महात्मा गांधी की जीवनी | Biography of Mahatma Gandhi in Hindi

1. प्रस्तावना:

हमारी भारत भूमि ऐसे महान् पुरुषों की जन्मस्थली, कर्मस्थली रही है, जिन्होंने अपनी कार्यशैली से न केवल समूचे जनमानस को प्रेरणा दी, वरन् अपने व्यक्तित्व एवं कार्यों का प्रकाश भारतवर्ष में ही नहीं, विश्व-भर में फैलाया । ऐसे महामानव राष्ट्रवादी नायक थे-राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ।

2. जीवन परिचय:

ऐसे युगपुरुष, महामानव महात्मा गांधीजी का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात के पोरबन्दर में हुआ था । उनके पिता का नाम करमचन्द गांधी एवं माता का नाम पुतलीबाई था । गांधीजी के पिता राजकोट के दीवान थे । उनकी माताजी धार्मिक विचारों वाली महिला थीं, जिनके विचारों का गांधीजी पर विशेष प्रभाव पड़ा ।

3. गांधीजी की शिक्षा-दीक्षा:

गांधीजी की प्रारम्भिक शिक्षा राजकोट में हुई थी । सन् 1881 में उन्होंने हाईस्कूल में प्रवेश ले लिया था । उनका विवाह तेरह वर्ष की अवस्था में कस्तूरबा बाई से हो गया था । सन् 1887 में गांधीजी ने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की और भावनगर के सामलदास कॉलेज में प्रवेश ले लिया, किन्तु परिवारवालों के कहने पर उन्हें अपनी शेष पढ़ाई पूरी करने के लिए इंग्लैण्ड जाना पड़ा । इंग्लैण्ड में उन्होंने अपनी वकालत की पढ़ाई पूरी की ।

भारतीय संस्कारों में पले-बढ़े गांधीजी को वहां की पाश्चात्य सभ्यता से समन्वय करने में काफी कठिनाई हुई । उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण करके भी देखा, किन्तु जीत उनके पारिवारिक संस्कारों की ही हुई । गांधीजी ने यहां रहकर पारिवारिक संस्कारों का पूर्णत: पालन किया ।

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सन् 1891 में वे बैरिस्ट्रर होकर भारत लौटे । इसी दौरान गांधीजी को दादा अब्दुल्ला एण्ड अब्दुल्ला नामक मुस्लिम व्यापारिक संस्था के मुकदमे के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा । यहां दक्षिण अफ्रीका में गांधीजी को रेल द्वारा प्रीटोरिया की यात्रा करते हुए उन्हें अपमानजनक तरीके से ट्रेन से उतार फेंका गया । वे काले भारतीय थे । इसीलिए दक्षिण अफ्रीका के गोरों ने अपनी अश्वेत नीति के तहत अत्यन्त दुर्व्यवहार किया ।

इसके कारण उनके हृदय में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी । गांधीजी ने काले भारतीयों के साथ मिलकर गोरी सरकार के विरुद्ध संघर्ष का संकल्प ले लिया । यहां रह रहे प्रवासी भारतीयों के साथ मिलकर एक संगठन बनाया और सत्याग्रह छेड़ दिया । मई 1894 में गांधीजी ने नेटाल में इण्डियन कांग्रेस की स्थापना की । सन् 1896 में भारत आकर दक्षिण अफ्रीकी भारतीयों के लिए उन्होंने आन्दोलन शुरू कर दिया ।

वे उसी वर्ष अपने परिवारसहित वहां आ बसे । भारत के बन्धक मजदूरों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार तथा भारतीयों के सभी विवाहों को अमान्य ठहराने वाले कानून के विरुद्ध बगावत कर दी । 1901 में भारत लौटे । 1902 में प्रवासी भारतीयों के निमन्त्रण पर उन्हें पुन: दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा ।

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1904 में फिनिक्स आश्रम की स्थापना कर वहां भारतीय आन्दोलनकारियों को संगठित किया । यहां से उन्होंने इण्डियन ओपिनियन नामक पत्र का संचालन किया । यहां रहकर गांधीजी ने गोरी सरकार के विरुद्ध अनेक आन्दोलन चलाये । उन्हें 10 जनवरी 1908 में 2 माह के कठोर कारावास की सजा भी मिली ।

सत्य, अहिंसा एवं सत्याग्रह गांधीजी के संकल्प थे । सन् 1913 में पोल टैक्स निरस्त करने के विरोध में दक्षिण अफ्रीका में आन्दोलन छेड़ा । जमानत पर रिहा होकर 1915 को भारत लौटे ।

