List of popular Hindi Stories (Jatak Kathayen) with Images!
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 1
परीक्षा |
चरक आयुर्वेद के महान ज्ञाता थे । घने जंगल में उनका आश्रम था । हर वष सैकड़ों विद्यार्थी उनका आश्रम था । हर वर्ष सैकड़ों विद्यार्थी उनके आश्रम में आयुर्वेद व जड़ी-बूटियों का ज्ञान प्राप्त करने आते थे ।
हर पूनम को वह अपनी शिष्यों को लेकर जगल में निकल पड़ते । वहां उन बूटियों को दिखाते ने वें ले पहचानी जा सकती थी । ऐसे में चारों ओर जंगली जानवरों का भी भय होता । बड़ी अजीब-अजीब डरावनी आवाजें जंगल में गूंजा करती । कुछ विद्यार्थी डर के मारे ही शिक्षा छोड़कर भाग जाते ।
चरक कहते : “अच्छा हुआ कि कायरों ने मेरा समय नष्ट नहीं किया से डर गए, वे क्या वैद्य बनेंगे ? वैद्य का तो काम ही मौत से लड़ना है । मृत्यु पर विजय पाना है । वे परीक्षा भी इतनी कड़ी लेते कि सैकड़ों में से कुछ ही विद्यार्थी उत्तीर्ण होते । जो उत्तीर्ण होते वह चारों ओर उनका यश फैलाते । लोगों को व्याधियों से मुक्ति दिलाते ।
आचार्य चरक ने एक बार की परीक्षा में अपने विद्यार्थियों से कहा : ”मैं तुम्हें 30 दिन का समय देता हूं । इस अवधि में तुम्हें सारे जंगल छान मारने होंगे और उन वनस्पतियों या जड़ी-बूटियों को लाना होगा जिनका आयुर्वेद में उपयोग नहीं होता अथवा व्यर्थ हैं ।”
ADVERTISEMENTS:
सभी शिष्य चारों दिशाओं की ओर दौड़ पड़े । कुछ विद्यार्थियों को घास-फूस और कंटीली झाड़ियां व्यर्थ लगीं, वे उन्हें झोली में भरकर ले आए । कुछ ने वृक्षों की छालें व पत्तियां आदि इकट्ठी कीं, जिनकी कोई दवाई नहीं बनती थी ।
कुछ विद्यार्थियों ने अधिक छानबीन की और जहरीली फलियां या तने लाए, जिनको खाने से जीवों की मृत्यु होती थी । कुछ अधिक परिश्रमी शिष्यों ने जड़ें भी खोदकर एकत्र की । बीस दिन के बाद विद्यार्थियों ने अपनी-अपनी जमा की गई वनस्पतियां दिखाईं ।
चरक ने सभी की लाई चीजें देखी । पर उनके चेहरे के हावभाव से कुछ प्रकट नहीं हुआ । कुछ शिष्यों की गलतियों को उन्होंने बताया कि अमुक चीज से अमुक दवा बनती है । उनतीसवें दिन तक केवल एक को छोड्कर सभी शिष्य लौट आए । सभी कुछ न कुछ बीनकर लाए थे ।
अन्तिम शिष्य तीसवें दिन लौटा वह भी खाली हाथ । वह एक भी वनस्पति न ला पाया था । उसे देख सारे शिष्य हंस पड़े । चरक ने प्रश्नसूचक दृष्टि से उस शिष्य को देखा । वह बोला : ”गुरुदेव, मुझे सारे जगल में एक भी ऐसी वनस्पति नहीं मिली जो आयुर्वेद के काम न आती हो या बेकार हो ।”
चरक ने घोषणा की : ”इस वर्ष यही छात्र उत्तीर्ण हुआ । सचमुच जंगल में ऐसी कोई वनस्पति नहीं है, जो बेकार हो । किसी का हम उपयोग नहीं कर पा रहे हैं, तो उसका अर्थ यही है कि हम उसके गुणों को अभी पहचान नहीं पाए हैं । हमारा ज्ञान उसके बारे में अधूरा है ।”
सीख: 1. जंगल हमारा अनमोल खजाना है । इसे नष्ट नहीं होने देना है ।
ADVERTISEMENTS:
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 2
मूर्ख पंडित |
एक पंडित जरा अक्त कामोटा था । कुछ रटे-रटाए श्राद्धों के मंत्रों के अलावा उसे कुछ नहीं आता था । एक बार वह अपने किसान यजमान के पास पहुचा । यजमान के पिता का श्राद्ध होना था ।
ADVERTISEMENTS:
अपने पुरोहित को देख किसान ने नमस्कार किया व हाल पूछा : “कहो पंडितजी, क्या हाल है ? दुबले हो गए हो ।” पंडित ठंडी आह भरकर बोला : “क्या बताऊं यजमान ! पेट में बीमारी हो गई है । वैद्य ने दवाई दी है और कहा है कि दवा के साथ बकरी का दूध पीना । आब मुझे बकरी का दूध कहां मिलेगा ?”
किसान ने सुझाव दिया : “पंडितजी मैं श्राद्ध में आपको गाय की जगह, दूध देने वाली बकरी दूंगा । मेमना तो मर गया । पर बकरी के दूध आता ही है ।” किसान अपने फायदे की सोच रहा था । बीस रुपए की बकरी देकर सौ रुपए की गाए बच जाएगी ।
पंडित भी खुश । एक तो बकरी मिली । गाय की देखभाल के झझट से बचे सो अलग । श्राद्ध करके पंडित बकरी को लेकर चला । बकरी के चलते समय थन से दूध गिरता था इसलिए पंडित ने उसे उठाकर अपने कंधे पर लादा ।
उसी समय झाड़ियों में छिपे तीन ठग पंडित को देख रहे थे । उसे देखते ही वे ताड़ गए कि पंडित मोटी अक्त का है । बकरी को कंधे पर लादने पर तो वह बिल्कुल मूर्ख नजर आ रहा था । तीनों पंडित से बकरी ठगने की योजना बनाने लगे । योजना बनाकर वे अलग हुए ।
ADVERTISEMENTS:
दौड़कर सड़क पर आगे जाकर कुछ-कुछ दूरी पर अलग-अलग खड़े हो गए । पहले ठग ने पंडित को नमस्कार किया और बोला : ”पंडितजी, आप यह क्या अनर्थ कर श्तेए हैं एक पंडित होकर अपने कंधे पर सूअर के बच्चे को लादे हो । छी: छी: छी: ।”
पंडित ने क्रोध से कहा : ”क्या बक रहा है ? मेरे कंधे पर बकरी है । तुझे नजर कम आता है क्या ?” ठग ने सिर झटका : “एक पंडित सूअर को बकरी बता रहा है । घोर कलियुग ।” पंडित क्रोध से बड़ बड़ाता हुआ आगे चला । आगे दूसरा ठग पंडित का इंतजार कर रहा था । वह बोला : “राम, राम, मैं यह क्या देख रहा हूं ।”
पंडित चौंका और बोला : ‘तुम्हारा मतलब क्या है ?’ ”तुम एक पंडित होकर अपने कंधे पर मरा हुआ बछड़ा लादे जा रहे हो । यह तो शूद्रों का काम है । धर्म रहा ही नहीं ।” ठग ने कहा । पंडित झल्लाया : “एक पीछे अधा मिला था । अब यह एक और मिला ।
बकरी को मरा हुआ बछड़ा कह रहा है । आज पता नहीं कैमा दिन है ।” ठग ने थूकते हुए कहा : “पंडित, तू कितने लोगों को बछड़े को बकरी कहकर बेवकूफ बनाएगा ? मैंने जो देखा वह कह दिया । मुझे तो तुम्हें यह नीच काम करते देखकर दुख हुआ था, इसलिए कह दिया । वर्ना मुझे क्या लेना ? जा मरे हुए बछड़े को लादे ।”
ADVERTISEMENTS:
पंडित कुढ़ता और भुनभुनाता हुआ आगे चल दिया । पर उसके जाते ही ठग मुस्कराकर झड़ियों में ओझल हो गया । कुछ दूर आगे जाने पर तीसरा ठग मिला । उसने पंडित को नमस्कार करने के बाद कहा : ”अरे पंडितजी, मैं तो आपका बहुत आदर करता था । मुझे पता नहीं था कि आप ऐसे काम भी करते हो ।”
पंडित ने घबराकर पूछा : ”कैसा काम ?” ठग ने तीर मारा : ”इतना बड़ा अनर्थ कर रहे हो और फिर भी भोले बनने का नाटक कर रहे हो, पंडित ? तुम जो यह गधे को कंधे पर लादे हो, यह तुम्हें शोभा देता है ?” पंडित चीखा : “यह गधा नहीं है । यह बकरी है ।
तुम्हें ठीक से नजर नहीं आता क्या ?” ठग बोला : ”पंडित, मुझे तो ठीक से नजर आता है । पर लगता है, तुम्हारी आखों और अक्ल दोनों पर पर्दा पड़ गया है । तुम्हें एक गधा बकरी नजर आ रहा है ? मेरे पास सिर फोड़ने का समय नहीं है । तुम जो मर्जी आए करो ।”
यह कहकर वह तीसरा ठग भी एक ओर हो लिया । अब पंडित सोच में पड़ गया । वह बोला कि तीन आदमी झूठ कैसे कह सकते हैं ? क्या बात है कि यह बकरी किसी को बछड़ा नजर आती है, किसी को गधा और किसी को सूअर का बच्चा और मुझे बकरी नजर आ रही है ।
उसने बकरी को कंधे पर से उतारकर नीचे रखा । उसे शक हुआ कि बकरी जरूर राक्षस है । राक्षस भी ऐसे मायावी होते हैं जो कई रूप बदलते हैं । अच्छा हुआ कि ठीक समय पर इसकी असलियत का पता लग गया ।
