Here is essay on ‘Marxism’ in Hindi language!

कार्ल मार्क्स ने इस चिन्तन को विकसित किया । उसने देखा कि एक देश में कुछ मुट्‌ठी भर लोग जनसमूह का शोषण कर रहे हैं । इससे समाज में असंतोष पनप रहा है । संसाधनों पर कुछ ही लोग अपना अधिकार जता रहे हे । समाज का वर्ग, जो संख्या में कम है, उस वर्ग, जो जनसंख्या में अधिक है, की तुलना में प्राकृतिक व मानवीय संसाधनों का अपने हित में उपयोग कर रहा है ।

इससे समाज में द्वन्दवाद पनप रहा है, जैसे गरीब, अमीर, विकसित और अविकसित, मालिक-मजदूर आदि । मार्क्सवाद इस द्वन्दवाद का विरोध करता है । वह पूंजीवाद के सामने समाजवाद की विचारधारा को प्राथमिकता देता हैं वह संसाधनों पर समाज के सभी वर्गों का अधिकार मानता है । इसका लाभ समाज के सभी वर्ग चाहे वह मजदूर हों या मालिक सबको समान रूप से मिलना चाहिए । यही मार्क्सवादी सिद्धान्त की सोच है ।

भूगोल में यह सोच प्राकृतिक एवं मानव संसाधनों के समुचित उपयोग पर ध्यान आकृष्ट करती है । विभिन्न क्षेत्रों में बढ़ती प्रादेशिक असमानताएँ इस बात को सोचने को प्रेरित करती हैं, कि कोई क्षेत्र अधिक या कम विकसित क्यों है ? क्या वहाँ संसाधनों का अभाव है ? या क्या फिर वहाँ संसाधनों का समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है ? आज भी झारखण्ड, जो खनिज पदार्थों में अत्यन्त धनी है, गरीबी, भुखमरी की समस्या से जूझता है ।

इसी प्रकार क्या किसान को उसकी फसल का उचित मूल्य मिल रहा है कहीं विचौलिया अधिक आर्थिक लाभ उपार्जित तो नहीं कर रहा है, आदि विशेषताओं ने भूगोल में मार्क्सवाद की विचारधारा को प्रश्रेय दिया । संसाधनों पर सबके समान अधिकार व वितरण पर जोर दिया । मार्क्सवादी भूगोल उन सामाजिक प्रक्रियाओं का अध्ययन करता है, जो प्राकृतिक वातावरण और स्थान विशेष के बीच पाए जाते हैं ।

मार्क्सवाद की विचारधारा मानवतावाद की भावना पर आधारित है । यह श्रमिक व पूंजीवादी दोनों समुदायों को समान दृष्टि से देखती है। वह श्रमिक वर्ग को पूंजीपतियों के शोषण से बचाती है। यह भूगोल के यथार्थवादी चिन्तन को भी महत्व देती है । आज हमारे सामने जो दृश्य जगत है, वह आर्थिक व सामाजिक विकास का परिणाम है । यह मानव कल्याणकारी उपागम है ।

यह भूगोल में व्यक्तिगत असमानताओं को मिटाने के साथ प्रादेशिक असमानताएँ दूर करने पर जोर देती है। यह ऐसे मानव समाज की रचना को प्रेरित करती है, जिसमें कोई असमानता न हो । यह मानव भूगोल का प्रमुख अंग है, तथा मानव एवं वातावरण के बीच संतुलित सम्बन्धों के विकास पर बल देती है ।

वर्तमान युग का समाज इनके बीच असंतुलित सम्बन्धों की उपज है । देश के महानगरों में एक और आलीशान भव्य ईमारतें है, तो दूसरी ओर झुग्गी-झौपड़ियों का समूह है, जो सामाजिक एवं आर्थिक विषमता का प्रतीक है । भूगोल में मार्क्सवादी चिन्तन इस विषमता की ओर ध्यान खींचते हुए, उसमें सुधार करने की दिशा में मार्ग निर्देशन देता हैं, व विकास की योजनाएं तैयार करता है ।

मार्क्सवादी दर्शन का सार उसका सकारात्मक दृष्टिकोण है, जो विश्ववाद पर जोर देता है । मार्क्स कहता है जन-जीवन विचारों को निर्धारित करता है, न कि हमारे विचार (चेतनता) जन जीवन को निर्धारित करते है । यह विचार अपने आप में विश्व को बदलने में समर्थ नहीं है बल्कि वास्तविक विकास वह है, जो जन-जीवन के विचारों में परिवर्तन लाता है ।

