बिना टिकट यात्रा पर निबन्ध | Essay on Ticketless Travel in Hindi!

रेलगाड़ी के प्रत्येक डिब्बे में लिखा होता है – भारतीय रेलें आपकी अपनी संपत्ति है । बिना टिकट यात्रा एक बड़ा अपराध है । फिर भी रेलगाड़ियों में बिना टिकट यात्रा की घटनाएं आम सुनने को मिलती हैं ।

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आलम तो यह है कि सार्वजनिक सम्पत्ति के प्रति कोई भी व्यक्ति उत्तरदायित्व महसूस नही करता हैं । अत: लोग बिना टिकट यात्रा को अपनी शान समझते हैं । और जो टिकट लेते हैं, यात्रा के दौरान उनकी मूल आवश्यकताएं पूरी नही होती हैं ।

यात्रा के दौरान जब अचानक टिकट की छानबीन शुरु की जाती है, तो सैकड़ों बिना टिकट यात्री पकड़े जाते हैं । उनको जुर्माना अथवा जेल की हवा खानी पड़ती है । लेकिन यह भय कुछ समय बाद ही समाप्त हो जाता है । लोग अपने सामाजिक और नैतिक कर्तव्यों की परवाह किए बिना पुन: बिना टिकट यात्रा करने लगते हैं ।

यही कहानी यातायात के स्थानीय साधनों जैसे बसों में दोहराई जाती है । बिना टिकट यात्री तो आराम से सीटों में बैठकर यात्रा का आनंद लेते हैं जबकि टिकट खरीदकर यात्रा करने वाले खड़े रहकर अपने भाग्य को कोसते हुए यात्रा करते हैं । बिना टिकट यात्रा करने वालों के खिलाफ कठोर दंड का प्रावधान किया जाना चाहिए । क्योंकि दस-बीस रु. का दंड देने के बाद वे पुन: बिना टिकट यात्रा करने प्रारंभ कर देते हैं ।

इस समस्या को सुलझाने के लिए युवा-पीढ़ी को जागृत करने की आवश्यकता है । युवा अपने सामाजिक दायित्वों और नैतिक कर्तव्यों को समझे । यदि हम सार्वजनिक सम्पत्ति का फायदा उठाना चाहते हैं तो हमें उनके रख-रखाव की ओर भी ध्यान देना चाहिए ।

सार्वजनिक सम्पत्ति की देखभाल हमारे द्वारा टिकट के रूप में मुक्त की गई राशि पर निर्भर करती है । इस नैतिक भावना के जागने से बिना टिकट यात्रा की समस्या पूर्ण रूप से तो नहीं, लेकिन कुछ हद तक हल की जाएगी ।

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