वर्ना शायद यह अजगर का रूप धारण कर मुझे खा जाता । ऐसा कहते हुए वह बकरी को छोड्कर वहा से तेज कदमों से भागा । तीनों ठग आदमी पीछे से यह सब देख रहे थे । वे पंडित की मूर्खता पर खूब हंसे । उन्होंने बकरी पकडू ली और खूब दावत उड़ाई ।
सीख: दूसरों की बातों पर आखें मूदकर विश्वास नहीं करना चाहिए । अपनी अक्ल पर भरोसा रखें ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 3
बुद्धिमान सियार |
एक समय की बात है कि जंगल में एक शेर के पैर में काटा चुभ गया । पंजे में जख्म हो गया और शेर के लिए दौड़ना असभव हो गया । वह लगड़ाकर मुश्किल से चलता । शेर के लिए तो शिकार करने के लिए दौड़ना जरूरी होता है ।
इसलिए वह कई दिन कोई शिकार न कर पाया और भूखों मरने लगा । कहते हैं कि शेर मरा हुआ जानवर नहीं खाता, परन्तु मजबूरी में सब कुछ करना पड़ता है । तगड़ा शेर किसी घायल अथवा मरे हुए जानवर की तलाश में जंगल में भटकने लगा ।
यहां भी किस्मत ने उसका साथ नहीं दिया । कहीं कुछ हाथ नहीं लगा । धीरे-धीरे पैर घसीटता हुआ वह एक गुफा के पास आ पहुंचा । गुफा गहरी और संकरी थी, ठीक वैसी जैसे जंगली जानवरों के माद के रूप में काम आती हैं । उसने उसके अंदर झांका ।
मांद खाली थी । पर चारों ओर उसे इस बात के प्रमाण नजर आए कि उसमें किसी जानवर का बसेरा है । उस समय वह जानवर शायद भोजन की तलाश में बाहर गया हुआ था । शेर गुफा में चुपचाप दुबककर बैठ गया ताकि उसमें रहने वाला जानवर लौट आए तो वह दबोच ले ।
सचमुच उस गुफा में एक सियार रहता था, जो दिन को बाहर घूमता रहता और रात को लौट आता था । उस दिन भी सूरज डूबने के बाद वह लौट आया । सियार काफी चालाक था । हर समय चौकन्ना रहता था । उसने अपनी गुफा के बाहर किसी बडे जानवर के पैरों के निशान देखे तो चौंका ।
उसे शक हुआ कि कोई शिकारी जीव मांद में उसके शिकार की आस में घात लगाए न बैठा हो । उसने अपने शक की पुष्टि के लिए सोच विचार कर एक चाल चली । गुफा के मुहाने से कुछ दूर जाकर उसने आवाज दी : “गुफा ! ओ गुफा ।”
गुफा में चुभी छायी रही । उसने फिर पुकारा : “अरी ओ गुफा, तू बोलती क्यों नहीं ? ”भीतर शेर दम साधे बैठा था । भूख के मारे पेट कुलन्त्रा रहा था उसे यही इतजार था कि कब सियार अँदर आए और वह उसे पेट में फुलाए इसलिए उतावला भी हो रहा था ।
सियार एक बार फिर जोर से बोला : “ओ गुफा । रोज तू मेरी पुकार के जवाब में मुझे अंदर बुलाती है । आज चुप क्यों है ? मैंने पहले ही कह रखा है दिन न मुझे नहीं बुलाएगी, उस दिन मैं किसी दूसरी गुफा में जाऊंगा । अच्छा तो मैं चला ।”
यह सुनकर शेर हड़बड़ा गया । उसने सोचा शायद गुफा सचमुच सियार को अंदर बुलाती होगी । यह सोचकर की कहीं सियार सचमुच न चला जाए, उसने अपनी आवाज बदलकर कहा : ”सियार राजा, मत जाओ । अंदर आओ न । मैं कब से तुम्हारी राह देख रही थी ।”
सियार शेर की आवाज पहचान गया और उसकी मूर्खता पर हंसता हुआ वहाँ से चला गया और फिर लौटकर नहीं आया । मूर्ख शेर उसी गुफा में भूखा-प्यासा मर गया ।
सीख: सतर्क व्यक्ति जीवन में कभी मार नहीं खाता ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 4
भोला ऊंट |
एक भोलाभाला ऊंट था । वह रोज जंगल में घास चरने के लिए जाया करता था । उसी जंगल में एक सियार रहता था । वह बहुत चालाक और स्वभाव से दुष्ट था । दूसरों को मुसीबत में डालना तथा औरों के काम विगाड़ना उसकी आदत थी ।
वह सियार ऊँट को देखा करता था और यही सोचता रहता था कि कैसे इसे मुसीबत में फंसाया जाए । एक दिन वह ऊट के पास जाकर बोला : “ऊंट चाचा, तुमको रोज मैं घास खाते देखता रहता हूं । घास खाते-खाते मन नहीं ऊब जाता, तुम्हारा ?”
ऊंट ने उत्तर दिया : “भतीजे, मेरी किस्मत में घास ही लिखी है । और क्या खाऊं ? इस जंगल में तो खुम्भियां भी नहीं उगतीं । झाड़ियां कंटीली हैं, मुंह में चुभ जाती हैं ।” ”जतन करने से सब मिलता है, चाचा! देखो, मैं मास खाता हूं । साथ ही पास के खेतों में जाकर टमाटर, मूली और गाजर भी खाता हूं ।
इसीलिए तो मेरे गाल और बाल लाल हैं । सियार ने कहा । सियार ने अपने गालों पर पंजा फेरा और अपनी दुम हिलाकर ऊंट को दिखाई फिर वह ऊट के कान के पास मुंह ले जाकर बोला : ”उस खेत में खीरे, ककड़ियां, लौकी और तोरइयां भी खूब आई रहती हैं । रसेदार चीजें जो ऊंटों को खानी चाहिए । आओ, मैं तुम्हें दावत देता हूं ।”
भोलाभाला ऊंट उसकी बातों में आकर उसके साथ खेत में चला गया । सियार ने फटाफट टमाटर, गाजर खाए । ऊट खीरे खा ही रहा था कि सियार ने ‘हू-हू’ की आवाज निकाली और फसलों के बीच से होकर रफूचक्कर हो गया । ‘हू-हू’ की आवाज सुनकर किसान दौड़े आए ।
ऊंचे कद का ऊंट दूर से ही उन्हें दिखाई दिया । ऊंट पर खूब डंडे बरसे । सियार दूर से ऊट को पिटते देखकर खूब हंसा । दूसरे दिन ऊंट घास चरने घिसटता हुआ जंगल गया तो सियार ने नाटक किया : ”चाचा, कल जो हुआ उसके लिए मुझे अफसोस है ।
मुझे याद ही नहीं रहा कि तुम भी मेरे साथ हो । ‘हू-हू’ करना तो मेरी आदत है न । आगे से ऐसी गलती नहीं होगी ।” भोलेभाले ऊंट ने उसकी बात का विश्वास कर लिया । इसी प्रकार बातें बनाकर सियार फिर ऊट को दावत देकर खेतों में ले गया ।
सियार ने जल्दी-जल्दी अपना पेट भरा और लगा फिर हू-हू करने । किसान फिर डंडे लेकर दौड़े और ऊंट की खूब पिटाई हुई । सियार जी भरकर हंसा । दूसरे दिन ऊंट जंगल में गया तो सियार नाटक करने लगा : ”चाचा, कल तो बड़ा हादसा हुआ ।
अचानक एक सांप ने मुझे डस लिया । इसलिए तो मैं ‘हू-हू’ करके चिल्ला उठा । तुम खुद ही देख लो ।” सियार ने पंजा दिखाया । पंजे में कुछ चुभने का निशान था । शायद कोई कांटा चुभा होगा । फिर सियार ने अपनी एक्टिंग का कमाल दिखाया । भर्राए गले से बोला : ”चाचा, फिर तुम पिटे ।
जो डंडे तुम पर पड़े उनकी असली चोट तो मेरे दिल पर लग रही थी । दुख के मारे मुझे रात भर नींद नहीं आई । देखो मेरी लाल आखें ।” उसकी लाल औखें देख भोला ऊट फिर उसकी बातों में आ गया । सियार ने चक्कर चलाया : “देखो चाचा, तुम्हें मेरे साथ फिर खेतों में चलकर खीरे खाने पड़ेंगे ।
मैं अपने आप पर बहुत शर्मिंदा हू । अगर तुम न चले तो मैं समझ लूँगा कि तुमने अपने भतीजे को माफ नहीं किया ।” भोला ऊंट फिर उसके साथ चल दिया । सियार मन ही मन ऊंट के सीधेपन पर हंस रहा था । वे खेतों में पहुंचे । फिर वही नाटक दोहराया गया ।
सियार ने अपना पेट भरकर ‘हू-हू’ का शोर मचाया और किसानों ने आकर ऊंट जमकर धुनाई की । इस बार तो पिटाई ने ऊँट के अजर-पजर ढीले कर डाले । सियार दूर से ऊंट की पिटाई देखकर हंसते-हंसते लोट-पोट हो रहा था ।
बेचारा ऊंट दो दिन घास चरने जंगल भी न जा सका । उसके लिए हिलना-ढुलना भी बड़ा कष्टदायक हो गया था । तीसरे दिन वह पेट भरने के लिए घिसटता-पिसटता जंगल जा पहुंचा । सियार ने उसे देख लिया । कुछ देर तो वह ऊंट की नजरों से बचता रहा । पर फिर ऊंट ने उसे देख ही लिया ।
ऊंट ने दुखी स्वर में कहा : “सियार, तूने मुझे खूब धोका दिया।” सियार बोला : ”चाचा, मैंने क्या धोखा दिया ? धोखा तो खुद तुम्हें तुम्हारी अक्ल ने दिया । तुम्हें यह तो सोचना चाहिए था कि खाने के बाद हम सियारों को ‘हू-हू’ करने की जन्मजात आदत होती है । वह क्यों छूटेगी ? खाने के बाद अपने आप हमारे मुंह से ‘हू-हू’ की आवाज निकलती है ।”
