Here is an essay on the Indian food policy especially written for school and college students in Hindi language.

भारतीय व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग भारतीय खाद्य पदार्थ व्यवस्था जो कि पूर्णत: अव्यवस्थित है आज यदि दाल पचास रूपये प्रति किलो है तो हो सकता है कल साठ रूपये प्रति किलो मिले ।

आटा यदि आज बीस रूपये प्रति किलो है तो हो सकता है कल आपको चौबीस या पच्चीस रूपये प्रति किलो मिले क्योंकि यही तो भारतीय खाद्य पदार्थ नीति है जो प्रतिदिन बदलती रहती है । व्यक्ति अपना बजट एक माह का बनाता है । लेकिन उसको अपने बजट में रोजाना संशोधन करना पड़ता है ।

भारतीय खाद्य पदार्थ नीति पूर्णत: सब्जी मण्डी की सब्जी के भाव की तरह है जो रोजाना किसी सब्जी के अधिक मात्रा में आने पर सस्ती और  कम मात्रा में आने पर मँहगी हो जाती है इस प्रकार भारतीय खाद्य पदार्थ नीति में होने वाला परिवर्तन भारतीय व्यवस्था की पोल खोलता है जो सिद्ध करता है कि भारतीय खाद्य पदार्थ नीति भी सशख्त परिवर्तन की आवश्यकता महसूस कर रही है तभी तो किसी भी खाद्य पदार्थ पर सरकार का मूल्य नियंत्रण नहीं है ।

कोई भी वस्तु जो खाद्य पदार्थ के रूप में उपयोग में लायी जा रही है । उस पर मूल्य तो अंकित है लेकिन बिक्री उससे कहीं ऊँचे दामों पर की जाती है और सरकार भी मूक दर्शक बनी रहती है । उदाहरण के रूप में सॉफ्ट ड्रिंक्स ही लें तो एक दुकानदार तो दस रूपये में बेच रहा है तो दूसरा उसी को पन्द्रह रूपये में बेच रहा है जबकि उत्पाद भी एक ही है एक ही कम्पनी द्वारा निर्मित है । लेकिन अन्तर बस इतना मात्र है कि एक तो सड़क किनारे खोखा पटरी पर बेच रहा है और दूसरा उसी को रेस्टोरेन्ट या होटल में बेच रहा है ।

एक ढाबे पर गेंहू की रोटी तीन रूपये की है तो दूसरे रेरटोरेन्ट में उसी गेंहू की वही रोटी पांच रूपये की है तो दूसरे होटल में वही दाल पचास रूपये प्लेट और उतनी ही मात्रा में वैसा ही स्वाद लेकिन दरों में अन्तर भारी है यही तो भारतीय खाद्य पदार्थ नीति है जिसमें किसी पर कोई नियंत्रण नहीं है । जबकि सम्पूर्ण भारतवर्ष में सम्पूर्ण खाद्य पदार्थों पर एक समान मूल्य प्रणाली लागू होनी चाहिए थी ।

माना कोई व्यक्ति मुम्बई में चाय पांच रूपये में पीता है तो दिल्ली में भी पांच रूपये और कोलकाता में भी पांच रूपये तथा चैन्नई में भी पांच रूपये ही होनी चाहिए । इसी प्रकार दाल की प्लेट की कीमत मुम्बई में ढाबे पर बीस रूपये है तो दिल्ली में अशोका होटल में भी दाल की प्लेट की कीमत बीस रूपये होनी चाहिए और गेंहू की रोटी यदि कोलकाता में तीन रूपये की मिलती है तो चैन्नई में भी तीन रूपये की ही मिलनी चाहिए ।

ताकि अन्तर्राज्यीय भ्रमण के दौरान भी किसी भारतीय को बजट संशोधन की आवश्यकता महसूस न हो और सम्पूर्ण भारतवर्ष में एक समान मूल्य खाद्य पदार्थ नीति बन सके । कम से कम खाद्य पदार्थों के सम्बन्ध में तो ऐसा ही होना चाहिए ताकि गरीब भारतीय भी दाल-रोटी तो कम से कम खा ही सके । उसे चिकन आदि बेशक ना मिले परन्तु भरपेट दाल रोटी तो मिलनी ही चाहिए ।