ADVERTISEMENTS:

जैसे झुग्गी झोंपड़ी में रहने वाला व्यक्ति मानव समाज को यह सोचने को प्रेरित को कि किस प्रकार उसके जन जीवन में सुधार किया जा सकता है । यह चिन्तन समाज का विकास चरणों (Stages) में किये जाने की सलाह देता है । यह विकास तभी संभव है, जब उत्पादन के दोनों प्रमुख कारकों उत्पादन सामग्री एवं श्रम के बीच संतुलन बनाए रखा जाए, उसको एक दूसरे के सहयोगी के रूप में विकसित किया जाए ।

जैसे-जैसे उत्पादन में वृद्धि होती जाती है, वैसे-वैसे मानव की चेतनता बढ़ती है, उसकी आवश्यकताएँ बढ़ती है, धीरे-धीरे वह समाज जनसंख्या की अधिकता से प्रभावित हो जाता है । मानव की चेतनता समय के साथ बदलती रहती है । यह गतिशील प्रक्रिया है, जैसे-जैसे हमारे विचार बदलते है, वैसे-वैसे हमारी सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन होता जाता है ।

ADVERTISEMENTS:

समाज में दो वर्ग बन जाते हैं- एक भौतिकवादी व दूसरा आध्यात्मवादी । स्पष्ट है कि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था में सुधार होता है, वैसे-वैसे समाज में धनी वर्ग का प्रभुत्व बढ़ जाता है और उत्पादन वृद्धि का लाभ कुछ लोगों को ही मिल पता है, अधिकांश लोग इस लाभ से वंचित रहने के कारण कमजोर वर्ग की श्रेणी में शामिल होने लगते है और समाज में वर्ग द्वन्द की स्थिति बन जाती है ।

इस का प्रभाव भौगोलिक दृश्यों पर पढ़ना है । एक विशाल कारखाने के समीप जहाँ एक ओर भव्य आलीशान ईमारतें दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर श्रमिकों की झोपडियों का समूह । मार्क्स का कहना था कि वैज्ञानिक नियम सर्वव्यापी नहीं होते है, जबकि प्रत्यक्षवादियों का कहना है कि समय और स्थान के साथ यह नियम सर्वव्यापी एवं सार्वभौमिक होते है । मानव जो भी क्रियाएँ करता है, विशेष रूप से उसकी आर्थिक क्रियाएं समय व स्थान के अनुसार बदलती हैं ।

इससे पृथ्वी पर सांस्कृतिक दृश्यों में विभिन्नता भी आ जाती है, और समय-समय पर उनका रूप भी बदलता रहता हे । यह एक सामाजिक निर्माण की ओर संकेत करता है । मानव के ज्ञान में वृद्धि के साथ उसके क्रियाकलापों में अन्तर आता गया है ।

प्रारम्भिक मानव पशुओं के शिकार करने से लेकर आज के मानव द्वारा पशुओं को पालने में अंतर आ चुका है । वह उत्पादन की विभिन्न अवस्थाओं से निकलकर वर्तमान स्थिति में पहुँचा है । उसने पशु उत्पादन पर आधारित बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना की है । इस परिवर्तन ने एक नये आर्थिक तन्त्र व सामाजिक परिदृश्य का निर्माण किया है ।

समाज में नये-नये आर्थिक वर्ग बनने से वर्ग संघर्ष को जन्म मिला है । गरीब वर्ग पर अमीर वर्ग का शोषण बढ़ गया है । इससे समाज गे अनेक प्रकार की बुराइयों ने जन्म ले लिया है । समाज की इस द्वन्दात्मक विशेषता (Dialectical Character) ने मार्क्सवादी चिन्तन को जन्म दिया है । जा इस द्विवाद को मिटाने का प्रयास करता है । वह ऐसे वातावरण के निर्माण पर जोर देता है, जिसमें मानव, सहयोग के साथ रहते हुए प्रकृति के साथ अनुकल सम्बन्ध बनाए रख सके ।