उसके बाद उन दोनों में कोई बात नहीं हुई । सियार भी समझ गया कि अब ऊंट उसकी बातों में नहीं आने वाला । ऊंट ने भी सियार से बदला लेने की दिल ही दिल में ठान ली । कुछ ही समय बाद उस क्षेत्र में घोर वर्षा हुई । कई दिन पानी बरसता रहा ।
नदी-नालों में बाढ़ आ गई । आसपास के इलाके पानी में डूबने लगे । काल के जानवरों के समुख भी जीवनमरण का प्रश्न खड़ा हो गया । उस इलाके को न छोड़ने पर मौत निश्चित थी । सियार भी विपत्ति में पड़ गया । तभी उसे वह ऊंट नजर आया । वही उसके बचाव का एकमात्र रास्ता था ।
सियार ने आवाज दी : ”मित्र, मैं मर जाऊगा । मुझे बचा लो । यहा से कही और जाने में मेरी मदद करो ।” ऊंट बोला : ”अवश्य, विपत्ति में ही तो मित्र मित्रों के काम आते हैं । आओ मेरी पीठ पर बैठो । मैं तुम्हें पास के दूसरे जंगल में छोड़ आऊं । जहां बाढ़ नहीं आई है ।” सियार ऊंट की पीठ पर बैठ गया । ऊंट आगे गहरे पानी में पहुंचा तो टेढ़ा होने लगा ।
सियार चिल्लाया : ”मित्र, यह क्या कर रहे हो ? सीधे चलो । मैं गिर जाऊंगा ।” ऊट ने हंसकर कहा : “ओ सियार, तुझे यह तो सोचना चाहिए था कि पानी में जाने पर लोटने की हम ऊंटों में जन्मजात आदत होती है । वह क्यों छूटेगी ? हमारा शरीर अपने आप लोटने लगता है ।” ऐसा कहकर ऊंट ने पानी में गोता लगाया । सियार गिर पड़ा व पानी में डूब गया । अब हंसने की बारी ऊंट की थी ।
सीख: किसी के साथ दुष्टता करोगे तो अन्जाम बुरा ही होगा ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 5
सोने के पत्ते |
एक गांव में एक विधवा अपने पुत्र के साथ रहती थी । पुत्र का नाम नारायण था । मां-बेटा दोनों बहुत मेहनती व ईमानदार थे । उनके घर के पास ही एक पेड़ था । नारायण का रोज का एक अटूट नियम था ।
काम पर जाने से पहले वह पेड़ को एक-दो लोटे पानी अवश्य देता था । बचपन से ही उसे पेड़ों से बहुत लगाव था । एक बार नारायण बीमारपड़ा । कई दिन बीमारी नहीं टूटी । बीमारी में भी उसने खाट से उठकर पेड़ को पानी देना न छोड़ा ।
एक दिन नारायण पेड़ को पानी देने लगा तो पेड़ ने कहा : ”मैं तेरी सेवा से बहुत प्रसन्न हुआ । तू कोई वर मांग ।” नारायणबोला : “हे वृक्षदेव, मैंने तो केवल अपना फर्ज ही निभाया है । हम तो पहले ही आपके उपकारों से दबे पड़े हैं । मेरी मां मुझे एक ही तो शिक्षा दी है कि पेड़ ही मनुष्य के सच्चे साथी हैं ।
शुद्ध, वायु, छाया व फल तो देते ही हैं, इनके अलावा मनुष्य के जीवन का आधार लकड़ी भी देते हैं ।” वृक्षदेव नहीं माने । उन्होंने वर मांगने पर जोर दिया तो नारायण बोला : “आपकी यही इच्छा है तो मुझे नीचे गिरे अपने पत्ते ले जाने की आज्ञा दीजिए । सफाई भी हो जाया करेगी ।”
नारायण पेड़ के पत्ते इकटठे करके ले गया और अपने घर के एक कोने में उसने ढेर लगा दिया । उसने सोचा जब पत्ते काफी सारे इकट्ठे हो जाएंगे और सूख जाएंगे तो बूढ़ी मां का बिछौना उस पर बिछा दूंगा । नर्म रहेगा । पर तब मां बेटे के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, जब उन्होने पत्तों का रंग बदलते देखा ।
सुबह तक वे पीली धातु में बदलकर खचमन्कस रहे थे । नारायण बोला कि कहीं यह सोने के तो नहीं बन गए । मां उन पत्तों को लेकर बनिए के पास गई । वह पत्ते देखकर चौंका । जांचा तो उसने खरा सोना पाया । उसने बुढ़िया को ठगने के लिए कहा : “ये तो पितल के पत्ते हैं । चाहो तो इसके बदले कुछ राशन ले जाओ ।”
बुढ़िया क्या जाने छल ? वह बेचारी उन्हें पीतल के ही मानकर कुछ राशन ले आई । अब रोज यही होने लगा । नारायण पत्ते इकट्ठे कर लाता । वह सुबह तक सोने के पत्तों में बदल जाते और बुढ़िया मां जाकर उससे राशन ले आती ।
एक दिन बनिए के दिल में आया कि देखना चाहिए कि बुढ़िया के पास सोने के पत्ते कहां से आते हैं । उसने नारायण का पीछा किया और सारा माजरा जान गया । दूसरे दिन जब नारायण व बुढ़िया काम पर चले गए तो उसने जाकर दो-तीन पत्ते उठा लिए ।
बाकी पत्ते तो नारायण पहले ही उठा चुका था । बनिए ने पेड़ पर चढ़कर खूब पत्ते उखाड़े । कई पत्तियों से लगी टहनियां भी तोड़ डाली । इस प्रकार वह बोरी भरकर ले आया और अपने कमरे में ढेर लगाकर उनके सोने में बदलने का इंतजार करने लगा ।
पर वे पत्तियां और टहनियां सोने की नहीं बनी । वे तो कुछ और ही रूप धारण करने लगीं । पनिया बिच्छुओं में बदल गईं और टहनियां काले सांपों में । बनिया भयभीत होकर बाहर भागा । उसके पीछे भागी बिच्छुओं और सांपों की टोलियां ।
बनिया दौड़ता हुआ उसी पेड़ के पास पहुंचा और हाथ लगा । वृक्ष देवता ने कहा : “दुष्ट, ये साप और बिच्छू तेरे पीछे तब तक लगे रहेंगे, जब तक तू नारायण की मां से जितने सोने के पत्ते तूने लिए है उनकी पूरी कीमत नहीं चुकाता ।”
बनिया दौड़ता ही लौटा । उसने सोने के पत्ते बेचकर जितने पैसे कमाए थे, वे ले जाकर नारायण व उसकी मी को सौंप दिए और अपने किए के लिए क्षमा मांगी । नारायण ने उस धन से जमीन खरीदी और उसमें पेड़ लगाए । पेड़ों के घने वन में वह सुख से रहने लगा ।
उसका विवाह भी एक सुदर कन्या से हो गया । कई वर्ष बाद पड़ोस के राज्य में सूखा पड़ा । पानी बरसा ही नहीं । नारायण की ख्याति दूर-दूर तक फैल चुकी थी । वह लोगों से पहले ही कहा करता था कि पेड़ नहीं होंगे तो सूखा पड़ेगा ।
पड़ौसी राजा ने नारायण को निमंत्रण देकर अपने यहां बुलाया और उससे सलाह मांगी । नारायण ने राजा को परामर्श दिया : ”राजा, आपके राज्य में पेड़ों को काटा गया है । वनों का सफाया कर दिया गया है । यही तो सूखे का कारण है । पेड़ ही तो बादलों से वर्षा करवाते हैं ।
फिर से वन लगवाइए । याद रखिए पेड़ ही हमारे सच्चे साथी हैं । पेड़ ही जन्म में लेकर मृत्यु तक लकड़ी बनकर हमारी देखभाल करते हैं । बचपन में लकड़ी का पालना वनकर हमें सुलाता है, फिर गिल्ली-डंडा बन हमें खिलाता है, लकड़ी की तख्ती बनकर हमें लिखना-पढ़ना सिखाता है ।
विवाहमंडप की अग्नि बनकर फेरे डलवाकर गृहस्थ जीवन का आरम्भ करवाता है । चकला-बेलन बन हमें रोटी खिलाता है, बीमार पड़ने पर हमें खाट बनकर संभालता है । बुढ़ापे में लाठी बनकर हमें सहारा देता है । मृलु होने पर दो डंडे बन लादकर श्मशान घाट ले जाता है और चिता बनकर हमारी अंतिम क्रिया करता है ।” नारायण की बात सुन राजा की औखें खुल गईं । उसने अपने राज्य में पेड़ लगवाए । पेड़ों की कटाई पर प्रतिबंध लगा दिया और फिर से वह देश एक सुखी राज्य हो गया ।
सीख: पेड़ों की रक्षा करना हमारा नैतिक कर्तव्य है, क्योंकि पेड़ ही हमारे सच्चे जीवन-साथी हैं ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 6
सेर को सवा सेर |
एक गांव में तीन भाई रहते थे । लंबी-चौड़ी हांकने में उनका जवाब नहीं था । बात से बात निकालना और गप्पें लड़ाना उनका काम था । इस काम में तीनों गपोड़ी अपने को सबका गुरु समझते थे ।
एक बार तीनों भा: यात्रा पर निकले । रास्ते में वे एक सराय में ठहरे । उसी सराय में एक राजकमार भी कप पहन रखे थे । गपोड़ियों ने राजकुमार के की योजना बनाई । उनमें से एक गपोड़ी राजकुमार से बोला : “महाशय, समय काटने के लिए कुछ खेल-पहेली हो जाए तो कैसा रहेगा ?”