क्या किसी गरीब को मटर पनीर, चिकन आदि खाते देखा होगा तो उक्त प्रश्न का उत्तर आपको ना में ही मिलेगा क्योंकि कुछ गरीब तो आज भी या तो भूखे सोते हैं या फिर एक वक्त का ही भोजन कर अपनी जिन्दगी की गाड़ी को खींच रहे हैं । फल खाना, दूध पीना तो गरीब बच्चों को स्वप्न देखना जैसा है जिसका मूल कारण है भारतीय खाद्य पदार्थ नीति का उचित रूप में पालन न होना ।

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भारतीय व्यवस्था की महत्वपूर्ण कमियों में भारतीय खाद्य पदार्थ नीति का सम्मिलित किया जाना भारतीय जनमानुष के हित का प्रश्न हो सकता है । भारतीय खाद्य नीति की कमी का ही परिणाम है जो गरीब आदमी दो वक्त की रोटी को तरस रहा है या भूख से जान दे रहा है या भरपेट खाना नहीं खा रहा ।

इसका सम्पूर्ण उत्तरदायी भारतीय खाद्य पदार्थ नीति को ही कहा जा सका है जो आम आदमी भरपेट दो वक्त की रोटी नहीं पा रहा और भारतीय नीतिकार आराम से चैन की नींद ले रहे हैं । गरीब आदमी को यदि दो वक्त की भरपेट दाल-रोटी नसीब हो रही है तो वह दो वक्त का खाद्य ही उसके लिए फल, सब्जी खाने के सामान है । क्योंकि वर्तमान भारतीय खाद्य पदार्थ नीति गरीबों को केवल दाल-रोटी ही उपलब्ध कराना अपनी उपलब्धियों का हिस्सा है अन्यथा भारतीय खाद्य नीति पूर्णत: असफल और मृत प्राय है ।

भारतीय खाद्य नीति में कोई स्पष्ट भंडारण नीति व वितरण नीति नहीं है । जिसका परिणाम है कि आज एक ओर देश के गोदामों में अनाज सड़ रहा है और दूसरी ओर गरीब भूख से मौत को गले लगा रहा है । तो क्या हम कह सकते हैं कि देश में खाद्य पदार्थो के सम्बन्ध में हितकारी नीति है कदापि नहीं ।

जब बरसात के मौसम में अनाज गोदामों में खुले आसमान के नीचे रखा हो तो क्या वह अनाज सुरक्षित रहेगा । इससे तो बेहतर होता कि ऐसे अनाज को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से गरीबों को निःशुल्क बांट दिया जाता । कम से कम देश के गरीबों के तो काम आता ।

लेकिन धन्य है भारतीय खाद्य नीति जो अनाज को गरीबों मे बांटने के स्थान पर गोदामों में खुले आसमान के नीचे रखकर सड़ाना पसंद कर रहे हैं यह कोई एक गोदाम की हालत नहीं है बल्कि देश के अनेकों गोदामों में यही स्थिति है ।

जिसको नियंत्रण करना नीतिकारों के लिए शायद ही उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर का प्रकरण हो अन्यथा देश के किसानों की मेहनत से उगाये गये अनाज का हश्र यह नहीं होता कि वह खुले आसमान के नीचे बरसात के मौसम में सड़ रहा है तभी तो देश का गरीब भूख से मर रहा है और अनाज गोदामों में सड़ रहा है ।

जिसके लिए उत्तरदायी है देश के नीतिकार और उससे भी अधिक उत्तरदायी है देश की खाद्य नीति जो गरीब को दो वक्त की रोटी उपलब्ध कराने में अक्षम है जिसका परिणाम यह है कि गरीब रोटी पाने के लिए अपराध का रास्ता अपनाता है तो इसके लिए हम किसको उत्तरदायी ठहरायेंगे ।

भारतीय व्यवस्था का अंग भारतीय खाद्य पदार्थ नीति में भंडारण नीति का महत्वपूर्ण स्थान है यदि खाद्य नीति में भंडारण नीति का उचित रूप में पालन हो तो निश्चित ही इस देश का गरीब भूख से मौत को गले नहीं लगायेगा ।