मार्क्सवादी दर्शन का कहना है कि मानव प्रकृति का अंग है । मानव चेतन प्राणी के रूप में है । चेतना व ज्ञान मानव की अपनी उपज है, उसे प्रकृति नहीं प्रदान करती, बल्कि मानव की सोच क्षमता प्रकृति की देन है । वह जिस वातावरण में रहता है, उसकी सोच उसी के अनुसार रहती है । मानव व प्रकृति के बीच प्रमुख अन्तर्किया श्रम है ।

ADVERTISEMENTS:

वह प्रकृति के साथ संघर्ष अपने आपको बनाए रखने के लिए करता है । उसकी यह कार्य पद्धति ही श्रम है, जिसके द्वार वह प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करता है, उनका मूल्य बढ़ाकर समाज के लिए उपयोगी बनाता है । इस क्रिया द्वारा उसके समाज से सम्बन्ध स्थापित होते हैं ।

उत्पादन की अलग-अलग विधियाँ, उसको अलग-अलग प्रकार का उत्पाद सुलभ कराती है. उसी प्रकार से उसके समाज से सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं । उदाहरणत: भूमि का उपयोग मानव विभिन्न तरीके से करता है, कहीं वह उससे कृमि उत्पादन प्राप्त करता है, तो कृषक समाज की रचना होती है, तो कहो कुछ उस पर उद्योग स्थापित करता है, तो औद्योगिक समाज की रचना होती है ।

यह समाज अलग-अलग तेरह से एक दूसरे पर प्रभावी होने की कोशिश करते हैं, और कभी-कभी ऐसा होता है कि यह परस्पर एक दूसरे का शोषण करने लग जाते हैं, और आर्थिक द्वन्द को बढ़ावा पिलने लगता है और मानव जगत में असंतोष बढ़ने लगता हैं ।

ADVERTISEMENTS:

ADVERTISEMENTS:

मानव कभी-कभी अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रकृति का अत्यधिक शोषण करने लगता है । जब वह औद्योगिक अथवा कृषि उत्पादन में वृद्धि करता है, तो उसे भूमि या कच्चे माल की अधिक आवश्यकता होने लगती है । इससे प्राकृतिक वातावरण में संकट उत्पन्न हो सकता है । जिसका अत्यधिक प्रयोग पारिस्थितिकी असंतुलन पैदा कर देता है ।

श्रमिक शक्ति के बढ़ते प्रयोग से उत्पादित वस्तु का मूल्य बढ़ने लगता है । इससे मानव श्रम के शोषण की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं । पूँजीपति श्रमिक वर्ग को उसके श्रम का कम से कम मृल्य देने की चेष्टा करते हैं । जिससे समाज में असंतोष बढ़ने लगता है । कभी-कभी उत्पादित वस्तु का मूल्य बढ़ने से अधिक जनसंख्या उसका उपयोग नहीं कर पाती है, यह स्थिति भी समाज में असंतुलन उत्पन्न कर देती है । यह सब परिस्थितियाँ मानव समाज में कटुता पैदा कर देती है ।

मानव का वातावरण के साथ सम्बन्ध तनाव का रूप ले लेता है । इन्हीं सब कमियों को दूर करने का प्रयास मार्क्सवादी चिन्तन करता है । वह उत्पादन की ऐसी प्रक्रिया अपनाना चाहता है, जिससे प्रकृति का शोषण न हो । मानव को उसके श्रम का उचित मूल्य मिले ।

औद्योगिक या कृषि उत्पादन बढ़ने पर पारिस्थितिकी असंतुलन न पैदा हो । इन उत्पादों का प्रयोग समाज का प्रत्येक वर्ग का सके, व समाजवादी व्यवस्था को जन्म दे सके । यही संकल्पना मार्क्सवादी भूगोल की देन है, जिसका उद्देश्य एक ओर समाज के विभिन्न वर्गों के बीच तार्किक सम्बन्ध स्थापित करना होता है तथा साथ-साथ प्राकृतिक वातावरण से संतुलित सम्बन्ध रखना होता है ।

ADVERTISEMENTS:

वह ऐसी सामारिक प्रक्रिया पर जोर देता है । सामाजिक सम्बन्धों में संतुलन स्थापित करता है यह प्राकृतिक साधनों पर समस्त मानव जगत का समान अधिकार मानता है । इन संसाधनों के संतुलित उपयोग पर जोर देता है, जिससे पर्यावरण में असंतुलन न पैदा हो ।

Home››Philosophy››