List of short stories on Money’s in Hindi!

Contents:

  1. शुचिमुखा पक्षी और बंदर |
  2. दुष्ट बंदर और बया पक्षी |
  3. कील उखाड़ने वाला बंदर |
  4. राजा चंद्र और बंदरों का मुखिया |


Hindi Story # 1 (Kahaniya)

शुचिमुखा पक्षी और बंदर |

बंदरों का एक समूह ऊंची पहाड़ी की ढलान पर घर बनाकर रहता था । जब सर्दी का मौसम आया, तो वहां बहुत ठंड पड़ने लगी । ढलान पर वर्षा पड़ने से सारी जगह गीली भी हो गई । बंदर ठंड से कांपने लगे और एक-दूसरे के पास गर्मी लेने के लिए आने लगे, परंतु इससे कोई फर्क नहीं पड़ा ।

अधिक सर्दी से उनके दांत किटकिटाने लगे । जब उनसे और सर्दी सहन न हुई, तो उन्होंने पहाड़ी के ढलान पर उगी कुछ लाल बेरी इकट्ठी की । उन्होंने बेरी का एक ढेर-सा बना लिया और उसमें कोयलों की तरह फूंक मारने लगे ।

एक शुचिमुखा नामक पक्षी वृक्ष के ऊपर बैठा बंदरों की सब हरन्पुतें देख रहा था । वह बोला : ‘अरे मूर्ख बंदरों ! जिन बेरियों को तुम कोयला समझ कर फूंक रहे हो, वे केवल लाल बेरी हैं । तुम इन पर अपनी सारी शक्ति क्यों खर्च कर रहे हो । ये तुम्हें ठंडी हवाओं से नहीं बचा सकेंगी ।

तुम अपने रहने के लिए गुफा में जाकर कोई अन्य स्थान क्यों नहीं खोज लेते ।’ एक बूढ़ा बंदर तत्काल बोला : ‘तुम हमारे कामों में क्यों दखल देते हो । तुम यहां से चले जाओ और हमें जो ठीक लगे करने दो ।’ परंतु शुचिमुखा ने बूढ़े बंदर की सलाह पर कोई ध्यान न दिया ।

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उसे लगा कि वह बंदरों को बड़े काम की सलाह दे रहा है और बिना रुके वह बोलता रहा । उसने बंदरों को बोलने का मौका भी नहीं दिया । आखिरकार जब बंदर बहुत तंग आ गए तो एक बंदर ने उछलकर पक्षी को पकड़ लिया और उसे चीर-फाड़ डाला । शुचिमुखा समाप्त हो गया, क्योंकि उसने बिना मांगे सलाह दी थी । इसलिए बिना मांगे किसी को सलाह नहीं देनी चाहिए ।


Hindi Story # 2 (Kahaniya)

दुष्ट बंदर और बया पक्षी |

किसी वन में एक ऊंचे और घने पेड़ पर बया पक्षी अपनी पत्नी के साथ घोंसला बनाकर रहता था । एक बार शरद ऋतु में मूसलाधार वर्षा शुरू हो गई, ऊपर से ठंडी हवा भी चलने लगी, लेकिन अपने घोंसले में सुरक्षित रूप से बैठे बया-दंपती पर न तो वर्षा का और न ही ठंडी हवा का कोई असर हुआ ।

दोनों घोंसले में बैठे आनंद से गाते-गुनगुनाते रहे । वर्षा कई दिनों तक होती रही, इससे वातावरण अत्यधिक ठंडा हो गया । एक दिन वर्षा से बचने के लिए एक बंदर न जाने कहां से आकर उस पेड़ के नीचे बैठ गया । बंदर बुरी तरह से भीगा हुआ था ।

ठंड के कारण उसके दांत बज रहे थे । वह बुरी तरह से कांप रहा था । ठंड से बचने के लिए उसने अपने दोनों हाथ अपनी कांखों में दबा रखे थे । बंदर की ऐसी हालत देखकर अपने घोंसले में बैठी मादा बया ने कहा : ‘बंदर महाशय ! ऐसी भयानक ठंड में कहां मारे-मारे फिर रहे हो न: यह वर्षा जल्दी रुकने वाली नहीं है ।

जल्दी से अपने घर जाओ और वहां जाकर विश्राम करो ।’ ‘मेरा कोई घर नहीं है ।’ बंदर बोला: ‘मैं तो पेड़ों पर ही रहता हूं ।’ ‘कितने अफसोस की बात है कि तुमने अभी तक रहने के लिए अपना घर भी नहीं बनाया मादा बया ने आश्चर्य करते हुए कहा : ‘अरे भाई ! तुम्हारे तो मनुष्यों की तरह हाथ और पांव भी हैं, फिर तुम क्यों नहीं अपना घर बना लेते ?