4. स्वतन्त्रता आन्दोलन में गांधीजी का योगदान:

सन् 1917 में गांधीजी ने भारतीय मजदूरों के बंधक बनाये जाने का विरोध किया । सन् 1918 में सूती मिल श्रमिकों की मांगों को लेकर सत्याग्रह किया । 1919 में रोलेट एक्ट का विरोध किया । 1920 में टर्की के सुलतान कमाल पाशा को इस्लाम के पवित्र स्थानों पर एकाधिकार से वंचित करने पर ब्रिटिश सरकार का विरोध किया और केसर ए हिन्द पदक, बोअर युद्ध पदक, जूलू युद्ध पदक लौटा दिये ।

1921 में प्रिंस ऑफ वेल्स की भारत यात्रा का विरोध करते हुए 5 दिन का उपवास किया । 1922 में सत्याग्रह प्रारम्भ किया । 6 अप्रैल 1930 में दांडी यात्रा कर नमक कानून तोड़ा । गोरी सरकार की विभिन्न नीतियों का विरोध करते हुए उन्होंने दिसम्बर 1931 में पुन: सत्याग्रह किया ।

1931 से 1940 तक विभिन्न आन्दोलन में सजा भुगत चुके गांधी ने द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अंग्रेज सरकार की वादाखिलाफी के विरोध में 1942 में करो या मरो तथा अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन छेड़ दिया, जिसका इतना अधिक देशव्यापी प्रभाव पड़ा कि सारे भारतवासी इस आन्दोलन में कूद पड़े । अन्तत: अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा । 15 अगस्त 1947 को देश स्वतन्त्र हो गया ।

5. गांधीजी के बिभिन्न विचार:

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गांधीजी सत्य और अहिंसा को जीवन में सर्वाधिक महत्त्व देते थे । सत्याग्रह और असहयोग द्वारा उन्होंने अंग्रेजों का मुकाबला किया । वे सभी मनुष्यों को समान मानते थे । धर्म, जाति, सम्प्रदाय, रंग, नस्ल के आधार पर किये जाने वाले भेदभाव को मानवता के विरुद्ध कलंक मानते थे । गांधीजी ने अछूतों को हरिजन कहा । वे आर्थिक असमानता को मिटाकर वर्गविहीन, जातिविहीन समाज की स्थापना करना चाहते थे ।

उन्होंने शारीरिक श्रम व सामाजिक न्याय को विशेष महत्त्व दिया । वे प्रजातान्त्रिक राज्य को कल्याणकारी राज्य मानते थे । गांधीजी के अनुसार- ”नैतिक आचरण का जीवन में विशेष महत्त्व होना चाहिए । सत्य, न्याय, धर्म, अहिंसा, अपरिग्रह, निःस्वार्थ सेवा मानवता की सच्ची सेवा है । दीन-दुखियों की सेवा ही सच्चा धर्म है ।”

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उन्होंने राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय विचारों के तहत वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को विशेष महत्त्व दिया । किसी भी राष्ट्र के समुचित उत्थान के लिए परिवार, जाति, गांव, प्रदेश तथा देश की समस्याओं का सुधार होना चाहिए । खुद सुधरो, तो जग सुधरेगा, यह उनका मानना था ।

6. गांधीजी का शिक्षा दर्शन:

गांधीजी का शिक्षा दर्शन बहुत ही व्यापक था । वे शिक्षा को व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक (शरीर, मन और आत्मा) विकास की प्रक्रिया और उद्देश्य मानते थे । शिक्षा को बेरोजगारी के विरुद्ध एक प्रकार का बीमा होना चाहिए, जो व्यक्ति को किसी प्रकार का कौशल प्रदान करे । उनकी बुनियादी शिक्षा प्रणाली इसी सिद्धान्त पर आधारित थी । कुटीर उद्योग-धन्धों का प्रशिक्षण व मातृभाषा का ज्ञान शिक्षा की अनिवार्य प्रक्रिया मानते थे ।

7. उपसंहार:

देश को विकास एवं आजादी की राह पर खड़ा करने एवं मानवता को नयी दिशा देने वाले प्यारे बापू साम्प्रदायिकता के घोर विरोधी थे । 30 जनवरी 1948 को राष्ट्र के इस महामानव को प्रार्थना सभा में जाते हुए नाथूराम गोडसे नामक एक नवयुवक ने गोली मार दी । गांधीजी मरकर भी अमर हो गये ।

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