राजकुमार राजी हो गया । दूसरे गपोड़ी ने सुझाया : “ऐसा करते हैं कि हम बारी-बारी से हांकते हैं । किसी की गप हारा माना जाए । उसे गप कहने राजकुमार यह शर्त भी मान गया ।” उसने कीमती वस्त्र तथा बहूमूल्य आभूषण जाल में फसाकर उसके वस्त्र-आभूषण लूटने काटने के लिए कुछ खेल-पहेली है कि हम बारी-बारी से गपोड़ी बहुत खुश हुए ।
उन्हें पूरा विश्वास था कि वे ऐसी बेतुकी गभ मारेंगे कि राजकमार को विश्वास न करने पर मजबूर करेंगे । उसके मुंह से : ”यह कैसे हो सकता है, निकलवाकर रहेंगे ।” उन्होंने सराय के मालिक को पंच बनने के लिए मना लिया । बस महफिल जम गई । मुकाबला शुरू हुआ ।
पहले गपोड़ी नेगप मारी : ”बचपन में हम लुकाछिपी खेल रहे थे । मैं छिपने के लिए एक ताड़ के पेड पर चढ़ गया । वह ताड़ का पेड़ कम से कम सौ मील ऊचा था । मैं दौड़कर उसकी चोटी के पत्तों के बीच छिपकर बैठ गया । मुझे वहीं नींद आ गई ।
जब आख खुली तो देखा कि पेड़ इस बीच पचास मील और उग चुका था । नीचे उतरने की हिम्मत नहीं हुई । मैं सोच ही रहा था कि पास से एक बादल का गुजरा । मैं उसी में पुस गया । टुकड़ा जब उस बादल से पानी बरसने लगा तब जाकरमैं पानी की धार को रस्सी की तरह पकड़कर नीचे उतरा ।” केवल गपोड़ी राजकुमार मुस्कराया ।
निराश हो गया । उसे पूरा यकीन था कि राजकुमार विश्वास नहीं करेगा । दूसरा गपोड़ी बोला-एक बार मेरी गेंद एक झाड़ी में जा गिरी । मैं अपनी दूंढने झाड़ियों में पुसा, लेकिन मुझे अपनी गेंद कहीं नजर नहीं आई । बस एक जगह एक चूहे का बिल मुझे दिखा ।
मैं उसके भीतर चला गया तो क्या देखता हूं कि वहां सैकड़ों हाथी बंधे पड़े हैं । उस बिल में रहने वाला चूहा हाथीचोर था । मैंने उन हाथियों को मुक्त कराने का फैसला कर लिया । और तो कोई तरीका नहीं था । सिवा हाथियों को पकड़कर अपनी जेबों में भरने के ।
सारे हाथी जेबों में आ गए तो मैं बाहर की ओर भागा । तभी हाथीचोर चूहे ने मुझे देख लिया । वह तलवार लेकर मेरे पीछे आया । बिल से बाहर आकर चूहे से बचने के लिए मैं उछलकर एक दिखे की पीठ पर सवार हो गया और उसे चाबुक मारी ।
टिके ने आठ-दस लम्बी-लम्बी छलांगें मारी और चूहा हाथ मलता रह गया ।” राजकुमार ने सहमति के लिए सिर हिलाया : ”हां, मैंने भी तुम्हें टिके पर जाते देखा था ।” दूसरा गपोड़ी भी असफल हो गया । अब बारी तीसरे गपोड़ी की थी । वह बोला : “एक बार नदा गया ।
सारे मछुआरे इकट्ठे होकर रो रहे थे । मैंने कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि नदी में एक भी मछली नहीं रही है । वे भूखों मर रहे हैं ।” मैं इसका कारण जानने नदी में उतरा । पानी के भीतर मैं क्या देखता हूं कि एक न्हेल मछली सारी मछलियों को खा रही है ।
उसे देखकर मुझे इतना गुस्सा आया कि मेरे गुस्से की गर्मी से नदी का पानी गर्म होने लगा । पानी गर्म होने से बेल छटपटाने लगी और पानी से ऊपर आकर हवा में उड़ गई । उसके उड़ने से पहले ही मैंने उसकी पूंछ पकड़ ली । हम दोनों हवा में उड़ने लगे ।
केल ने पूँछ झटककर मुझे गिराने की कोशिश की पर मैंने पूंछ नहीं छोड़ी । तभी मुझे एक बहुत बड़ी चट्टान हवा में तैरती नजर आयी । मैंने अपने पैर उस पर टिकाए और पूछ से पकड़कर केल को खूब पुमाकर समुद्र की ओर फेंक दिया । इस प्रकार मैंने उस केल से मछुआरों को निजात दिलाई ।”
ने ताली बजाई-तुमने बहुत बहादुरी का काम किया ।” राजकुमार जैनों गपोड़ी असफल हो गए थे । उनके मुह उतर गए । पच ने कहा : ”राजकुमार, अब तुम न गण सुनाओ ।” राजकुमार ने कहा : ”ठीक है । अब मेरी कहानी सुनो । मैं एक देश का राजकुमार हूं । मेरे पास तीन गुलाम हैं । मैंने उन्हें महंगे दाम देकर खरीदा था ।
एक दिन वे तीनों मुझे घोखा देकर भाग निकले । तबसे मैं घूम-घूमकर उन्हें तलाश करता फिर रहा हूं । आज फिर वे मुझे मिल गए । एक गपोड़ी ने पूछा : ”कौन हैं वे ?” राजकुमार मुस्कराया : “तुम तीनों ही तो वे गुलाम हो ।”
अब गपोड़ी फंस गए । अगर राजकुमार की बात नहीं मानते तो शर्त हार जाते हैं और राजकुमार के गुलाम बन जाते हैं । अगर राजकुमार की गण स्वीकार करते हैं तो गुलाम हैं ही । पंच ने निर्णय दिया कि गपोड़ी भाई हार गए हैं और वे अब राजकुमार के गुलाम होंगे ।
गपोड़ी बहुत सिटपिटाए । राजकुमार से क्षमा याचना करने लगे । अंत में राजकुमार ने कहा : ”मैं तुम्हें एक शर्त पर मुक्त करता हूं । वह यह कि आगे से ऊलजलूल बातें बनाकर गांव वालों को न ठगना ।” गपोड़ी भाइयों को वचन देना पड़ा ।
सीख: सेर को सवा सेर देर या सबेर मिल ही जाता है ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 7
वानरराज का बलिदान |
वन में एक नदी के किनारे आम का एक अनोखा था । उस पर ऐसे मीठे व रसीले आम लगते थे जिनका कोई मुकाबला नही था । बंदरों का एक टोला उस पेड़ पर निवासकरता था । वेही उन आमोंका स्वाद लेते थे उस टोले का मुखिया वानर राज बहुत नेक व सूझबूझ वाला बंदर था ।
जब मौसम आने पर आम के पेड़ पर बौर आते तो वह बंदरों से नदी के ऊपर फैली टहनियों के सारे बौर नष्ट करवा देता था । वह कहता था : ”देखो, इन टहनियों पर आम लगे तो वे नदी के पानी से गुजरेंगे । मानव उन आमों को चखकर इस पेड़ को खोजते हुए यहा आएंगे । उसके बाद मानव सारे फल लेजाया करेंगे।”
एक वर्ष नदी के ऊपर फैली टहनियों में कुछ बौर बच गए । आम लगे और पकने पर वे पानी में गिरे । वे आम कुछ मछुआरों के हाथ लगे । मछुआरों ने फल चखे तो वे दग रह गए । इतने मीठे, स्वादिष्ट और सुगंधित आम उन्होंने पहले कभी नहीं खाए थे ।
मछुआरों का मुखिया कुछ आम लेकर राजा के दरबार में गया और राजा को वे आम पेश किए । राजा भी आम खाकर प्रसन्न हुआ । जिसने खाया उसी ने प्रशंसा की । राजा ने पूछने पर मछुआरे मुखिया ने बताया की आम नदी में बहते हुए आए थे ।
राजा अगले ही दिन अपने सैनिकों को लेकर उस अलौकिक पेड़ की तलाश में निकाल पड़ा । यह सोचकर की पेड़ नदी के किनारे होना चाहिए । नदी किनारे कुछ आगे जाते ही राजा को आम का वह पेड़ दिखाई गया । राजा के सैनिकों ने खूब आम तोड़े और राजा को दिए ।
राजा ने खाए और सैनिकों ने भी खूब खाए । अगले दिन सारे आम तोड़ने क्य निर्णय हुआ राजा का खेमा पेड़ के नीचे ही लग गया । रात को बंदर पेड़ पर बसेरा करने वापस लौटे बंदर शोर मचाने लगे तो राजा को क्रोध आ गया । उसने सेनानायक को बुलाकर कहा : “इस पेड़ पर बंदरों का वास है ।
कल बंदरों को मार गिराओ । इस पेड़ पर बंदर नहीं रहने चाहिए ।” वानरराज ने राजा की आज्ञा सुन ली । उसने बंदरों से कहा : “हमें तड़के ही यह पेड़ छोड़कर नदी के पार किसी सुरक्षित जगह पर जाना होगा ।” रात भर में वानरराज ने नदी पार करने का हल भी लिया था ।
वह बंदरों को नदी किनारे के एक पेड़ पर ले गया । वानरराज ने एक लम्बी व मजबूत लता पेड़ की टहनी से बांधी । दूसरा सिरा अपने पैर में बांधा और बोला : “मैं लम्बी छलांग लगाकर नदी पार उस अंजीर के पेड़ पर पहुंचकर दूसरा सिरा उसकी डाल से बांधूगा । फिर सब लता पर से चलकर उस पार पहुंचना ।”
वानरराज ने छलांग लगाई । उसने अंजीर के पेड़ की डाली तो पकड़ ली, पर लता छोटी पड़ गई । लता तन गई । वानरराज का शरीर भी तन गया । वानरराज ने बंदरों को आने का संकेत दिया । एक बार में एक-एक करके सारे बंदर लता व वानरराज के शरीर पर से होकर पेड़ पर पार अतरने लगे ।
वानरराज दांत भींचकर पीड़ा सहता रहा । अन्त में एक दुष्ट बंदर उतरा जो वानरराज को हटाकर खुद मुखिया बनना चाहता था । उसने डाली पर उतरने से पहले वानरराज को जोर की लात मारी । वानरराज का हाथ डाली से छूट गया । वह पत्थर पर नीचे गिरा ।
राजा यह दृश्य चकित होकर देख रहा था । वानरराज को गिरते देख राजा नदी में चूरा और नदी पार पहुंचकर प्राण त्यागते वानरराज के पास पहुंच उसे गोदी में उठाकर बोला : ”धन्य हो वानर, तुमने दूसरे बंदरों के लिए अपना बलिदान दिया ।” इस घटना का राजा पर इतना प्रभाव पड़ा कि उसने उसके बाद शिकार करना व रंगरलियां मनाना छोड़ दिया व पूरी तरह अपनी प्रजा की भलाई के कार्यों में लग गया ।
सीख : एक व्यक्ति की अच्छाई दूसरों को अच्छा बना देती है ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 8
सुक्खू और दुक्खू |
दूर इलाके के एक गांव में एक जुलाहा रहता था । उसके दो पत्नियां थीं । दोनों पत्नियों के एक-एक बेटी थी । बड़ी वाली की बेटी का नाम था सुक्खू और छोटी की बेटी का नाम था दुक्खू ।
बड़ी वाली बहुत चालाक थी इसलिए वह घर पर राज करती थी । वह और उसकी बेटी सुक्यू सुख से रहते सैर टद करते । बेचारी छोटी वाली बहुत विनम्र और सीधी थी । इसलिए घर का सारा काम उसे करना पड़ता । मां के साथ-साथ दुक्खू को भी खूब खटना पड़ता था ।