क्योंकि भारतवर्ष में न तो अनाज की पैदावार ही कम हुई है और न ही देश की जमीन ने अनाज उत्पादन बंद किया है । अगर कुछ हुआ है तो वह है इस देश की खाद्य नीति में लचीलापन और जिसका लाभ लेने में पारंगत है देश के कुछ चंद लोग जो व्यवस्था की कमियों का फायदा उठाकर अपना हित सुरक्षित कर रहे हैं ।

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यही कारण है कि देश की खाद्य नीति कारगर साबित नहीं हो रही । जब देश के पास पर्याप्त अनाज भंडार मौजूद होने के बाद भी देश के गरीब भूख से मर रहे हैं और अनाज गोदामो में सड़ रहा है तो दोषी कौन है ? भारतीय खाद्य नीति या भारतीय व्यवस्था । बल्कि देश की खाद्य नीति को पलीता लगाने का कार्य कर रहे हैं ।

देश के खाद्य निरीक्षक जो ठोस खाद्य नीति होने के बाद भी उसका अनुपालन कराने में असमर्थ है या उसका अनुपालन कराना नहीं चाहते तभी तो देश का एक बहुत बड़ा वर्ग मिलावटी खाद्य पदार्थों का सेवन करने को मजबूर है आज देश की खाद्य नीति पूर्णत: विफल हो चुकी है ।

जिसके परिणाम स्वरूप देश का प्रत्येक नागरिक मिलावटी खाद्य पदार्थों से अपना स्वास्थ्य लाभ ले रहा है या यूँ कहिए कि आज शायद ही कोई ऐसी खाद्य वस्तु हो जो मिलावट से बची हो देशी घी हो या दूध, दाल हो या आटा सभी मिलावट खोरों के चगुल में फस चुके हैं जो इस देश के नागरिकों के स्वास्थ्य से तो खिलवाड कर ही रहे हैं साथ ही आने वाली पीढी को भी इतना कमजोर कर रहे है कि वे देश तो क्या स्वयं अपना बोझ उठाने के काबिल भी नहीं बन रहे जिसके लिए दोषी है भारतीय खाद्य नीति ।

एक खाद्य निरीक्षक का क्या कर्त्तव्य होता है ये तो खाद्य निरीक्षक को मालूम नहीं लेकिन अपनी सरपस्ती में सभी खाद्य सामग्री विक्रेताओं से चौथ वसूली करना अपना कर्त्तव्य समझता है तभी तो सरेआम नकली देशी घी, सिंथेटिक दूध, सिंथेटिक पनीर और न जाने कितने मिलावटी खाद्य पदार्थो की बिक्री खाद्य निरीक्षक की मिली भगत से की जाती है ।

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देश को नकली खाद्य सामग्री उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला व्यक्ति खाद्य निरीक्षक ही होता है जो प्रत्येक खाद्य वस्तु पर नियंत्रण करने के लिए स्वतंत्र है लेकिन वह अपना कर्त्तव्य निभाने में लापरवाही पूर्ण कार्य करता है जिसका परिणाम होता है देश के नागरिकों को मिलावटो खाद्य सामग्री का वितरण ।

आज शायद ही कोई ऐसी वस्तु है जिसमें मिलावट न हो लेकिन यह सब जानकर भी हम उसका सेवन कर रहे हैं । केला जैसा फल भी मिलावट से अछूता नहीं है जिसको जहरीले रसायनों के घोल में डुबोकर कुछ ही सेकण्डों में पकाया जाता है ।

यही स्थिति कुछ आम की भी है जिसे रसायन के घोल में डुबोकर पकाया जाता है । यहाँ तक कि छुआरे जैसे ट्राई फ्रूट को भी मिलावट खोरों ने नही बख्शा । छुआरे को बंद कमरे में गंधक जलाकर उसमें वजन बढ़ाया जाता है तो क्या हम अपेक्षा कर सकते हैं कि कोई वस्तु शुद्ध शेष बची है ।

देश में मिलावटी खाद्य पदार्थों की बिक्री धड़ल्ले से हो रही है जिसे रोक पाने में भारतीय व्यवस्था नीति पूर्णत: असफल सिद्ध हो रही है । विशेषत: दूध व दूध से बनी खाद्य सामग्री जैसे- घी, मावा, पनीर ऊँचे स्तर पर संगठित रूप में मिलावट खोरों द्वारा आपूर्ति किया जा रहा है । लेकिन भारतीय खाद्य पदार्थ नीति व पुलिस प्रशासन मिलावट खोरों पर शिकंजा कसने में विफल रहा है ।

