण से उऋण होने के लिए उसके हित में यातायात की समुचित व्यवस्था हेतु सड़कें बनवानी चाहिए ।

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कुएं, धर्मशालाएं, सिंचाई हेतु तालाब बनवाना, औषधालयों की स्थापना कर उसमें योग्य चिकित्सकों की नियुक्ति करनी चाहिए । जनता के हितार्थ शिक्षा की समुचित व्यवस्था करते हुए छात्रों को छात्रवृत्ति भी देनी चाहिए । असहाय और दीन-दुखियों की सहायता करनी चाहिए । उसने राज-भवनों के अलावा बनाये गये अन्य भव्य भवनों के मध्य आकर्षक उद्यान व सरोवर बनवाये थे ।

चन्द्रगुप्त मौर्य का विशाल साम्राज्य उत्तर में हिमालय से दक्षिण में मैसूर तक व पश्चिम तक हिन्दुकुश से पूर्व बंगाल तक विस्तृत था । जैन साहित्य के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य ने जैन मुनि भद्रबाहु से जैन धर्म की दीक्षा ली थी । वहां श्रवणबेलगोला में उसने 398 ईसा पूर्व अपना शरीर त्याग कर दिया था ।

3. उपसंहार:

चन्द्रगुप्त मौर्य एक महान् विजेता, विशाल साम्राज्य का स्वामी था । अपनी योग्यता और संगठन शक्ति के कारण उसने सुसंगठित राज्य की स्थापना की और एक स्थायी शासन व्यवस्था का आदर्श रूप प्रस्तुत किया । उसका साम्राज्य तो अकबर से भी अधिक सक्षम था । वह एक योग्य शासनकर्ता होने के साथ-साथ प्रकृति-प्रेमी, धर्मपरायण, साहित्य प्रेमी शासक था ।

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