जुलाहा भी उन दोनों पर कोई ध्यान नहीं देता था । एक दिन जुलाहे की अकस्मात म्त्य हो गई । बड़ी वाली ने चालाकी से सारी सम्पत्ति हड़प ली और छोटी तथा दुक्खू को घर से निकान दिया । बड़ी अपनी बेटी के साथ शान से रहने लगी । छोटी वाली सूत कातकर, कपड़े बुनकर बेचने पर जो मिलता, उसी से रूखी-सुखी खाती ।
एक दिन दुक्खु की मां ने रुई सुखाने डाल दी और दुक्खू को ख्याल रखने के लिए कहकर स्वयं पानी लाने चली गई । उसके जाते ही हवा का एक झौंका रुई उड़ाकर ले गया । टुक्खू ने रुई पकड़ने की बहुत कोशिश की पर रुई हाथ न आई ।
वह रोने लगी । उसे रोते देख पवनदेव ने कहा : ”मेरे पीछे आ । मैं रुई दिला दूंगा ।” दुक्खू पवनदेव के झौंके के पीछे-पीछे चल दी । कुछ आगे जाने पर एक गाय मिली । गाय बोली : ”बेटी, मेरे चारों ओर गोबर पड़ा है । जरा इसे साफ कर दो ।” मेहनत और दूसरों की सेवा करने की आदी दुक्खू स्वभाववश ही गोबर साफ करने लगी ।
सफाई करके उसने एक घास का पूला भी गाय के आगे डाल दिया और पानी की बाल्टी पास में ही रख दी । और आगे बढ़ने पर एक केले के पेड़ के आग्रह पर दुक्खू ने उसके नीचे गिरे पत्ते हटाए । वहां की सफाई की और फिर वह आगे बड़ी ।
आगे एक घोड़ा बंधा मिला । घोड़े ने कहा : “मैं कई दिन का भूखा-प्यासा हूं । मुझे कुछ खाने को दो ।” दुक्खू ने उसे घास काटकर दी व पानी लाकर पिलाया । आगे एक चांदी से सफेद बालों वाली बुढ़िया सूत कात रही थी । वह चांद की मां थी ।
पवनदेव ने इशारा किया कि इससे अपनी रुई मांग । दुक्खू ने बुढ़िया के चरण छूकर अपनी रुई मांगी । बुढ़िया बोली : “रुई मिलेगी । पर पहले अन्दर जाकर बालों में तेल लगाकर ताल में नहा । फिर नई साड़ी पहनकर खाना खाकर आ ।” दुक्खू भीतर गईं ।
बालों में तेल लगाकर उसने ताल में डुबकी लगाई, चमत्कार हुआ । वह परी-सी सुंदर बन गई । दूसरी डूबको लगाइ तो उसका शरीर गहनों से लद गया । तीसरी डुबकी लगाने की उसकी हिम्मत नहीं हुई । उसने कक्ष में आकर कीमती साड़ियां छोड़कर सादी-सी साड़ी चुनकर पहनी व भोजन कक्ष में गई, जहां मेज पर पकवान सजे थे ।
दुक्खू ने केवल रोटी व सब्जी चुनकर खाई और बुढ़िया के पास आ गई । बुढ़िया ने उसे रुई लौटा दी । साथ ही बुढ़िया ने अपने पास रखे दो डिब्बों में से एक चुनकर उपहार स्वरूप उसे ले जाने के लिए कहा । दुक्खू ने छोटे वाला डिब्बा उठाया ।
रास्ते में लौटते समय घोड़े ने उसे सोने की अशर्फियों भरा पड़ा दिया । केले के पेड़ ने सोने के केलों का एक गुच्छा पकड़ाया । गाय ने उसे एक बछिया दी, जो जब चाहो दूध देती थी । ये सब नायाब उपहार लेकर दुक्खू घर लौटी । मा बहुत प्रसन्न हुई । उनके दुख के दिन फिर गए थे ।
रात को दुक्खू ने उपहार में मिला डिब्बा खोला तो उसमें से एक सुंदर राजकुमार निकला । उसने दुक्खू से विवाह कर लिया व तीनों सुख से रहने लगे । सुक्यू की मां ने यह सब देखा तो वह जल उठी । उसने भी छोटी की तरह रुई सूखने डाल दी । जब रुई उड़ गई तो सुक्खू को उसे लाने के लिए भेजा ।
रास्ते में गाय, पेड़ व घोड़े ने सुक्खू से वही विनती की, जो दुक्खू से की थी, परंतु सुक्खू को सेवा करना आता कहाँ था ? वह मुंह बिचकाकर आगे चल दी । उसने सूत कातती बुढ़िया से रुई और डिब्बा देने का ऐसे आदेश दिया जैसे वह नौकर को हुक्म दे रही हो ।
बुढ़िया के कहने पर वह भीतर गई व तेल लगाकर ताल में तीन-चार डुबकी लगाई । इस बार सत्यानाश हो गया । वह राक्षसी-सी कुरूप हो गई । शृंगार कक्ष में आकर उसने बढ़िया साड़ी चुनकर पहनी व खाना भी बढ़िया जी भरकर खाया ।
बुढ़िया ने अपने पास रखे दो डिब्बों में से एक उपहार स्वरूप चुनने के लिए कहा तो सुक्खू ने बड़ा डिब्बा चुना । रास्ते में घोड़े ने उसे लात मारी केले के पेड़ ने उस पर छिलकों की वर्षा की और गाय ने उसे सींग से उछालकर फेंक रोती-पीटती सुक्खू घर लौटी । मां ने उसकी हालत देखकर माथा पीट लिया ।
रात को सुक्खू ने डिब्बा खोला तो उसमें से राजकुमार की जगह एक अजगर निकला अजगर ने सुक्खू को खा लिया व खिड़की की राह भाग गया । सुबह सुक्खू की मां को कमरे में केवल अजगर की केंचुली मिली । उसका सब कुछ खत्म हो गया था ।
सीख : ईर्ष्या एक ऐसी आग है, जो इंसान का सब कुछ खत्म कर देती है ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 9
एकता का बल |
एक समय की बात है कि कबूतरों का एक दल आसमान में भोजन की तलाश में उड़ता हुआ जा रहा था । गलती से वह दल भटककर ऐसे प्रदेश के उपर से गुजरा, जहां भयंकर अकाल पड़ा था । कबूतरों का सरदार चिंतित था । कबूतरों के शरीर की शक्ति समाप्त होती जा रही थी ।
शीघ्र ही कुछ दाना मिलता जरूरी था । दल का युवा कबूतर सबसे नीचे उड़ रहा था । भोजन उड़ने के बाद कहीं वह दल सूखाग्रस्त क्षेत्र से बाहर आया । नीचे हरियाली नजर आने लगी तो भोजन मिलने की उम्मीद बनी । युवा कबूतर और नीचे उड़ान भरने लगा ।
तभी उसे नीचे खेत में बहुत-सा अन्न बिखर नजर आया : “चाचा, नीचे एक खेत में बहुत सारा दाना बिखरा पड़ा है । हम सबका ने भर जाएगा ।” सरदार ने सूचना पाते ही कबूतरों को नीचे उतरकर खेत में बिखरा दाना चुगने का आदेश दिया । सारा दल नीचे उतरा और दाना चुगने लगा ।
वास्तव में वह दाना पक्षी पकड़ने वाले एक बहेलिए ने बिखेर रखा था । ऊपर पेड़ पर तना था उसका जाल । जैसे ही कबूतर दल दाना चुगने लगा, जाल उन पर आ गिरा । सारे कबूतर फंस गए । कबूतरों के सरदार ने माथा पीटा : ”ओह । यह तो हमें फंसाने के लिए फैलाया गया जाल था ।
भूख ने मेरी अक्ल पर पर्दा डाल दिया था । मुझे तो सोचना चाहिए था कि इतना अन्न बिखरा होने का कोई मतलब है । अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत ?” एक कबूतर रोने लगा : “हम सब मारे जाएंगे ।”
बाकी कबूतर तो हिम्मत हार बैठे थे, पर सरदार गहरी सोच में डूबा था । एकाएक उसने कहा : “सुनो, जाल मजबूत है यह ठीक है, पर इसमें भी इतनी शक्ति नहीं है कि एकता की शक्ति को हरा सके । हम अपनी सारी शक्ति को जोड़े तो मौत के मुंह में जाने से बच सकते हैं ।”
युवा कबूतर फड़फड़ाया : “चाचा ! साफ-साफ बताओ तुम क्या कहना चाहते हो । जाल ने हमें तोड़ रखा है, शक्ति कैसे जोडे ?” सरदार बोला : “तुम सब चोंच से जाल को पकड़ो, फिर जब मैं फुर्र कदूंर तो एक साथ जोर लगाकर उड़ना ।” सबने ऐसा ही किया ।
तभी जाल विछाने वाला बहेलिया आता नजर आया । जाल में कबूतरों को फंसा देख उसकी आंखे चमकी । हाथ में पकड़ा डंडा उसने मजबूती से पकड़ा व जाल की और दौड़ा । बहेलिया जाल से कुछ ही दूर था कि कवृतरों का सरदार बोला : “फुर्रर्रर्र !”
सारे कबूतर एक साथ जोर लगाकर उड़े तो पूरा जाल को लेकर ही उड़ने लगे । कबूतरों को जाल सहित उड़ते देखकर बहेलिया अवाक रह गया । कुछ संभला तो जाल के पीछे दौड़ने लगा । कबूतर सरदार ने बहेलिए को नीचे जाल के पीछे दौड़ते पाया तो उसका इरादा समझ गया ।
सरदार भी जानता था कि अधिक देर तक कबूतर दल के लिए जाल सहित उड़ते रहना संभव न होगा । पर सरदार के पास इसका उपाय था । निकट रे एक पहाड़ी न बिल बनाकर उसका एक चूहा मित्र रहता था । सरदार ने कबूतरों को तेजी से उस पहाड़ी की और उड़ने का आदेश दिया । पहाड़ी पर पहुंचते ही सरदार का संकेत पाकर जाल समेत कबूतर चूहे के बिल के निकट उतरे ।
सेरेदार ने मित्र चूहे को आवाज दी । सरदार ने संक्षेप में चूहे को सारी घटना बताई और जाल काटकर उन्हें आजाद करने के लिए कहा । कुछ ही देर में चूहे ने वह जाल काट दिया । सरदार ने अपने मित्र चूहे को धन्यवाद दिया और सारा कबूतर दल मुक्त आकाश की ओर आज़ाद की उड़ान भरने लगा ।
सीख : एकजुट होकर बड़ी से बड़ी विपत्ति का सामना किया जा सकता है ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 10
ढोंगी सियार |
मिथला के जंगलों में बहुत समय पहले एक सियार रहता था । वह बहुत आलसी था । पेट भरने के लिए खरगोशों व चूहों का पीछा करना व उनका शिकार करना उसे बड़ा भारी लगता था । शिकार करने में परिश्रम तो करना ही पड़ता है न । दिमाग उसका शैतानी था ।
यही तिकड़म लगाता रहता कि कैसे ऐसी जुगत लड़ाई जाए जिससे बिना हाथ-पैर हिलाए भोजन मिलता रहे । खाया और सो गए । खाया और सो गए । एक दिन उसी सोच में डूबा वह सियार एक झाड़ी में दुबका बैठा था । बाहर चूहों की एक टोली उछल-कूद व भाग-दौड़ करने में लगी थी ।
उनमें एक मोटा-सा चूहा था, जिसे दूसरे चूहे ‘सरदार’ कहकर बुला रहे थे और उसका आदेश मान रहे थे नेवार उन्हें देखता रहा । उसके मुंह से लार टपकती रही । फिर उसके दिमाग में एक तरकीब आई । जब चूहे वहाँ से गए तो उसने दबे पाव उनका पीछा किया । कुछ ही दूर उन चूहों के बिल थे । सियार वापस लौटा ।
दूसरे दिन प्रात: ही वह उन चूहों के बिल के पास जाकर एक टांग पर खड़ा हो गया । उसका मुंह उगते सूरज की ओर था । औखें बंद थीं । चूहे बिलों से निकले तो सियार को उस अनोखी मुद्रा में खड़े देखकर वे बहुत चकित हुए । एक चूहे ने जरा सियार के निकट जाकर पूछा : ”सियार मामा, तुम इस प्रकार एक टांग पर क्यों खड़े हो ?”