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शायद ही कोई ऐसा शहर हो जहां मिलावटी खाद्य सामग्री तैयार न की जा रही हो और आपूर्ति न की जा रही हो । जहाँ तक अनुमान है और सूत्रों से प्राप्त सूचना के अनुसार दूध व दूध से निर्मित वस्तुओं का कारोबार करने वाले लोग व्यवस्था का हिस्सा होने के कारण कार्यवाही से बचे हुए हैं और ऊँचे स्तर पर संगठित रूप में व्यवसाय चला रहे हैं ।

कितनी ही नकली देशी घी, दूध बनाने की फैक्ट्री पकड़ी गई हैं लेकिन इसके बावजूद भी नकली खाद्य पदार्थों का व्यवसाय बदस्तूर जारी है और आम आदमी के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी बदस्तूर जारी है वह अपनी मेहनत की कमाई के बदले में नकली सिंथेटिक दूध, घी आदि के रूप में लाइलाज बीमारी खरीद रहा है जिसके लिए उतारदायी है भारतीय खाद्य पदार्थ नीति जो मिलावट खोरों को पकड़ने के बाद भी उनको उनके अंजाम तक पहुंचाने में विफल है ।

यह आवश्यक नहीं है कि इन मिलावटी खाद्य पदार्थों से देश का गरीब या आम आदमी ही प्रभावित है इन मिलावटी खाद्य पदार्थों विशेषकर दूध व दूध निर्मित वस्तुओं से प्रभावित होने वालों में उच्च अधिकारी, राजनीतिज्ञ, न्यायधीश, पुलिस अधिकारी सभी हैं जिनके पास भैंस या गाय पालने का समय तो है नहीं वे बाजार के ही दूध का सेवन करते हैं और यह भी कटु सत्य है कि बाजार में बिकने वाला दूध अधिकतर नकली है जिसको पकड़ पाने में भारतीय खाद्य नीति नाकाम है ।

सम्भव है देश में फैलने वाली अधिकतर लाइलाज बीमारियों का कारण नकली व मिलावटी खाद्य पदार्थ हैं जिन्हें किसी न किसी रूप में प्रत्येक आम व खास भारतीय नागरिक सेवन कर रहा है और जिसके लिए पूर्णत उत्तरदायी है भारतीय खाद्य पदार्थ नीति जो इस देश के नागरिकों को शुद्ध खाद्य पदार्थो से वंचित किये हुए है दोष व्यवस्था का है जो ऐसे अवैधानिक व्यवसायों पर नियंत्रण करना मुश्किल ही नहीं नामुंकिन सा प्रतीत हो रहा है ।

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सम्पूर्ण देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से राशन वितरित होता है जिसमें भी कुछ श्रेणी होती है गरीबी रेखा से नीचे और गरीबी रेखा से ऊपर जिन्हें बी॰पी॰एल॰ और ए॰पी॰एल॰ कहते हैं लेकिन सार्वजनिक वितरण प्रणाली की स्थिति कुछ अच्छी नहीं है जो गरीबों को मदद कर सके अगर कुछ अच्छा है तो वह है राशन डीलर जो सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अन्तर्गत आम जनता को मिलने वाली रियायतों का लाभ जनता तक नहीं पहुंचने देते हैं । सार्वजनिक वितरण प्रणाली ऐसी प्रणाली है ।

जिसके माध्यम से सरकार की नीति सीधे गरीब जनता तक पहुंचती है यदि सरकार कोई लोकलुभावन नीति लागू कर गरीब जनता को सीधे लाभ पहुंचाना चाहती है तो यह भी निश्चित है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली एक बेहतर विकल्प हो सकता है ।

जिसके माध्यम से गरीब जनता को कम समय में सरकार की नीति से जोड़ा जा सकता है चाहे वह नीति सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से सस्ते से सस्ती दर पर अनाज, दाल व साबुन उपलब्ध कराना या अन्य दैनिक उपयोग की वस्तुएं ।

