महत्त्वाकांक्षा | Paragraph on Ambition in Hindi!

जिस देश का कोई अतीत नही, वही सुखी है, क्योंकि इतिहास राजाओं, शासकों की उच्च महत्त्वाकांक्षाओं से प्रेरित युद्धों, लड़ाइयों से भरा पड़ा है । भूमि और धन-संपत्ति पर आधिपत्य जमाने की उनकी लिप्सा के कारण उन्होंने विनाश और तबाही मचाई । इन मानवता विरोधी अपराधों से उनकी आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा ।

उनकी उच्च महत्वाकांक्षा के कारण नैतिकता और दर्शन के सभी नियम धरे के धरे रह गए । ईश्वर से विद्रोह करने वाले शैतान से लेकर, विश्वविजय का सपना देखने वाले बीसवीं शताब्दी के तानाशाह तक, एक तरफ तो अत्याचार और यातना की कहानी मिलती है और दूसरी तरफ दुःख और पीड़ा की ।

बाइबिल इस ओर इंगित करती है, कि किस प्रकार ल्यूसिफर की महत्त्वाकांक्षा के कारण फरिश्तों में अनबन हो गई । जीहॉव के विरूद्ध ल्यूसिफर ने जो युद्ध किया उसका परिणाम नारकीय था । इन्हीं के साथ मानव के दु:ख एवं पीड़ा की कहानी प्रारंभ होती है । महत्त्वाकांक्षा व्यक्ति को झूठा और बेईमान बना देती है, जिसके मुँह में राम और बगल में छुरी होती है, वह मित्रता के सभी बंधनों को तोड़कर केवल निजी स्वार्थ से लिप्त रहता है और महत्वाकांक्षा की प्राप्ति ही उसका मुख्य ध्येय होता है ।

महाभारत दुर्योधन की विश्रृंखल महत्त्वाकांक्षा का ही परिणाम था, जिसके कारण संपूर्ण देश में विनाश व्याप्त हो गया था । प्रारंभ से ही उसने राजा बनने और शासन करने की महत्त्वाकांक्षा पाल रखी थी । इसी की प्राप्ति के लिए उसने अपने चचेरे भाइयों, पांडवों को मारने के षडयंत्र रचे । उसने उन्हें जिंदा जलाने का प्रयास किया और जब वे इससे बच निकले तो जुए में चालाकी से हराकर वनवास भेज दिया ।

वनवास की शर्त पूरी होने पर भी उसने पांडवों को उनका राज्य नहीं लौटाया । महाभारत की लड़ाई हुई, जिससे संपूर्ण देश शताब्दियों तक कमजोर और निर्बल बना रहा । 5,000 वर्ष बीतने के बाद भी भारत उस गौरव और महिमा को प्राप्त करने में असमर्थ रहा है । इस प्रकार उच्च महत्वाकांक्षा देशों का विनाश करती है और शांति को नष्ट कर सकती है ।

सिकन्दर में भी विश्व विजय की महत्त्वाकांक्षा थी । उसने अपना अभियान मैक्डोनिया से प्रारंभ किया जो ट्राय, पेर्सिया और भारत भूमि तक फैला । एच.जी. वेल्स ने अपनी पुस्तक में पर्सियन साम्राज्य की राजधानी पेरिसपोलिज को हथियाने के लिए सिकन्दर द्वारा किए गए अमानवीय अत्याचारों का वर्णन किया है ।

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उसने अपने सैनिकों को पर्सिया और पड़ोसी नगरों को तहस-नहस करने का सभी वयस्कों को बलि चढ़ाने का आदेश दिया । भारत भूमि में भी उसका व्यवहार इससे अच्छा नहीं था, यद्यपि पोरस के साहस ने इस देश को विनाश से बचा लिया था । जब सिकन्दर मरा तो वह साम्राज्य जो उसने दूसरों से छीना था और उस पर अधिकार कर लिया था वह छिन्न-भिन्न हो गया । हर ओर अव्यवस्था और गड़बड़ फैल गई ।

शेष कहानी निर्मम तानाशाही और अस्तव्यस्तता की है । हर स्थान पर प्रान्तीय शासकों ने अपने छोटे-छोटे राज्य बना लिए । हर ओर बेईमानी और अपराध का साम्राज्य व्याप्त हो गया और इन शान्तिपूर्ण स्थानों पर जीवन नारकीय हो गया । इसीलिए कहा गया है कि महत्त्वाकांक्षा का दूसरा नाम अराजकता है ।

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जूलियस सीजर का भी सिकन्दर के जैसा हाल हुआ । इतिहास गवाह है कि सिकन्दर ने कार्थेज और रोम पर विजय प्राप्त करके पूरे भारत पर अधिकार करने की योजना बनाई थी पर इसकी मृत्यु के कारण ये योजनाएं धरी की धरी रह गई । इसी प्रकार जूलियस सीजर भी महत्त्वाकांक्षी था । सम्पूर्ण यूरोप पर क्रमबद्ध विजय प्राप्त करना चाहता था ।