हमें देखो, हमारे तो हाथ भी नहीं हैं फिर भी अपनी चोंच और पंजों से तिनके चुन-चुनकर हमने कितना सुंदर घोंसला बना लिया है ।’ बंदर मादा बया की सीख सुनकर चिढ़ गया और बोला : ‘अरी मूर्ख चिड़िया अपनी जबान बंद रख । मेरी तो वैसे ही ठंड से हालत खराब हो रही है और तू है कि मुझे उपदेश दिए जा रही है ।’

लेकिन मादा बया न मानी, वह बंदर को बराबर नसीहतें देती रही । अब तो बंदर का धैर्य जवाब दे गया । वह उछल कर पेड़ पर चढ़ गया और तीन-चार छलांगें लगाकर बया के घोंसले के समीप पहुंच गया ।  ‘चूं-चूं की बच्ची ! बहुत देर से बड़-बड् किए जा रही है ।’ बंदर गरजा : ‘अंगुल भर की तो तू चिड़िया है, पर तेरी जबान गज भर की है । मेरी बेइज्जती करती है,

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बेवकूफ ! ठहर, अभी तुझे इसका मजा चखाता हूं ।’  यह कहकर बंदर ने एक ही झटके में उसका घोंसला तोड़कर फेंक दिया । बेचारे बया-दंपती रोते ही रह गए । बंदर उन्हें रोते-कलपते देखकर मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ, फिर वह पेड़ों पर छलांगें लगाता हुआ दूसरी जगह पर चला गया ।

किसी विद्वान व्यक्ति ने ठीक ही कहा है कि किसी मूर्ख व्यक्ति को कभी सीख मत दो । मूर्ख व्यक्ति को सीख देने का परिणाम अंतत: बुरा ही निकलता है ।  सीख उसी को दीजिए, जाको सीख सुहाय । सीख न दीजे बांदरा, न घर बया का जाय ।।


Hindi Story # 3 (Kahaniya)

कील उखाड़ने वाला बंदर |

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किसी धनी व्यापारी ने नगर की सीमा के पास एक भव्य देवमंदिर बनवाना आरंभ किया । इसके लिए उसने नगर के सर्वश्रेष्ठ कारीगर और राजमिस्त्री आदि नियुक्त किए । दिन भर कारीगर अपने काम पर जुटे रहते, पर दोपहर के समय वे भोजन करने के लिए नगर में चले आते ।

एक दिन अकस्मात बंदरों का एक झुंड इधर-उधर घूमता हुआ वहां आ पहुंचा । बंदर तो होते ही हैं चंचल प्रकृति के । वे कारीगरों द्वारा छोड़ी हुई चीजों से छेड़छाड़ करने लगे । कारीगरों में से कोई कारीगर एक आधे चिरे हुए लकड़ी के शहतीर के बीच एक कील गाड़कर चला गया था ।

उन बंदरों में से एक बंदर कौतूहलवश उस आधे चिरे शहतीर पर जा बैठा और उसमें लगी कील को उखाड़ने का प्रयास करने लगा । बंदर को ऐसा करते देख कुछ बंदरों ने उसे टोका : ‘अरे भाई ! तुम यह क्या कर रहे हो ? उस कील को मत उखाड़ना, नहीं तो चोट खा जाओगे ?’ बंदर बोला : ‘मैं यह जानना चाहता हूं कि यह कील इस लकड़ी में क्यों गड़ी हुई है ?’ बंदर ने कील पर जोर आजमाइश की, तो कील उखड़कर उसके हाथ में आई, पर ऐसा करते ही शहतीर के चिरे हुए दोनों भाग एक दूसरे से जा जुड़े ।

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बंदर के अंडकोश उस चिरे हुए भाग में दब गए और दर्द के कारण वह चीत्कार करने लगा । उसने बहुत प्रयास किया, किंतु अंडकोशों को शहतीर के बीच से न निकाल सका । अंत में तड़प-तड़पकर उसकी मृत्यु हो गई । अनधिकार चेष्टा करने का ऐसा ही परिणाम होता है ।


Hindi Story # 4 (Kahaniya)

राजा चंद्र और बंदरों का मुखिया |

बहुत समय पहले चंद्र नामक राजा राज्य किया करता था । राजा के पुत्र को बंदर पालने का बहुत शौक था । उसने राजा के महल में बहुत से बंदर पाल रखे थे ।

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इन बंदरों का मुखिया बहुत चालाक, नीतिवान और समझदार था । वह अपने झुंड के सभी बंदरों को सही सलाह देता था । कुछ दिन बाद महल में एक जोड़ा मेढ़ा भी आ गया । यह जोड़ा बग्घी खींचता था । इनमें से एक बड़ा ही पेटू था ।

वह जब-तब अवसर देखकर राजा की रसोई में घुस जाता और कुछ भी खा जाता । उसकी हरकतों से रसोइया परेशान था । जब कभी मेढ़ा उसकी उपस्थिति में रसोई में घुसता, तो वह चिमटा, डंडा, बेलन जो भी हाथ आता, उसी से पिटाई कर देता ।

बंदरों के राजा ने जब यह देखा, तो उसने काफी आगे का भी अनुमान लगा लिया कि रसोइया और मेढ़ा की इस लड़ाई का क्या परिणाम हो सकता है ? उसने सोचा : ‘कहीं रसोइया और मेढ़ा की लड़ाई हम बंदरों तक आ गई तो ?’