जो गरीब आदमी के लिए वस्तु के वास्तविक मूल्य पर खरीद पाना असम्भव है । इसलिए सरकार ऐसे कदम उठा भी रही है लेकिन दुर्भाग्य इस देश की गरीब जनता का जो उस लाभ को उठा पाने में नाकाम  है । अपने भाग्य के भरोसे जीवन यापन कर रहे हैं ।

यहाँ हम भारतीय व्यवस्था की कमी नहीं कह सकते कि भारतीय व्यवस्था की कमियों के कारण देश का गरीब राशन से भी वंचित है क्योंकि भारतीय व्यवस्था का दायित्व तो तभी पूरा हो जाता है जब वह कोई नीति लागू करता है ।

लेकिन नीति को सही रूप में क्रियान्वित कराना भारतीय नागरिकों का भी कर्त्तव्य है जो लागू हुई किसी नीति को क्रियान्वित करा सके अन्यथा तो भारतीय व्यवस्था में दीमक की तरह घर कर चुके इस भ्रष्टाचार रूपी कीड़े की भेंट चढ़ना स्वाभाविक है ।

क्योंकि भारतवर्ष में शायद ही कोई ऐसी योजना होगी या ऐसी नीति होगी जो भ्रष्टाचार से ग्रसित न हो यहाँ प्रत्येक योजना और प्रत्येक नीति में हिस्सेदारी हो जाती है वह चाहे सार्वजनिक वितरण प्रणाली ही क्यों न हो ।

क्योंकि भारतीय व्यवस्था का ही अंग भारतीय खाद्य पदार्थ नीति जिसके बल पर देश के करोड़ों लोग अपनी भूख मिटा सकते हैं । लेकिन दुर्भाग्य इस देश की जनता का जो केवल नीतियों के बल पर ही अपना अधिकार पाने से वंचित है अन्यथा इस देश का कोई भी नागरिक बेशक वह अमीर हो या गरीब ।

दो वक्त का खाना खाने से वंचित नहीं रह पाता । चाहे सार्वजनिक वितरण प्रणाली कितनी ही भ्रष्ट क्यों न हो जाये यदि देश का आम आदमी ईमानदार हो जाये तो निश्चित ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली सफल प्रणाली होगी ।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली की असफल नीति के परिणाम स्वरूप जो कानून खाद्य पदार्थ नीति के द्वारा लागू है वे नाकाफी हैं देश के शहरों में कस्बों में कहीं पर भी खाद्य पदार्थ बेचते हुए मिल जायेंगे जिन पर देश का कोई कानून लागू नहीं होता, पीने के पानी की बिक्री हो या रेहड़ी पर गंदगी भरे स्थान पर खड़े होकर पराठें व छोले भटूरे बेचते हुए लोग व खाते हुए लोग मिल ही जायेंगे जो गंदगी भरे स्थान पर खड़े होकर दोपहर में खाना खाते नजर आ ही जायेंगे जो स्वयं बिमारियों की खरीददारी करते हैं ।

जिनके लिए देश की खाद्य पदार्थ नीति में कोई कानून नहीं है । ऐसे खोमचे वाले किसी भी शहर में चौराहों पर, बस अड्‌डों पर, सड़क किनारे एक रिक्शा व दो बेंच लिए हुए लोगों को खाना खिलाते रहते है और लोगों की मजबूरी भी देखिये वे ऐसे गंदे स्थानों पर खाना खाते रहते हैं ।

इनके अलावा मौसमी का जूस बेचने वाला, आम का जूस बेचने वाला, गन्ने का जूस बेचने वाला आपको शहरों, कस्बों में मिल ही जायेंगे जो खुले आम बिना किसी की अनुमति के, बिना किसी स्वास्थ्य विभाग लाईसेंस के धड़ल्ले से जूस में बर्फ, सैक्रीन आदि मिलाकर लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करते हैं ।

देश-प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी व कर्मचारी ऐसा होता देखते रहते हैं । बल्कि ऐसा होने में सहयोग भी करते हैं । तभी तो आम भारतीय नागरिको को स्वास्थ्य के तथ खेलने की आदत सी हो गई है । जब प्रत्येक कार्य के लिए सम्बन्धित विभाग से अनुमति आवश्यक होती है तो स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील विभाग में स्वास्थ्य सम्बन्धी सेवा करने के लिए या यूँ कहिए कि लोगों को कुछ भी खाद्य पदार्थ बेचने हेतू जैसे- खाना, पानी, जूस आदि के लिए स्वास्थ्य विभाग से कोई लाइसेंस की आवश्यकता नहीं होती बल्कि आप बिना किसी लाइसेंस के ये सब कार्य कर सकते हैं ।

लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर अच्छा खासा मुनाफा कमा सकते हैं । बल्कि कमा रहे हैं और भारतीय जनता ऐसे मुनाफाखोरों के बल पर अपने स्वास्थ्य के साथ समझौता भी कर रही है । तभी तो खुले में बिकने वाला जूस जो धूल मक्खी आदि से नहीं बच पाता और न ही धूल मक्खी से बचाने हेतू भारतीय खाद्य नीति में कोई विशेष प्रावधान मौजूद है । प्रावधान हो भी तो इससे कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन की आशा करना बेइमानी होगा । क्योंकि सवा सौ करोड़ की आबादी के इस देश में गुणवत्तापरक और संतुलित भोजन की आशा नहीं की जा सकती ।

आशा की जा सकती तो केवल एक वर्ग विशेष के लिए जहाँ जनता से अधिक संतुलित खाना उनके पालतू कुत्ते तक खा जाते हैं । भारतीय खाद्य नीति की कमियों का लाभ उठाने के लिए ऐसे लोग मौजूद हैं जो देश की आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर अपना रोजगार चला रहे हैं । देश की खाद्य नीति उन्हें रोक पाने में असफल है ।

भारतीय व्यवस्था का दोष कहा जाये या भारतीय जनता का या फिर भारतीय खाद्य नीति के नीति निर्धारकों का जो देश का आम नागरिक इस प्रकार सड़क किनारे, चौराहों, बस स्टैंडों पर गुणवत्ता विहीन भोजन करने को मजबूर हैं ।

यहाँ तक कि जब हम रेलगाड़ी आदि से यात्रा कर रहे होते हैं तब जो खाना हम खाते हैं उसकी गुणवत्ता का पता तो केवल खाने वाले को ही होता है और वह भी अधिक विस्तार से उक्त खाने के विषय में अनुभव करता है । जिसे खाकर ऐसे लगता है कि भारतवर्ष में अनाज ओर दालें पैदा होनी बंद हो गई हैं और भारतीय नागरिकों की खाना खाने की क्षमता भी कम हो गई है ।

बामुश्किल एक रोटी का आकार दो टुकड़ों के बराबर होता है और दाल में दाल कम पानी अधिक दिखायी पड़ता है । ऐसी व्यवस्था तो भारतीय रेलगाड़ियों के खाने की है और यदि रेलवे रटेशन पर मिलने वाले खाने की बात करें तो वह भी कुछ अलग नहीं होता है ।

उसकी स्थिति तो रेलगाड़ियों में मिलने वाले खाने से भी बदतर होती है न कोई साफ-सफाई न कोई गुणवत्ता लेकिन फिर भी देश की जनता ऐसा खाना खाने को मजबूर है । देश की खाद्य नीति का ऐसे खाद्य निर्माता और वितरकों पर कोई नियंत्रण नहीं है तभी तो देश की आम जनता गुणवत्ता विहीन खाना खाने को मजबूर है ।

भारतीय खाद्य नीति में ऐसा कहीं कोई नियंत्रण का प्रावधान नहीं किया गया जो यह उदघोषित कर सके कि देश की खाद्य नीति जो यात्रा के समय देश के नागरिकों को लागू होगी और उनको अच्छी गुणवत्ता का खाना उपलब्ध कराया जायेगा बल्कि आमतौर पर देखा गया है कि जब हम यात्रा करते हैं तो हमें कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है । जैसे-रास्ते में शुद्ध पीने के पानी की समस्या और शुद्ध खाने की समस्या मुख्यतया दो ही समस्या होती हैं । इनके अलावा सोने और फ्रेश होने की समस्या ।

लेकिन यदि स्थिति का आंकलन किया जाये तो खाना और पानी पीना मुख्यतया होती है यदि हमारी थोड़ी सी भी लापरवाही होती है तो हम अपनी यात्रा के बीच में ही बीमारियों की गिरफ्त में आ जाते हैं । रेलगाड़ियों में यात्रा करने वाले लोगों में अधिकतर बीमारियाँ यात्रा करने से समय ही प्राप्त होती हैं ।