सबसे पहले उसने शत्रु पोम्पी को हराया और फिर पूरे रोमन साम्राज्य पर अधिकार कर लिया । वह जीवन भर तानाशाही करता रहा । यह राजतंत्र था । राजा जीवन भर शासन करता था । सत्ता व्यक्ति को भ्रष्ट और सम्पूर्ण सत्ता पूर्ण भ्रष्ट बना देती है । सीजर भी जैसा कि उससे पहले सिकन्दर था, राजा को भगवान समझे जाने की परम्परा के कारण अभिमानी हो गया । वह अपराजेय समझा जाता था ।

कहा जाता है कि ब्रिटेन पर विजय प्राप्त करने के बाद उसने कहा, ”मैं आया, मैंने देखा, मैं विजयी हुआ” महत्वाकांक्षा के दानव से ग्रस्त, वह अपनी विजय यात्राओं पर बढ़ता गया और रक्तपात, मृत्यु और विध्वंस के निशान छोड़ता गया । अंतत: इस महत्वाकाँक्षी व्यक्ति का अंत इसके मित्रों और साथियों के हाथों हुआ ।

शेक्सपियर ने अपने नाटक ‘जूलियस सीजर’ में सीजर के एक परम मित्र ब्रूदस से ये प्रभावपूर्ण शब्द कहलवाए है ”सीजर मुझे प्यार करता था, इसलिए रोता हूँ, उसके लिए; वह सौभाग्यशाली था, इसलिए मैंने हत्या कर दी उसकी, उसके प्रेम के लिए आँसू हैं, सौभाग्य के लिए प्रसन्नता, वीरता के लिए सम्मान और महत्त्वाकांक्षा के लिए मृत्यु है ।”

सोलहवीं शताब्दी में स्पेन के शासक फिलिप की महत्त्वाकांक्षा देखने को मिलती है । वह राज्य सीमा का अधिक से अधिक विस्तार करना चाहता था और अधिक से अधिक सोना प्राप्त करना चाहता था । अमरीकी सोने के लदे हुए जलयान स्पेन आते थे पर इससे उसकी भूख बढ़ती ही जाती थी ।

ब्रिटेन की नोसैनिक शक्ति को ध्वस्त करने के लिए उसने अपनी अपराजेय नौसेना को ब्रिटिश समुद्र में भेजा । पर एक भयानक तूफान से उसकी नौसेना पूरी तरह से नष्ट हो गई । उसका घमण्ड चूर-चूर हो गया और शक्ति क्षीण हो गई ।

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लेकिन इन सब घटनाओं से महत्वाकांक्षी व्यक्तियों ने कोई शिक्षा ग्रहण नहीं की । अठारहवीं शताब्दी में जब फ्रांस की क्रांति अपने चरम उत्कर्ष पर थी, नेपोलियन ने सीजर के समान विश्व विजय, शत्रुओं और मित्रों को अपने कदमों में झुकाने की महत्त्वाकांक्षा अपने अंदर पाली थी । विश्व विजय की उसकी उपलब्धि अद्वितीय होती यदि वह रक्त से रंगी हुई नहीं होती । विनाश का यह दौर समाप्त हुआ और उसे अपनी शेष जिन्दगी सेंट हीलीना के गर्म द्वीप में बितानी पड़ी ।

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एक सनकी व्यक्ति के महत्वोन्माद के कारण संपूर्ण यूरोप आग में घिर गया । यदि राज परिवार के किसी व्यक्ति के पैर में कंपन भी होता तो आम जनता का कहना था, “कौन जानता है कि आज रात दुनिया खत्म हो जाएगी?” उसकी सनक के कारण यूरोप युद्धभूमि में परिवर्तित हो गया था । इसी प्रकार हिटलर ने पूरे यूरोप में जर्मनियों के शासन की महत्त्वाकांक्षा को प्रश्रय दिया ।

सबसे पहले उसने जर्मनी से यहूदियों को बाहर निकालने का अभियान छेड़ा । इसके पश्चात् उसने यूरोपियन देशों के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी । दस वर्षो तक यूरोप में स्थिति तनावपूर्ण रही । सन् 1933 में रिहिनलैंड, सार और चेकोस्लोवाकिया पर विजय की प्रक्रिया प्रारंभ हुई ।

तत्पश्चात विश्वयुद्ध हुआ जो पूरे छ: साल चला । इन युद्धों में जान और माल की बहुत हानि हुई । एक मनुष्य की महत्वाकांक्षा का मूल्य पूरे विश्व को चुकाना पड़ा । मनुष्य का जन्म महत्त्वाकांक्षा सहित होता है, और अपनी महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए वह दूसरों की शांति और समृद्धि के लिए अभिशाप बन जाता है ।

आज कुछ देशों के निजी स्वार्थो के कारण ही विश्व तृतीय युद्ध की ओर बढ़ रहा है । यदि विश्वयुद्ध छिड़ जाएगा तो संपूर्ण विश्व की समाप्ति हो सकती है । इसलिए शांति स्थापित करने के लिए महत्वाकांक्षा को वश मैं रखने की आवश्यकता है ।

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