सियार एक औख खोलकर बोला : ”मूर्ख, तूने मेरे बारे में नहीं सुना कभी ? मैं चारों टांगें नीचे टिका दूंगा तो धरती मेरा बोझ नहीं सम्भाल पाएगी । यह डोल जाएगी । साथ ही तुम सब नष्ट हो जाओगे । तुम्हारे ही कल्याण के लिए मुझे एक टांग पर खड़े रहना पड़ता है ।”
चूहों में खुसर-पुसर हुई । वे सियार के निकट आकर खड़े हो गए । चूहों के सरदार ने कहा : “हे महान सियार, हमें अपने बारे में कुछ बताइए ।” सियार ने ढोंग रचा : ”मैंने सैकड़ों वर्ष हिमालय पर्वत पर एक टांग पर खड़े होकर तपस्या की । मेरी तपस्या समाप्त होने पर सभी देवताओं ने मुझ पर फूलों की वर्षा की ।
भगवान ने प्रकट होकर कहा कि मेरे तप से मेरा भार इतना हो गया है कि मैं चारों पैर धरती पर रर्सू तो धरती गिरती हुई ब्रह्मांड को फोड़कर दूसरी ओर निकल जाएगी । धरती मेरी कृपा पर ही टिकी रहेगी । तबसे मैं एक ही टांग पर खड़ा हूं । मैं नहीं चाहता कि मेरे कारण दूसरेजीवों को कष्ट हो ।”
सारे चूहों का समूह महातपस्वी सियार के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया । एक चूहे ने पूछा : “तपस्वी मामा, आपने अपना मुंह सूरज की ओर क्यों कर रखा है ?” सियार ने उत्तर दिया : “सूर्य की पूजा के लिए ।” “और आपका मुंह क्यों खुला है?” दूसरे चूहे ने कहा ।
”हवा खाने के लिए! मैं केवल हवा खाकर जिंदा रहता हूं । मुझे खाना खाने की जरूरत नहीं पड़ती । मेरे तप का बल हवा को ही पेट में भांति-भांति के पकवानों में बदल देता है ।” सियार बोला । उसकी इस बात को सुनकर चूहों पर जबरदस्त प्रभाव पड़ा ।
अब सियार की ओर से उनका सारा भय जाता रहा । वे उसके और निकट आ गए । अपनी बात का असर चूहों पर होता देख मक्कार सियार दिल ही दिल में खूब हंसा । अब चूहे महातपस्वी सियार के भक्त बन गए । सियार एक टांग पर खड़ा रहता और चूहे उसके चारों ओर बैठकर ढोलक, मजीरे, खड़ताल और चिमटे लेकर उसके भजन गाते ।
सियार सियारम् भजनम् भजनम् ।
भजन कीर्तन समाप्त होने के बाद चूहों की टोलियां भक्ति रस में डूबकर अपने बिलोंमें पुसने लगतीं तो सियार सबसे बाद के तीन-चार चूहों को दबोचकर खा जाता । फिर रात भर आराम करता, सोता और डकारें लेता । सुबह होते ही फिर वह चूहों के बिलों के पास आकर एक टाग पर खड़ा हो जाता और अपना नाटक चालू रखता ।
धीरे-धीरे चूहों की संख्या कम होने लगी । हों के सरदार की नजर से यह बात छिपी नहीं रही । एक दिन सरदार ने सियार से पूछ ही लिया : “हे महात्मा सियार, मेरी टोली के चूहे मुझे कम होते नजर आ रहे हैं । ऐसा क्यों हो रहा है ?”
सियार ने आशीर्वाद की मुद्रा में हाथ उठाया : “हे, चतुर मूषक, यह तो होना ही था । जो सच्चे मन से मेरी भक्ति का फल पा रहे हैं ।” चूहों के सरदार ने देखा कि सियार मोटा हो गया है । कहीं उसका पेट ही तो वह बैकुंठ लोक नहीं है, जहां चूहे जा रहे हैं ?
चूहों के सरदार ने बाकी बचे चूहों को चेताया और स्वयं उसने दूसरे दिन सबसे बाद में बिल में पुसने का निश्चय किय अन्द्रन् ममाप्त होने के बाद चूहे बिलों में घुसे । सियार ने सबसे अंत के चूहे को दबोचना चाहा । चूहों का सरदार पहले ही चौकन्ना था । वह दांव मारकर सियार का पंजा बचा गया ।
असलियत का पता चलते ही वह उछलकर सियार की गर्दन पर चढ़ गया और उसने बाकी चूहों को हमला करने के लिए कहा । साथ ही उसने अपने दांत सियार की गर्दन में गड़ा दिए । बाकी चूहे भी सियार पर झपटे और सबने कुछ ही देर में महात्मा सियार को कंकाल सियार बना दिया । केवल उसकी हड्डियों का पिंजर बचा रह गया ।
सीख : ढोंग कुछ ही दिन चलता है, फिर ढोंगी को अपनी करनी का फल मिलता ही है ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 11
बड़ों की सीख |
बहुत समय पहले रेगिस्तान के निकट एक गाव था । उस गांव में एक बहुत पुराना सूझबूझ और समझ वाला बुजुर्ग रहता था । जीवन का बहुत अनुभव था उसे । दुख-सुख व संकट के समय सब उसी से सलाह लेते थे । दूसरों की समस्याएं सुलझाने के लिए वह सदा तत्पर रहता ।
वही गांव का मुखिया था । एक साल उस क्षेत्र में सूखा पड़ा । पानी बरसा ही नहीं । समस्या बड़ी गम्भीर हो गई । फसलें सूखने लगी । पानी का अकाल पड़ गया । सबने मुखिया से पूछा कि अब क्या करें । मुखिया ने सुझाव दिया : “अगर कुछ दिन और वर्षा न आई तो इस गांव से चलने के बारे में सोचना होगा ।”
गांव के एक तेजतर्रार दुवक के एंजिल का सुझाव पसंद नहीं आया । वह बोला : “अब गांव में रुकने का लाभ क्या है ? हमें फौरन गाव छोड़ देना चाहिए ।” मुखिया ने कहा : “जल्दबाजी में गांव छोड़ना बुद्धिमानी नहीं होगी । घर छोड़कर जाने के लिए तैयारी भी करनी पड़ती है ।
सोचना-समझना पड़ता है कि कहां जाएंगे । वहाँ जाकर क्या करेंगे आदि ।” युवक ने ताना मारा : “ताऊ, बुढ़ापे में अक्ल सठिया जाती है और धीमी चाल चलती है । शरीर की चाल भी धीमी हो जाती है । अब सोचने और समझने के लिए रखा ही क्या है ?
बस बैलगाड़ियों पर सामान लादो और चल दो ।” अब कई दूसरे युवा भी उस युवा का साथ देने लगे थे और सब ‘हां ! हां’ का शोर मचाने लगे । मुखिया ने उनसे जल्दबाजी न करने की प्रार्थना की, परन्तु वे न माने । कुछ युवा तथा दो-चार और लोग अपना सामान बैलगाड़ियों पर लादकर चल दिए ।
जाते-जाते शेष गांव वालों से कह गए : ”बुढ़ऊ तुम्हें मरवाएगा ।” युवादल के जाने के दो-तीन दिन बाद मुखिया ने गाव वालों से कहा : ”बादल आने के कोई आसार नहीं बन रहे हैं । चलने की तैयारी करो । पुराने कुए का जितना पानी बचा था उसका आधा तो युवा के साथी ले गए । बाकी पानी घड़ों में भर लो ।
कुछ लोग रेत खोदकर गहराई से पानी निकालो । सफर लम्बा होगा । रेगिस्तान का मामला है । पानी की जरूरत पड़ेगी । कुछ लोग अपना सामान बांधने लग गए । बाकी लोग पानी जुटाने में जुट गए । रेत खोदकर पानी इकट्ठा किया जाने लगा । पूरी तैयारी होने पर दो दिन के बाद सारे ग्रामवासी बैलगाड़ियों पर लदकर चल पड़े ।
कई दिन के सफर के बाद एक दिन उन्हें कुछ लोग रेत के टीले के पीछे से निकलकर आते दिखाई दिए । उन्होंने मुंह पर कपड़े बाध रखे थे । हाथों में फरसे व भाले थे । उन्होंने शरीर पर जानवरों की खाल के गीले कपडे पहन रखे थे ।
दल के सरदार ने पूछा : ”भाइयो, आप लोग कहा जा रहे हो ? बैलगाड़ियों में मटकों में क्या लादकर ले जा रहे हो ?” मुखिया ने सारी बात बताई । उनकी बात सुनकर नकाबपोश सरदार बोला : “ओ ! हो ! हो ! आप ही के गांव के कुछ लोग कई दिन पहले इधर से गए थे । बड़े परेशान हुए वे । पिछले दिनों आगे अंधड़ आया था ।
इससे आगे की सारी सड़क पर कमर-कमर तक रेत बिछा हुआ है । हमने उनकी मदद कर उन्हें पार पहूंचाया । आप लोग अपने यह पानी के मटके-वटके फेंक दो, वर्ना बैलगाड़ियां रेत में धंस जाएगी और आप लोग फंस जाओगे । आगे पानी की चिंता नहीं है ।”
मुखिया ने उन लोगों की ओर ध्यान से देखा । फिर आसमान पर नजर डाली और उसने इनकार में अपना सिर हिलाया । मुखिया अपनी आवाज ऊंची कर अपने लोगों को सुनाकर बोला : “नहीं भाई ! हम मटके नहीं फेंकेंगे । आगे जैसा मौका आएगा उसके अनुसार देखेंगे ।”
जो लोग मटके फेंकने की तैयारी कर रहे थे, उनके हाथ रुक गए । नकाबपोशों ने अपनी बात मनवाने की कोशिश की, पर मुखिया नहीं माना । उसने काफिले को आगे चलने का संकेत दिया । नकाबपोशों का सरदार अपने साथियों से बोला : ”बुड्ढा बहुत काइयां है ।”
उसके बाद काफिले के कई दिन चलने पर भी न तो वर्षा का कोई चिन्ह नजर आया और न सड़क पर फैली रेत ही दिखाई दी । मुखिया के पानी के घड़े न फेंकने के निर्णय ने सबकी जान बचा ली, क्योंकि आगे उन्हें पानी की बहुत आवश्यकता पड़ी ।