यदि सामान्य डिब्बे की बात करें तो उसकी स्थिति तो किसी पशुओं से भरे ट्रक जैसी होती है । जिसमें लोग एक दूसरे के अत्यधिक नजदीक होते हैं और किसी की बीमारी से उस डिबे में उपस्थित अधिकतर यात्री गिरफ्त में आ जाते हैं ।

लेकिन न तो ऐसे बीमार यात्रियों की यात्रा पर प्रतिबन्ध है और न ही कोई ऐसा कानून है जो इस प्रकार फैलने वाली बीमारियों पर प्रतिबन्ध लगा सके और आम जनता को गुणवत्ता परक भोजन उपलब्ध करा सके ।

आमतौर पर देखा गया है कि देश की खाद्य नीति के लचीला होने के कारण ही देश का आम नागरिक बीमारियों की चपेट में है अन्यथा जो पैसा नागरिकों की बीमारियों का इलाज कराने में खर्च हो रहा है उसका उपयोग शिक्षा आदि पर किया जा सकता है ।

इसलिए किसी भी देश की उन्नति के लिए महत्वपूर्ण है उस देश के नागरिकों का स्वास्थ्य अच्छा हो तभी तो वह देश उन्नति कर सकेगा अन्यथा वह देश अपने नागरिकों की बीमारियों का इलाज ही कराता      रहेगा । किसी भी देश की जनता का यदि स्वस्थ्य अच्छा है तो वह देश अधिक तेजी से उन्नति कर सकेगा और यदि देश की जनता बीमार है तो वह देश पिछड़ता ही रहेगा । स्वास्थ्य का सम्बन्ध बीमार रहना और स्वच्छता से विशेषकर है जो किसी न किसी रूप में उस देश के नागरिकों को प्रभावित करती है ।

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वह प्रभावित करती है कि उस देश की अर्थव्यवस्था को भी । खाने की शुद्धता का सम्बन्ध भी विशेष महत्व रखता है यदि खाना अशुद्ध है तो बीमारी का आना निश्चित है साथ ही एक कहावत है कि – ”जैसा खाये अन्न, वैसा होवे मन” अर्थात व्यक्ति जैसा अन्न का सेवन करता है वैसा ही उसका मन होता है ।

मन का सम्बन्ध भी स्वस्थ्य से है अर्थात अशुद्ध भोजन व्यक्ति को अशुद्ध अर्थात बीमार करता है । बीमारियों का जन्मदाता अशुद्ध वातावरण अशुद्ध जल और अशुद्ध खाना ही कहा जाता है जैसे-जैसे शुद्धता बढ़ती है वैसे-वैसे ही बीमारियाँ कम होती जाती हैं ।

लेकिन भारतीय खाद्य नीति कहीं ऐसा प्रावधान नहीं करती कि स्वच्छता इतना अत्यधिक महत्वपूर्ण विषय है जिस पर अमल किया जाना भी अत्यन्त आवश्यक है क्योंकि ”स्वच्छता हमारे स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त आवश्यक है” । यदि हम स्वस्थ रहना चाहते हैं तो स्वच्छता को अपना मिशन बनाना होगा अन्यथा अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा चिकित्सा लाभ के लिए खर्च करना होगा और इसके लिए उत्तरदायी होंगे हम और आप ।

जो स्वच्छता जैसे संवेदनशील विषय को नजर अंदाज कर रहें है और अपनी जान जोखिम में डाल रहे हैं । जबकि उक्त कार्यों को करने के लिए उन पर नियंत्रण के लिए देश की खाद्य नीति में संशोधन कर उसको सशक्त करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है । ताकि देश के नागरिकों का उनके स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न हो सके ।

भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां सबकुछ जनता पर निर्भर है यहां तक कि संवैधानिक शक्ति का आधार ही जनता है और अगर जनता ही त्राहि-त्राहि करने लगे तो क्या हम कह सकते हैं कि लोकतंत्र सुरक्षित है चाहे वह त्राहि-त्राहि न्याय के लिए हो या सुरक्षा के लिए और या हो दाल-रोटी के लिए ।

