Unity is Strength (With Picture) !

एकता में शक्ति है |

एक बार शरीर के सभी अंगों के दो पक्ष बन गए । हाथ, पैर, मुंह, दांत आदि सभी अंग एक तरफ थे । पेट बेचारा अकेला था । सभी अंग पेट को जली-कटी सुना रहे थे- ”महाआलसी है । कुछ करता धरता भी नहीं, खाली बैठे-बैठे चरता रहता है ।”

हाथों ने कहा- ”हम सारा दिन मेहनत करते हैं, यह पट्ठा आराम से अच्छी-अच्छी चीजें खाता रहता है ।” ”यही बात है दोस्तो ।” पैरों ने कहा- ”हमारा परिश्रम देखो, दिन-भर इसके खाने के लिए दौड़-धूप करते हैं । दर्द के मारे बुरा हाल रहता है, मगर यह तो जैसे किसी की चिंता ही नहीं करता ।”

”परेशान तो मैं भी हूं इससे ।” जीभ बोली- ”खाता पट्ठा यह है । परेशानी मुझे उठानी पड़ती है । यह मिर्च मांगता है, मुझे कितनी जलन होती है, मैं ही जानती हूं, पर इसे अपने स्वाद के आगे किसी की चिंता नहीं है ।”

”यह तुम लोग कैसी बातें कर रहे हो?” पेट ने कहा- ”यह मत समझो कि मैं कुछ नहीं करता । मैं भी बहुत काम करता हूं ।” ”अबे चल आलसी!” पैरों ने कहा- ”तू बस बातें बनाना जानता है । कल से हम तेरे लिए खाने की खोज में नहीं जाएंगे । तब देखेंगे कि क्या करता है ।”

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”तभी इसे पता चलेगा । मैं भी हड़ताल किए देता हूं ।” मुँह ने कहा- ”अब यदि एक कौर भी निगलूं तो कहना ।” ”हम भी एक दाना नहीं चबाएंगे ।” दांतों ने कहा । बस हड़ताल हो गई । पैरों ने चलना-फिरना छोड़ दिया । हाथों ने हिलना बंद कर दिया ।

मुंह ने कौर निगलना, दांतों ने चबाना छोड़ दिया । पेट को परेशानी तो बहुत हो रही थी, परंतु वह चुप रहा । इस हड़ताल का परिणाम यह निकला कि सारे अंग कुछ ही दिनों में दुर्बल हो गए । सबने फिर मिलकर विचार किया । ”यार, यह क्या हुआ?”

पैरों ने दुखी होकर कहा- ”हमारे तो प्राण ही निकले जा रहे हैं । बुरी हालत हो रही है ।” ”यही हाल हमारा है । रंग देखो, पीला पड़ रहा है ।” हाथों ने कहा । ”यह सब हड़ताल का परिणाम है ।” मुंह ने क्षीण आवाज में कहा- ”हमने बेवकूफी की है । हमें अपना काम बंद नहीं करना चाहिए ।”

”सही बात है ।” जीभ लड़खड़ाती हुई बोली- ”मेरे तो कांटे से उग आए हैं । सांस भी तीर की तरह चुभती है ।” ”इन समस्याओं से निबटने का एक ही तरीका है ।” मुंह बोला । ”क्या?” सभी ने एक साथ पूछा । ”हमें अपना-अपना काम करना चाहिए, इसी में आनंद है ।

हड़ताल को लात मारो । अपना-अपना काम देखो ।” पेट उनकी बात सुनकर मुस्कराया । उन्हें अक्ल आ गई थी । हड़ताल खत्म हो गई । सभी अंग अपना-अपना काम करने लगे । कुछ ही दिनों में सब स्वस्थ हो गए । सब बड़े खुश थे ।

”क्या समझे भाइयो!” पेट ने एक दिन कहा- ”क्या अब भी यही कहोगे कि मैं निठल्ला बैठा रहता हूं?” ”नहीं भाई, परंतु हमारी समझ में एक बात नहीं आ रही ।” सभी ने कहा । ”क्या?” ”तुम कुछ करते नजर तो नहीं आते ।” ”मैं बताता हूं ।” पेट ने कहा- ”पैर तो भोजन की खोज में जाते हैं ।

हाथ उस भोजन की प्राप्ति के लिए श्रम करते हैं, फिर उसे मुंह तक हाथ ही पहुंचाते हैं । दांत उसे चबाकर मुझ तक पहुंचाते हैं । मैं उसे अच्छी तरह पचाता हूं । उससे एक रस बनता है । यही रस मैं वापस तुम सबको सौंप देता हूं ।

इससे तुम लोग मजबूत रहते हो । दोस्तो! संसार का प्रत्येक कार्य सहयोग से होता है । हमारी एकता से ही शरीर का कार्य चलता है ।” ”हम समझ गए ।” सभी अंगों ने कहा- ”हम मान गए कि सहयोग से ही सब काम चलते हैं । एकता में ही शक्ति है ।”

सीख:

बच्चो! यह कहानी हमें बताती है कि हर कार्य सहयोग से होता है । एकता में बल है । अर्थात हमें एक रहना चाहिए ।

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