रेगिस्तान में तो पानी सबसे कीमती चीज होती है । जीवन का सहारा । आखिर रेगिस्तान समाप्त हुआ । आगे एक वन के दर्शन हुए । वन शुरू होने से पहले ही उन्हें एक सड़क के दोनों ओर टूटी बैलगाड़ियां मिलीं और पास में ही बिखरे थे नर कंकाल ।
नरकंकालों के फटे कपड़े देखते ही गाव वाले पहचान गए कि कवाल उस युवा दल के हैं, जो जल्दबाजी में मुखिया की बात न मानकर चले गए थे । मृतकों के सगे सम्बन्धी रो पड़े । मुखिया के आदेश पर टूटा बैलगाड़ियों की लकड़ियां इकट्ठी कर नरकंकालों का दाह-संस्कार किया गया ।
फिर मुखिया ने सबको बताया : “देखो, वे नकाबपोश डाकू से लगते थे । उनके पास केवल हथियार थे । रेगिस्तान में कपड़े कुछ ही समय में सूख जाते हैं । पर वे हमें मूर्ख बनाने के लिए कहीं पास में से ही अपने कपड़ों पर पानी उड़ेलकर आए थे ।
यह सब देख मुझे संदेह हुआ था । शायद हमारे बदकिस्मत नौजवानो ने उन डाकुओं की बात मानकर फेंक दिए होंगे । आगे बिना पानी के वे मरने लगे होंगे तो डाकू उन्हें लूटकर चले गए होंगे । आगे बिना पानी के वे मरने लगे होंगे तो डाकू उन्हें लूटकर चले गए होंगे ।” यही सच्चाई भी थी ।
सीख: युवा वर्ग को बुजुर्गो की सीख व उनके अनुभवों का आदर करना चाहिए ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 12
अक्ल आई |
एक बार एक चोर एक धनी सेठ के घर चोरी करने के लिए पुसा । काफी रात हो गई थी । परन्तु सेठ व सेठानी जाग रहे थे । उनके बात करने की आवाजें आ रही थी । चोर उनके सोने की प्रतीक्षा करने लगा और उनकी बातें सुनने लगा ।
सेठ कह रहा था : “हमारे पास जो धन है, उसने हमें दुख ही दिया है । राजा और मंत्री धन ऐंठने के लिए नए-नए बहाने छूते रहते हैं । जाने कब किसी झूठे आरोप में फसा दें । चोर-डाकुओं का भय तो हरदम बना ही रहता है । सगे-संबंधी हमें मरवाने के लिए पड़न रचते रहते हैं ताकि हमारी सम्पत्ति हड़प सकें मन की शांति नष्ट हो गई है ।”
सेठानी बोली : ”ठीक कहते हो । मेरा भी धन में मोह भग हो गया है । चलो, यह सब छोड़कर काशी चलते हैं और बाकी जीवन सत्संग में गुजारेंगे ।” सेठ ने कहा : “पर अपनी धन-दौलत का क्या करें ? किसे दें ?” ”ऐसा करते हैं कि कल नगर के गुरुकुल में चलते हैं ।
वहां जो विद्यार्थी सबसे पहले खड़ा मिले, उसी को सम्पत्ति सौंप देंगे ।” सेठानी ने सुझाया । सेठ सहमत हो गया । फिर वे दोनों सो गए । चोर ने सोचा कि वह चोरी क्यों करे । सेठ-सेठानी वैसे ही अपना धन देने वाले हैं । कल विद्यार्थी का वेष बनाकर सबसे आगे जाकर खड़ा हो जाऊंगा और सारी सम्पत्ति का मालिक बन जाऊंगा ।
ऐसा मोचन स्थ्ये विना चोरी किए वहां से चला गया । दूसरे दिन विद्यार्थी बनकर वह गुरुकुल के द्वार पर सबसे पहले खड़ा हो गया । उसके बाद और विद्यार्थी आए, वे उसके पीछे खड़े होते गए । दस-पन्द्रह विद्यार्थियों की पंक्ति हो गई ।
तभी सेठ व सेठानी वहां आ पहुंचे । उन्होंने उल्टी ओर से विद्यार्थियों से पूछना शुरू किया । चोर ने माथा पीट लिया । इय प्रकार वह सबसे अन्तिम बन गया था । सेठ-सेठानी ने पहले विद्यार्थी का नाम पूछा और अपना परिचय दिया ।
फिर सेठ बोला-”बेटा! मैं अपनी सारी सम्पत्ति तुम्हें देना चाहता हूं ।” विद्यार्थी ने पूछा : “आप अपनी सम्पत्ति मुझे क्यों दे रहे हैं ?” सेठानी नेउत्तरदिया : “हम दोनों अब अपना शेष जीवन भजन-साधना में गुजारना चाहते हैं । हमें महसूस हो गया है कि धन-दौलत मुसीबतों की जड़ है ।”
विद्यार्थी ने चिढ़कर कहा : “तो आप मुसीबतों की जड़ मेरे गले में क्यों डालना चाहते हैं ? मैं ही आपको बेवकूफ नजर आया क्या ?” सेठ-सेठानी को सब विद्यार्थी वही उत्तर देते चले गए । जब चोर की बारी आई तो उसने सेठ से कहा : “सेठजी, अगर आपने अपनी सम्पत्ति सबसे-पहले-मुझे देने का प्रयत्न किया होता तो मैंने स्वीकार करलिया होता ।
पर अब मैं भी नहीं लूँगा । अब मुझे समझ आ गई है । मैं भी मुसीबत अपने सिर पर क्यों लूं ?” उसने चोरी का धंधा छोड़ दिया और उसी गुरुकुल में भर्ती हो गया ।
सीख : धन-दौलत का गुलाम बनना उसे मुसीबतों की जड़ बनाना है ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 13
मूर्ख नाई |
बहुत दिन बीते एक नगर में एक व्यापारी रहता था । वह लोगों की सहायता करता था और दान-पुण्य भी किया करता था । दुर्भाग्य से एक बार उसे व्यापार में बहुत घाटा हो गया । उसकी हवेली व दुकान बिक गए । वह एक छोटा-सा घर लेकर रहने लगा ।
पुराने साथियों ने उसका साथ छोड़ दिया । व्यापीरी दोस्तों ने भी उसकी मदद नहीं की । अपने व्यापार को दोबारा जमाने की उसने काफी कोशिश की परन्तु कामयाब नहीं हुआ । आखिर हारकर उसने वह नगर छोड़कर दूसरी जगद जाने का निश्चय कर लिया ।
उसी रात को उसे एक विचित्र सपना दिखाई दिया । सपने में एक भिक्षु उससे कह रहा था : “मैं तेरा भाग्य हूं । तुझे नगर छोड़कर जाने की आवश्यकता नहीं है । मैं कल इसी रूप में तेरे द्वार पर आऊंगा । मुझे देखते ही मेरे सिर पर डंडा मारना । तेरा भाग्य बदल जाएगा ।”
सुबह आख खुलने पर उसे सपने का आश्चर्य हुआ । वह यही सोचता रहा कि क्या सपना सच होगा ? उसी दिन उसके नाई के आने का दिन था । वह नियत समय पर आया । व्यापारी बैठकर उससे अपने बाल बनवाने ही वाला था कि दरवाजे पर ठक-ठक की आवाज हुई ।
व्यापारी ने उठकर दरवाजा खोला । दरवाजे पर वही सपने वाला भिक्षु मौन खड़ा था । व्यापारी ने दरवाजे के पीछे रखा डंडा उठाया और झट से भिक्षु के सिर पर जोर से वार किया । इसके साथ ही चमत्कार हुआ । वह मिश्र अशर्फियों के ढेर में बदल गया । व्यापारी की आखें चमक उठीं ।
उसने थैली लाकर सारी अशर्फियां उसमें भरी और थैली को एक ओर रख दिया । नाई भौचक्का होकर यह सब देखता रहा । नाई व्यापारी के बाल काटकर चला गया । भिक्षु और अशर्फियों के बारे में व्यापारी से कुछ पूछने की नाई की हिम्मत न हुई ।
अब व्यापारी के अकस्मात ही दिन फिर गए । उसने दोबारा से अपना व्यापार खड़ा किया । नई हवेली बनाई और पहले की भांति सम्मान व ठाठ से रहने लगा । उधर नाई के दिमाग में तूफान उठा था । कभी वह सोचता कि जो कुछ उसने देखा, वह एक सपना होगा या आखों का भ्रम ।
फिर कहता भ्रम नहीं हो सकता । उसी दिन के बाद तो वह व्यापारी एकदम अमीर बन गया । अब उसके दिल में एक बात जमने लगी कि बौद्ध भिक्षु अगर द्वार पर आए तो उसके सिर पर डंडा मारने से वह सोने की मुद्राओं में बदल जाता हे । भिक्षुओं में यह अलौकिक शस्ति होती होगी ।
नाई ने फैसला किया कि वह भी वही तरीका आजमाकर अमीर बन जाएगा । दूसरे दिन वह शहर के बाहर एक भिक्षुओं के आश्रम में गया । भिक्षु नाई को वहाँ देखकर चकराए, क्योंकि भिक्षु तो स्वयं एक दूसरे का सिर मूंडते थे । नाई ने भिक्षुओं के गुरु के पास जाकर अभिनन्दन किया और हाथ जोड़कर बोला : ”महाराज, मुझे भिक्षुओं को भोजन खिलाने की बहुत दिनों से साध थी ।
आप कल अपने सारे चेलों को लेकर मेरी कुटिया पर पधारें । मैं शहर का सबसे बढ़िया हलवाई लाकर मालपूड़े खीर-हलवा और दूसरे पकवान बनवाऊंगा ।” नाई ने यह सोच रखा था कि व्यापारी ने तो एक ही भिक्षु को स्वर्ण मुद्राओं में बदला था, पर वह दर्जनों भिक्षुओं को स्वर्ण मुद्राओं में बदलकर अपनी कोठरी भर लेगा । लालच के मारे वह अंधा हो चला था ।
उसके जाने के बाद गुरु ने कहा : ”यह नाई जिसने कभी भिक्षु को एक लोटा पानी नहीं पिलाया, वह पकवान क्यों खिलाने लगा । जरूर कुछ दाल में काला है । इसके घर जाना बुद्धिमत्ता नहीं होगी ।” दूसरे दिन भिक्षुओं की टोली नगर में भिक्षा मांगने गई ।