पहले एक कहावत प्रचलित थी कि ”दाल-रोटी खाओ और प्रभु के गुन गाओ” लेकिन आज आम आदमी की थाली से दाल-रोटी ही गायब हो गयी है जिसका कारण है मंहगाई वो भी बेइंताह, असहनीय । एक गरीब मजदूर जो 100 रूपये मजदूरी पाता है जिसके परिवार दें पति-पत्नी और 4 बच्चे हैं जिनके लिए औसतन रोजाना 3 किलो आटा और आधा किलो दाल दो वक्त में चाहिए ।

जिनकी कीमत दाल जो आज 70 रूपये प्रति किलो व आटा 20 रूपये प्रति किलो बाजार में बिक रहा है तो कीमत 35 रूपये की दाल व 60 रूपये का आटा । कुल मिलाकर 95 रूपये अब ईंधन व मसाले आदि का खर्च अलग से तो क्या वह मजदूर पेट भर दाल-रोटी का भोजन कर पायेगा अर्थात कदापि नहीं । इस स्थिति के लिए कौन उत्तरदायी है ? भारतीय नीतिकार जो बाज़ार की क्रत्रिम मंहगाई को रोक पाने में नाकाम हैं ।

देश में दलहन व अनाज की पैदावार कम नहीं हुई । जो खाद्य पदार्थ इतने मंहगे हो गये कि आम आदमी दाल-रोटी को मोहताज हो रहा है । गरीब मजदूरों के नवजात बच्चे दूध के लिए तड़प रहे हैं, बिना ईलाज के मर रहे हैं, जब जच्चा को ही दूध पीने को नहीं है तो बच्चा कहा से दूध पियेगा ।

नवजात बच्चों को माँ का दूध भी नसीब नही हो रहा है । ऐसा नहीं है कि इस देश में गाय-भैसों ने दूध देना बन्द कर दिया है लेकिन ऐसा है कि सरकार का नियंत्रण नहीं है, ठोस रणनीति नहीं है, ठोस बाजार नीति नहीं है ।

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देश के खाद्य पदार्थों के वितरण व मूल निर्धारण पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं हैं । देश के उन जमा खोरों पर जो अपनी तिजोरियाँ भरने का कार्य कर रहे हैं । जो सब कुछ असामान्य रूप से क्रत्रिम मंहगाई को आसमान पर पहुंचा चुके हैं लेकिन सरकार असहाय नजर आ रही है । जो कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं है ।

भारत में चीनी 45 रूपये प्रति किलो तक बिक गई । जबकि देश के कृषि मंत्री स्वयं चीनी मिलों के मालिक बताये जाते हैं । वे तो स्वयं कीमत कम करने का रास्ता खोज सकते थे लेकिन ऐसा नहीं किया गया । जनता ने चीनी कम चाय पीनी शुरू कर दी लेकिन कीमत फिर भी कम नहीं हुई । आखिर क्या कारण हुआ जो भारतीय बाजार में खाद्य पदार्थों की कीमत यकायक आसमान छू गई ।

ये कोई एक दिन की रणनीति का परिणाम तो हो ही नहीं सकता बल्कि एक लम्बे होमवर्क का ही परिणाम था जो भारतीय बाजार में खाद्य पदार्थों की कीमत रातों-रात आसमान तक पहुंच गई और सरकार जिसको नियंत्रण करने में विफल रही ।

आम जनता मंहगे दामों पर खाद्य पदार्थ खरीदने पर मजबूर हैं जबकि कुछ ऐसा कदम उठाया जाना चाहिए था जिसके अन्तर्गत राष्ट्रीय मूल्य निर्धारण आयोग का गठन कर शख्त से शख्त कदम उठाना चाहिए था जिससे जमा खोरों व क्रत्रिम मंहगाई करने वाले व्यापारियों पर शिकंजा कसा जा सकता था ।

भविष्य में गरीबों को कम से कम दाल-रोटी तो नसीब हो सकती थी । लेकिन ऐसा कदम उठाया जाना या तो सरकार के नियंत्रण की बात नहीं है या उसके क्षेत्राधिकार से बाहर का मामला बनता है । या फिर सरकार ऐसा करने की इच्छा शक्ति नहीं जुटा पाई । तभी तो देश की जनता को दाल-रोटी के लिए तड़पने को छोड़ दिया ।

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