ध्वनि प्रदूषण पर निबंध | Dhvani Pradooshan Par Nibandh! Read this Essay  on Sound Pollution in Hindi.

Essay # 1. ध्वनि या शोर प्रदूषण का अर्थ (Meaning of Sound or Noise Pollution):

ध्वनि अथवा आवाज जिसके माध्यम से मानव बातचीत करता है, पशु-पक्षी नैसर्गिक रूप से विविध प्रकार की ध्वनियाँ निकालते हैं, बहते हुए जल की ध्वनि किसे आनंदित नहीं कर देती अथवा जंगल में शेर की दहाड़ किसका दिल नहीं दहला देती है ।

बादलों का गर्जन हो अथवा तूफान की तेजी, ज्वालामुखी का विस्फोट हो अथवा समुद्री लहरों का तट से टकराना-ये सभी ध्वनि हैं । वास्तविकता यह है कि ध्वनि प्राकृतिक क्रियाओं से उद्भूत होती है साथ ही मानवीय अभिव्यक्ति का साधन है ।

इसी के द्वारा संचार एवं विचारों का आदान-प्रदान संभव है और इसी से संगीत की मधुर लहरियाँ भी उठती हैं । किंतु यही ध्वनि जब अप्रिय एवं अवांछनीय लगने लगे तथा कानों पर अतिरिक्त दबाव डालने लगे तो वह प्रदूषण का कारण बनती है ।

वास्तव में ध्वनि जब शोर का रूप ले लेती हैं तो वह प्रदूषण की श्रेणी में आ जाती है क्योंकि उसका मानव मस्तिष्क एवं कर्णेन्द्रियों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है । जैसा कि मैक्सवेल ने वर्णित किया है- ”शोर वह ध्वनि है जो अवांछनीय है । यह वायुमण्डलीय प्रदूषण का एक प्रमुख कारक है ।”

आधुनिक यांत्रिक युग में निरंतर बढ़ते कल-कारखाने, उद्योग धंधे, रेलगाड़ियाँ, मोटरें एवं अन्य स्वचालित वाहन, जेट एवं हवाई जहाज की आवाज तो शोर का कारण बनते ही हैं, आज तेज आवाज का संगीत, धार्मिक एवं सामाजिक समारोह, जुलूस, जनसभा आदि सभी ध्वनि प्रदूषण के कारण हैं ।

ये सभी क्रियाएँ मानव अपने लिये, समाज के लिये, विविध वस्तुओं के उत्पादन के लिये करता है, अत: यह तात्पर्य नहीं कि वह इन सब कार्यों को समाप्त कर पुन: आदिम व्यवस्था में चला जाये । किंतु अनेक प्रकार के शोर निरर्थक हैं तथा कुछ को कम करके संतुलित किया जा सकता है ।

अत: इस समस्या का समुचित विवेचन अपेक्षित है, जिससे हम वस्तु-स्थिति से परिचित हो सकें । यह एक ऐसी समस्या है जो नगरीय संस्कृति की देन है, इसी कारण संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 1972 में आयोजित पर्यावरण संगोष्ठी में ध्वनि प्रदूषण को एक समस्या स्वीकार किया गया, जिस पर नियंत्रण किया जाना आवश्यक है ।

Essay # 2. शोर का मापन एवं प्रबलता (Measurement of Noise and Its Intensity):

शोर एक सापेक्षिक तथ्य है जिसे अनुभव के आधार पर श्रेणीबद्ध करना कठिन है क्योंकि कुछ व्यक्तियों को ‘पोप’ संगीत तीव्र शोर लगता है तो अन्य को मधुर । इसी प्रकार ग्रामीण अंचल से आये व्यक्ति को शहर का वातावरण अत्यधिक शोर वाला लगता है ।

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अत: अनुभव से इसमें भिन्नता नहीं की जा सकती । इसी कारण ध्वनि अथवा शोर मापन हेतु वैज्ञानिकों ने एक पद्धति विकसित का जिसमें ध्वनि को प्रबलता को ऊर्जा के पारस्परिक संबंध के माध्यम से मापन किया जाता है ।

मापन हेतु जिस इकाई का प्रयोग किया जाता है उसे ‘डेसीबल’ कहते हैं और जिस यंत्र से इसका मापन होता है उसे ‘शोर मापक यंत्र’ कहते हैं । डेसीबल में वार्तालाप की ध्वनि 610 डेसीबल की गई है तथा 100 डेसीबल की ध्वनि अत्यधिक तीव्र की श्रेणी में आ जाती है ।

तीव्र ध्वनियों की प्रबलता डेसीबल में इस प्रकार हैं:

I. डेसीबल 150 – असह्य पीड़ा,

II. डेसीबल 140 – पीड़ा आरंभ,

III. डेसीबल 130 – संवेदना आरंभ,

IV. डेसीबल 110 – मोटर हार्न ।

अधिकांश देशों में शोर की अधिकतम सीमा 75 से 85 डेसीबल निर्धारित की गई है । वैज्ञानिकों के अनुसार 90 डेसीबल के ऊपर की ध्वनि के प्रभाव में लंबे समय तक रहने पर व्यक्ति बहरा हो जाता है ।

विभिन्न स्रोतों से उत्पन्न ध्वनियों की प्रबलता डेसीबल में इस प्रकार से हैं:

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ध्वनि अथवा शोर की तेजी नगरों में अपेक्षाकृत अधिक तथा ग्रामीण अंचलों में कम होती है । भारत में भिन्न-भिन्न नगरों में ध्वनि प्रदूषण की दर 75 से 90 डेसीबल है जो बहुत अधिक नहीं है, किंतु हवाई अड्डों, रेलवे स्टेशनों, औद्योगिक क्षेत्रों में यह अपेक्षाकृत अधिक होता है ।

Essay # 3. शोर प्रदूषण के स्रोत (Sources of Noise Pollution):

शोर प्रदूषण के स्रोतों को दो श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है:

(i) प्राकृतिक एवं

(ii) मानवीय अथवा कृत्रिम ।

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(i) प्राकृतिक स्रोत:

कतिपय प्राकृतिक क्रियायें भी शोर प्रदूषण का कारण होती हैं, जैसे- बादलों का गरजना, बिजली का कड़कना, तूफानी हवायें, ज्वालामुखी का विस्फोट, भूकंप, समुद्री तट पर लहरों का टकराना, तीव्र गति से गिरता जल आदि । ये कारक क्षेत्रीय होते हैं और कुछ का प्रभाव केवल सैकण्डों अथवा मिनटों में रहता है ।

साथ ही इनका प्रभाव कभी-कभी अधिक हो जाता है किंतु सामान्यतया अधिक नहीं होता । वन्य जीवों की आवाजें भी शांत वन में शोर का कारण बन जाती हैं । किंतु सभी प्राकृतिक कारकों का प्रभाव क्षणिक होने से अधिक हानिकारक नहीं होता ।

(ii) मानवीय अथवा कृत्रिम स्रोत:

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औद्योगिक एवं परिवहन के साधनों का निरंतर विकास, विद्युत उपकरणों द्वारा ध्वनि विस्तार, विभिन्न प्रकार के श्रव्य उपकरणों का विकास तथा अनेक मानवीय क्रियाओं से उत्पन्न होता हुआ शोर प्रदूषण का कारण बनता है ।

शोर प्रदूषण के मानवीय स्रोतों को निम्नांकित भागों में विभक्त किया जा सकता है:

(I) औद्योगिक संस्थानों द्वारा,

(II) परिवहन के साधनों द्वारा,

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(III) मनोरंजन के साधनों द्वारा,

(IV) अन्य ।

(I) औद्योगिक संस्थानों द्वारा:

शोर प्रदूषण का एक प्रमुख कारण उद्योग एवं उनमें चलती मशीनों की आवाज या शोर है । आज उद्योगों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है साथ ही उनमें प्रयुक्त मशीनों का आकार भी वृहत् से वृहतर होता जा रहा है । उद्योगों में प्रयुक्त विभिन्न मशीनों के घर्षण से शोर प्रदूषण भी अधिक होता जा रहा है ।

उद्योगों से होने वाले शोर का सर्वाधिक प्रभाव वहाँ कार्य करने वाले मजदूरों एवं अन्य कर्मचारियों पर पड़ता है क्योंकि उन्हें निरंतर उसी को सुनना पड़ता है जबकि सीमित मात्रा में इनका शोर समीपवर्ती क्षेत्रों के निवासियों को भी प्रभावित करता है ।

केवल वृहत् उद्योगों से ही शोर होता हो ऐसा नहीं अपितु छोटे उद्योगों से भी शोर होता है, विशेषकर जहाँ तोड़ने, कूटने, काटने आदि का कार्य होता है । उम्र के साथ-साथ कारखानों के मजदूरों की शोर प्रदूषण से अधिक हानि होती है । जैसे 30 वर्ष से कम मजदूर के लिये 95 डेसीबल तक शोर हानिकारक नहीं है जबकि 40 से 50 वर्ष की उम्र वाले मजदूर के लिये यह सीमा 84 डेसीबल तथा 50 से 60 वर्ष की आयु वाले के लिये 80 डेसीबल है ।

(II) परिवहन के साधनों द्वारा:

वर्तमान शहरी सभ्यता में परिवहन के साधन सर्वाधिक शोर प्रदूषण के कारक हैं । स्थलीय परिवहन के विभिन्न साधन जैसे- ट्रक, बस, मोटर-साइकिल, स्कूटर अग्निशमन गाड़ी, पुलिस के वाहन, एम्बुलेंस रेल आदि सभी शोर प्रदूषण के कारक बनते हैं ।

इनमें प्रयुक्त हॉर्न, सायरन आदि शोर का कारण बनते हैं । यही नहीं, अपितु वाहन के चलने से इंजन की आवाज तथा रेल के घर्षण के द्वारा उत्पन्न आवाज शोर का कारण है । रेल्वे प्लेटफार्म पर जब इंजन हॉर्न देता है तो शायद ही कोई इस प्रदूषण से बचता हो क्योंकि यह कर्ण भेदी ध्वनि होती है ।

अत: रेल्वे स्टेशनों एवं उसके निकट के निवासियों को इस शोर को निरन्तर सहन करना होता है । सड़कों पर दौड़ने वाले वाहन भी पर्याप्त शोर का कारण हैं । शहरों में विशेष हॉर्न लगी गाड़ियाँ, जैसे- अग्निशमन, एम्बुलेंस, पुलिस उड़न दस्ता आदि भी अत्यधिक शोर करते हैं ।

अमेरिका में किये गये प्रयोगों से भी ज्ञात होता है कि यदि अधिक शोर करने वाले सायरनों अथवा हॉर्न न भी प्रयोग किया जाये तो उनकी सेवाओं में किसी प्रकार का फर्क नहीं पड़ता है । स्थलीय परिवहन ही नहीं अपितु वायु परिवहन भी शोर प्रदूषण का प्रमुख कारण है ।

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विशेषकर हवाई अड्डों पर जहाँ से वायुयान उड़ान भरता व उतरता है । हवाई जहाज का जेट इंजन उड़ान भरते समय पीड़ा प्रदायक शोर उत्पन्न करता है जो 150 डेसीबल का होता है । इन हवाई अड्डों के निकट के निवासियों पर इस प्रदूषण का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है, विशेषकर बच्चों व वृद्धों पर । वर्तमान समय में हवाई उड़ानों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है ।

न केवल विकसित बल्कि विकासशील देशों में भी इनके उपयोग में वृद्धि हो रही है । यही नहीं, अपितु वर्तमान में जेट से भी उन्नत ‘सुपर सोनिक’ वायुयान का विकास शोर प्रदूषण में और अधिक वृद्धि का कारण है क्योंकि सुपर सोनिक विमान ध्वनि से भी तीव्र गति से उड़ते हैं जिसमें प्रतिघाति तरंगें उत्पन्न होती हैं । इन तरंगों से वायुमण्डल में आकस्मिक दाब उत्पन्न होता है जो सोनिक बूम या ध्वनि बूक के रूप में प्रगट होता है । इसे सोनिक-धमाके भी कहते हैं, जो 10 से 100 कि.मी. क्षेत्र में विस्तृत होता है ।

(III) मनोरंजन के साधनों द्वारा:

मनोरंजन के साधनों में वर्तमान में एक प्रमुख परिवर्तन आया है वह इलेक्ट्रिक माध्यमों से तेज संगीत का प्रचलन । यह केवल सार्वजनिक स्थलों पर ही नहीं अपितु घरों में भी अत्यधिक प्रचलित हो चला है । धार्मिक उत्सवों, सामाजिक समारोहों पर शोर भरा संगीत जहाँ मनोरंजन करता है, वहीं शोर प्रदूषण भी ।

वर्तमान में प्रचलित ‘पॉप संगीत’ जितना अधिक शोर वाला है उतना ही हानिकारक भी ।  टी.वी., रेडियो आदि पर तेज ध्वनि में निरन्तर संगीत या अन्य कार्यक्रम सुनना अन्त में बहरेपन को जन्म देता है । इस प्रकार कान में यन्त्र लगा कर लगातार संगीत सुनना बहरेपन को आमन्त्रण देना है ।

(IV) अन्य कारक:

उपर्युक्त प्रमुख शोर प्रदूषण के कारकों के अतिरिक्त भी अनेक सामान्य एवं दैनिक कार्यों से शोर प्रदूषण होता है ।

यथा:

(i) सड़क निर्माण के लिए इंजन चलाना,

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(ii) चुनावों का प्रचार,

(iii) धार्मिक कथा-कीर्तन,

(iv) विवाह उत्सवों में बैंड का प्रयोग,

(v) खनिज खनन,

(vi) सेना द्वारा युद्धाभ्यास ।

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