एक भिक्षु जो नाई की बातें सुन चुका था, दूसरे से बोला : ”भाई, कल वह नाई मालपूड़े आदि पकवानों की दावत दे रहा था । आह, मालपूड़े खाए बहुत वर्ष हो गए ।” दूसरे भिक्षु का दिल भी ललचा रहा था । उसने कहा : ”हां । नाई आदमी तो ठीक नहीं, परन्तु क्या पता उसके दिल में धम काय की इच्छा जाग गई हो ।
आदमी को बदलते देर नहीं लगती ।” तीसरा मिश्र बोला : “हां, उसके घर का भी एक चक्कर लगाने में कोई दोष नहीं है । हो सकता है, वह सचमुच की दावत दे रहा हो । कोई उसके द्वार न गया तो उसकी भक्ति और सेवाभाव का अनादर होगा ।”
इस प्रकार रास्ते में बात करते-करते चार-पांच भिक्षुओं ने नाई के घर जाने का मन बना लिया । नाई के घर में न कोई-हलवाई आया था और नही कोई पकवान बन रहे थे । वह तो दरवाजे के पीछे तेल पिलाया डंडा लेकर भिक्षुओं की प्रतीक्षा कर रहा था ।
बाहर कुछ खटका होते ही उसके कान खड़े हो जाते और वह डडा कसकर पकड़ लेता । आखिर दरवाजे पर दस्तक हुई । नाई ने धड़कते दिल से दरवाजा खोला । द्वार पर चार भिक्षुओं को देखकर उसकी औखें चमक उठीं । उसने आदर से भिसुओं को भीतर आने का संकेत दिया ।
जैसे ही चारों भिसु भीतर आए, उसने तड़ातड़ उनके सिरों परडँडामारना शुरू किया । भिक्षु चोट खाकर लहूलुहान होकर वहीं गिर पडे । चारों ओर खून ही खून बह निकला । जब कोई भिक्षु स्वर्ण मुद्राओं में न बदला तो उसने नीचे पड़े भिक्षुओं के सिरों में और जोर-जोर से डंडे मारे और उनके प्राण-निकाल दिए । मूर्ख नाई को राजा के सिपाहियों ने पकड़ लिया और उसे मृत्युदंड मिला ।
सीख : किसी कार्य का असली भेद जाने बिना उसे नहीं करना चाहिए ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 14
भविष्यवाणी |
कुछ समय पहले एक ज्योतिषी था । नाम था उसका जगन्नाथ । उसकी ज्योतिष विद्या बड़ी सच्ची दी उसकी भविष्यवाणी बड़ी स्टीक होती थी । एक बार वह अपनी किस्मत आजमाने वाराणसी नगर गया और एक मकान लेकर रहने लगा ।
संयोग से वहां के सेनापति का महल भी निकट में ही था । जगन्नाथ की तारीफ सुनकर एक दिन सेनापति ने अपना हाथ उसे दिखाया । जगन्नाथ ने हाथ देखकर गम्भीरता से कहा : “सेनापती, आपकी तो केवल एक सप्ताह आयु शेष है ।”
सेनापति बहुत घबराया उसने अपना हाथ अपने मित्र राजज्योतिषी गजानन को दिखाया और जगन्नाथ की भविष्यवाणी के बारे में बताया । गजानन था ढोंगी पंडित । आता-जाता उसे खाक नहीं था हाथ देखने का अभिनय कर वह बोला : “बात तो टकि है । पर मैं एक विशेष हवन क्य मून को टाल दूगा । तू बस किसी से क्रुछ न कहना ।”
गजानन ने सोचा अगर सेनापति मर गया तो भविष्यवाणी की बात गुप्त रहेगी । किसी को जगन्नाथ जे बारे में पता नहीं लगेगा । सेनापति न मरा तो उसी की जय-जयकार होगी और जगन्नाथ मरेगा । इस बात के सातवें टिन राजा व सेनापति शिकार खेलने गए ।
वहां एक बाघ ने सेनापति को मार डाला । राजा व प्रजा शोक में डूब गए । सेनापति बहुत वीर व योग्य पुरुष था । गजानन ज्योतिषी का मात्रा टनका । उसे लगा कि जगन्नाथ अपनी योग्यता से उसे हटाकर राजज्योतिषी बन सकता है । उसने जगन्नाथ का पत्ता साफ करने की चाल चली ।
गजानन राजा से बोला : ”महाराज । सेनापति की मुउत्यु नहीं आई थी, हमारे राज्य में कहीं से जगन्नाथ नामक एक दुष्ट आकर रह रहा है । वह ऐसा दुष्ट है कि जो अशुभ बात मुंह से निकाल देता है, वह सच हो जाती है । सेनापनिजी की मुउत्यु भी उसी के अशुभ वचन के कारण हुई है ।
सेनापतिजी ने यह बात खुद मुझे बताइ था ।” राजा क्रोधित हो उठा । तुरंत जगन्नाथ ज्योतिषी को बुलाया गया । उसने मगकार किया कि सेनापति के मृत्यु की भविष्यवाणी उसी ने की थी । गजानन मुस्कराया । राजा तलवार खींचकर जगन्नाथ से बोला : “दुष्ट ज्योतिषी, अब तू जरा अपना हाथ देख और बता कि तेरी मृत्यु कब की लिखी है ?”
जगन्नाथ सन्त रह गया । वह जान गया था कि राजा उसकी भविष्यवाणी गलत साबित करने पर उतारू है । वह अपनी मृत्यु भविष्य में बताएगा तो राजा उसे उसी समय मार देगा । उसी समय की बताएगा तो राजा शाम को मार देगा । जगन्नाथ चतुर भी था ।
उसने अपनी बुद्धि चातुर्य का सहारा लिया । अपना हाथ देखने का नाटक कर बोला : ”महाराज, आश्चर्य की बात है । मेरी मृत्यु आपकी मृत्यु से एक दिन पहले होगी ।” राजा ठंडा पड़ गया । जगन्नाथ मरता है तो राजा एक दिन बाद ही मरेगा । जगन्नाथ की चतुराई देखकर गजानन वहा से खिसक गया और राज्य छोड़ गया । राजा ने जगन्नाथ को राजज्योतिषी नियुक्त कर दिया ।
सीख : किसी विद्द्या के साथ-साथ व्यक्ति में बुद्धि भी होनी चाहिए, तभी विद्द्या फैलती है ।
Hindi Jatak Kathayen (Story) – 15
चतुर सियार |
एक जंगल में एक चतुर सुजान सियार रहता था । उसे एक दिन एक हाथी गड्ढे में गिरा नजर आया । वह गड्ढे के ऊपर बैठकर हाथी के प्राण निकलने की प्रतीक्षा करने लगा ।
रात होते-होते ठंड बढ़ने से हाथी के शरीर को कुछ ठंडक पहुंची तो जोर लगाकर वह उठ खड़ा हुआ और गड्ढे मे बाहर निकला, लेकिन फिर लड़खड़ाकर गिर पड़ा और उसने अन्तिम सांस ली । सियार ने लाश को चागें पोर से देखा । कहीं से उसके शरीर की चमड़ी इतनी कटी या फटी नहीं थी, जहा से सियार मुह घुसकर नरम मांस नोच सकता ।
सियार लाश के पास बैठकर युक्ति सोचने लगा । किसी तेज दात वाले बड़े जीव से हाथी की चमड़ी कटवानी भी होगी और फिर उसे मांस भी न खाने देना होगा । तभी उसे एक शेर उधर आता हुआ दिखाई पड़ा । सियार ने अदब से झुककर कहा : ”हजूर, यह हाथी मरा पड़ा था ।
मैंने सोचा कि यह तो जंगल के राजा के भोजन के लिए उत्तम रहेगा । यही सोचकर बैठा पहरा दे रहा था । महाराज अब आप इसका आहार कीजिए ।” शेर गुर्राया : ”मूर्ख, मरा जानवर खाना तुच्छ जीवों का काम है ।” इतना कह शेर चला गया । सियार ने चैन की सास ली ।
शेर के जाने के बाद वहां एक भेडिया आया । सियार बोला : ”चाचा, कया इस हाथी को खाने की सोच रहे हो ?” भेडिया गरजा : ”क्या तू मुझे रोक सकता है ?” सियार ने कंधे उचकाए : ”मैं तुम्हें रोकने वाला कौन होता हूं, चाचू ? पर न ही खाओ तो अच्छा रहेगा ।”
सियार भेड़िए के कान में बोला : “जंगल के राजा सिंह को पता लगा है कि भेड़िए जैसे श्रेष्ठ शिकारी भी गीदड़ों की तरह मरे हुए जानवरों का मांस खाने लगे हैं । वह ऊपर जो चील उड़ रही है, वह यही तो देख रही है कि कौन-कौन इस मरे हाथी को खाता है ।”
भेड़िए ने देखा वहां सचमुच एक चील मंडरा रही थी । फिर उसने वहां से फूटने में देर नहीं लगाई । तभी उसे दूर से एक चीता जाता नजर आया । युक्ति सूझते ही सियार लपककर चीते के सामने जा पड़ा और झुककर प्रणाम करके बोला : ”आपके पांव लगूँ कुंवर साहब । बहुत दिनों बाद दर्शन हुए ।”
चीते ने अकड़कर कहा : “तुम यहां क्या झख मार रहे हो ?” सियार ने हाथी की लाश की और इशारा किया और बताया : “उस हाथी को शेर राजा ने मारा और मुझे इसकी पहरेदारी पर बीठा दिया ।” ”ओह!” चीते ने ठंडी आह भरी और बोला: “यह शेरजी का शिकार है तो उनके आने से पहले ही यहां से चल देना चाहिए ।”
सियार ने आवाज़ दी : “कुंवरजी, अगर आपको हाथी का मांस खाने की इतनी ही इच्छा है तो खाइए न ।” चीता सिहर उठा : “न-न, सियार !” सियार ने चक्कर चलाया : “आपको चिन्ता करने की जरूरत नहीं कुंवरजी । मैं कह दूंगा कि एक बाघ आकर मुझे धमकाकर खा गया । बाघ मरेगा । आप हाथी को खाना शुरू कीजिए ।”
चीते ने एक ही झटके में अपने पैने दांतों से हाथी के पेट की चमड़ी चीर डाली । तभी सियार चिल्लाया : “कंवरजी ! कंवरजी गजब हो गया ।” सियार हकलाया : “श…शेर जी अ…आ रहे हैं ।” शेर का नाम सुनते ही चीता उछल पड़ा जैसे उसे किसी ने जोर से चाबुक मारा हो और वह वहां से ऐसे गायब हुआ जैसे गधे के सिर से सींग । सियार कई दिन तक हाथी का स्वादिष्ट मांस खाता रहा ।
सीख : चतुर अपनी बुद्धि को चतुराइ से दूसरों से अपना काम निकलवा लेता है ।