सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता के बिना राजनैतिक स्वतंत्रता अर्थहीन है पर निबन्ध !

मात्र राजनैतिक स्वतंत्रता का अर्थ मनुष्य की सम्पूर्ण स्वतंत्रता नहीं है । जब तक मनुष्य को सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होगी, तब तक राजनैतिक स्वतंत्रता अर्थहीन है ।

इसी तथ्य को सामने रखते हुए भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को चाहे वे किसी भी वर्ग, मत, जाति, धर्म, लिंग से संबंधित हों, सभी को राजनैतिक अधिकारों के साथ-साथ सामाजिक और आर्थिक अधिकार भी प्रदान किए गए हैं ।

इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि भारतीय संविधान निर्माता भी देश और व्यक्ति के विकास के लिए राजनैतिक अधिकारों के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक अधिकारों की सार्थकता को समझते थे । मतदान का अधिकार राजनैतिक स्वतंत्रता के अंतर्गत आता है ।

नागरिकों द्वारा चुने गए प्रतिनिधि ही शासन चलाते हैं, बदले में वे उनके कल्याण से संबधित कार्य को निभाते हैं । परन्तु जब तक नागरिक गरीबी, बेरोजगारी के शिकार हैं, उनकी आवश्यकताएं पूरी नहीं होगीं, तब तक इस राजनैतिक अधिकार की कोई मान्यता नहीं है ।

हमारा देश विश्व का सबसे विशाल प्रजातंत्र हैं, लेकिन यहाँ पर लोगों का सामाजिक और आर्थिक स्तर बहुत निम्न है । गरीब लोग कुछ पैसों के लिए अपने राजनैतिक अधिकार का गलत प्रयोग करते हैं । चुनावों के दौरान रुपये के बल पर मत खरीदना नई बात नहीं हैं ।

निरक्षरता और अज्ञानता की समस्याओं ने अभी भी भारत को जकड़ा हुआ है । निरक्षरता को दूर करने के लिए आरंभिक शिक्षा को नि:शुल्क कर दिया गया है, प्रौढ़ प्रशिक्षण केन्द्र खोले गए है । लेकिन इन कक्षाओं में उपस्थित छात्रों की संख्या बहुत कम होती है ।

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छोटी उम्र वाले बच्चों की शिक्षा प्राप्ति में बाधक तत्व क्या हैं? भारत की अधिकांश जनता निर्धन है, छोटी उम्र के बच्चे भी कमाने में लग जाते हैं, किसी-किसी को तो आरंभिक शिक्षा भी नसीब नहीं होती । इन गंभीर प्रश्नों पर बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ केवल बातें करना जानतें हैं, इनके समाधान के लिए अनिवार्य कदम उठाए नहीं जा रहे हैं ।

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मूल आवश्यकताओं की पूर्ति की समस्या के साथ-साथ यदि सरकार न्यायसंगत माँगों और पिछड़े हुए वर्ग के आर्थिक स्तर जैसे मुख्य प्रश्नों का समाधान नहीं करेगी, तो हम सामाजिक-आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सकते हैं । यदि हम गांधी के ‘राम राज्य’ को स्थापित करना चाहते हैं, तो इन मांगों पर तत्काल और सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की आवश्यकता है । अभी तो यह मात्र कल्पना प्रतीत होता है ।

सामाजिक आर्थिक स्वतंत्रता के अंतर्गत सभी स्तरों, वर्गो के लोगों की उन्नति के समान अवसरों का अधिकार आता है । प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन स्तर को ऊँचा उठाने के लिए संघर्ष का अधिकार है । केवल योग्यता ही शिक्षा और जीविका प्राप्ति का मापदंड होना चाहिए । जाति के आधार पर किसी व्यक्ति को प्राथमिकता देना उचित नही है ।

आर्थिक रूप से पिछड़े व्यक्ति को इस प्रकार की सुविधाएं दी जा सकती है । सारत: सभी व्यक्तियों को सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता अथवा अधिकार प्रदान करने के लिए अभी हमारे देश को कई मंजिलें तय करनी है ।

केवल राजनैतिक अधिकारों से ही देश का भविष्य उज्जवल नही होता क्योंकि सामाजिक आर्थिक स्वतंत्रता का कोई अर्थ नही है । सामाजिक और आर्थिक रूप से सम्पन्न व्यक्ति ही उचित राजनैतिक निर्णय लेने में समर्थ हो सकते है ।

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