योगासन और प्राणायाम पर निबंध | Essay on Yoga and Pranayama in Hindi!

योगासन और प्राणायाम का विकास भारत में ही हुआ है जो मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य के विकास से जुड़ा हुआ है । हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों ने विभिन्न योगासनों का विकास कर मनुष्य के जीवन को स्वस्थ एवं प्रसन्नता से परिपूर्ण करने की चेष्टा की थी ।

साधारण रूप से योग का अर्थ है जोड़ना । योग + आसन जिससे योगासन शब्द बना है का संपूर्ण अर्थ है ऐसे आसन जो मनुष्य को परमात्मा से जोड़ते हैं । आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व भारतीय मनीषि पतंजलि ने योगशास्त्र की रचना की थी जिसमें उन्होंने योग शब्द का प्रयोग मन की प्रवृत्तियों पर नियंत्रण रखने के लिए किया था ।

योग के माध्यम से शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के सामूहिक विकास के प्रयास किए जाते हैं । इसका लक्ष्य शरीर और मन को प्रशिक्षण देना होता है तथा आसन अपने असाधारण प्रभाव के कारण इसका एक अभिन्न अंग है । इसी तरह प्राणायाम श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण रखने एवं इसे नियमित करने का विज्ञान है ।

जब हम क्रोध में होते हैं तब हमारी साँस कुछ और ढंग से चलती है तथा जब हम शांतचित्त एवं करुणामय होते हैं हमारी साँस की लय बदल जाती है । दु:ख, संताप, आवेग, खुशी, आनद जैसे अलग-अलग मनोभावों के आगमन पर साँस की लय एवं रफ्तार घटती-बढ़ती रहती है । प्राणायाम में साँस भीतर लेना, फिर रोकना और बाहर निकालना तथा फिर रोकना ये क्रियाएँ रीतिपूर्वक संपन्न होती हैं ।

साँस रोकना कुंभक कहलाता है । यह दो प्रकार का होता है – आतरिक कुंभक और बाह्‌य कुंभक । आतरिक कुंभक साँस लेने तथा उसे छोड़ने के मध्य का समय है । बाह्‌य कुंभक साँस बाहर निकालने और फिर साँस भीतर लेने के बीच का समय है । इन विधियों का अभ्यास करने से श्वसन तंत्र, नाड़ी तंत्र आदि पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है तथा मानव मस्तिष्क अधिक सक्रिय होकर कार्य करने लगता है ।

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योगासनों तथा प्राणायाम का सही अभ्यास परमावश्यक है । इनके गलत अभ्यास से लाभ के स्थान पर हानि होने की संभावना अधिक रहती है । विभिन्न परिस्थितियों में अर्थात् अलग-अलग शारीरिक दशा वाले व्यक्तियों के लिए किस तरह का आसन उपयोगी है, इसका निर्णय प्रशिक्षक या गुरु ही भली-भाँति कर सकते हैं । उचित समय, उचित स्थान, स्नान, स्वच्छता, भोजन एवं वस्त्र इत्यादि का निर्णय भी आवश्यक है तभी हम योगासन और प्राणायाम का उचित लाभ उठा सकते हैं ।

योगासन और प्राणायाम का उचित समय प्रात:काल या सायंकाल होता है जब व्यक्ति का पेट खाली होता है । समतल स्थान पर चादर, कंबल या दरी आदि बिछाकर इनका अभ्यास करना लाभप्रद होता है । लेकिन शुरू-शुरू में किसी योग्य प्रशिक्षक के समक्ष ही इनका अभ्यास करना नितांत आवश्यक है ।

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आधुनिक युग में मनुष्य का स्वास्थ्य गलत आहार-विहार, असंयम तथा तनाव के कारण बिगड़ता जा रहा है । खिला चेहरा, तेजोमय व्यक्तित्व, कसा शरीर, शारीरिक श्रम बिना थके करने की क्षमता, सरदी-गरमी सहन करने की सामर्थ्य, चमकीले नेत्र, चौड़ी छाती, गंधरहित साँस, प्रात:काल उठने पर ताजगी एवं प्रसन्नता का अनुभव, सिर ठंडा, तलवे गरम आदि उत्तम स्वास्थ्य के लक्षण हैं जिनका अधिकांश व्यक्तियों में अभाव देखा जाता है ।

बहुत से लोग नित्य महँगी दवाइयों पर निर्भर हैं, यहाँ तक कि रात्रिकाल में सोने के लिए भी टिकिया खानी पड़ती है । मधुमेह, कब्ज, हृदय रोग, यौन विकार, खाँसी, आँत वृद्‌धि, थकावट, एसीडीटी, पाचन प्रणाली की दुर्बलता जैसे रोगों में वृद्‌धि हो रही है । आम व्यक्ति किसी न किसी शारीरिक समस्या से पीड़ित है ।

ऐसे में योगासनों का महत्व और भी बढ़ जाता है । इनके समुचित अभ्यास से विभिन्न प्रकार की शारीरिक बीमारियाँ शनै:-शनै: दूर हो जाती हैं । शरीर बलशाली बनता है जिससे रोग पुन: होने की संभावना भी समाप्त हो जाती है । योगासन और प्राणायाम स्मरण शक्ति के विकास को संभव बनाते हैं तथा चित्त में शांति और धैर्य उत्पन्न होता है ।

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