रसोइया अकसर मेढ़े पर कुछ भी फेंक देता था, यहां तक की गर्मा-गर्म चीज भी । बंदरों के राजा ने सोचा : ‘मान लो किसी दिन रसोइये ने मेढ़े पर कोई जलती चीज गुस्से में फेंक दी तो ! मेढ़े के शरीर पर तो रोएं हैं, वह जलने लगेंगे, तब मेढा बचने के लिए अस्तबल की ओर भागेगा, वहां सूखी घास है ।

घास में आग लग जाएगी, इससे घोड़े भी जल जाएंगे । घोड़ों के उपचार के लिए जब वैद्य आएगा, तो वह दवा के रूप में घोड़ों के लिए बंदरों की चरबी मांगेगा, तब राज्य के सारे बंदर मारे जाएंगे ।’  मुखिया बंदर को इस तरह आने वाले घटनाक्रम का आभास हुआ, तो उसने राजा के बाग में सभी बंदरों की सभा बुलाई और फिर कहा : ‘भाइयों ! रसोइये और मेढ़े की लड़ाई में हमारी जान खतरे में है ।

हमारी भलाई इसी में है कि हम यह जगह छोड़कर चले जाएं ।’ मुखिया की बात सुनकर बाकी बंदर हंसने लगे : ‘अरे मेढ़ा और रसोइये की लड़ाई से भला हमारा क्या वास्ता ? मुखिया जी, आप तो बूढ़े और पागल हो गए हैं’ कुछ बंदर कहने लगे : ‘इतना अच्छा महल छोड़कर हम क्यों जाएं ? देखो तो, राजकुमार हमें कितना बढ़िया खाना खिलवाता है ।

आहा कितने स्वादिष्ट व्यंजन बनते हैं यहां । जंगल जाएंगे तो बस फल ही फल  मिलेंगे !’ सारे बंदर ‘खी’ ‘खी’ करके मुखिया की खिल्ली उड़ाने लगे । यह देख मुखिया ने फिर चेताया : ‘तुम लोग नासमझ हो ! इस तले-भुने भोजन का लालच तुम्हें मरवा देगा ।

यह भोजन आखिर में जहर सिद्ध होगा । मैं अपनी आखों के सामने अपने लोगों का अंत नहीं देख सकता, इसलिए मैं तो जंगल में जा रहा हूं ।’ यह कहकर मुखिया बंदर बड़ा उदास होकर जंगल की ओर कूच कर गया । अभी ज्यादा दिन नहीं बीते थे कि एक दिन मेढ़ा खाने में मुंह मारने की नीयत से रसोई में घुसा ।

उस समय रसोइया चूल्हा फूंक रहा था । जैसे ही उसने मेढ़े को अंदर देखा, जलती लकड़ी उठाकर उस पर फेंक दी । मेढ़े का शरीर ‘धूं’ ‘धूं’ करके जलने लगा । जलता हुआ मेढ़ा अब आग बुझाने की हड़बड़ाहट में घोड़ों के अस्तबल में जा घुसा ।

वहां सूखी घास बहुत थी । वह घोड़ों को पसंद थी, इसलिए उसका भरपूर ढेर लगा था । मेढ़े के वहां पहुंचने से उसमें आग लग गई । अब पूरा अस्तबल जलने लगा । कई घोड़े जल मरे । कुछ की आखें जल गई, तो कुछ अधजली हालत में नगर की ओर भाग निकले, जिससे वहां भगदड़ मच गई ।

जब राजा को यह सूचना मिली, तो वह बड़ा दुखी हुआ । उसके अस्तबल के कई घोड़े बडे महंगे थे । उसने तत्काल राजवैद्य को बुलवाकर और जले घोड़ों के उपचार की आज्ञा दी । राजवैद्य ने राजा को बताया : ‘महाराज ! जले घोड़ों के उपचार के लिए तो बंदरों की चरबी की आवश्यकता है ।

अगर आप उपलब्ध करा दें, तो मैं उपचार आरंभ करूं ।’ राजवैद्य की सलाह पर राजा ने आज्ञा जारी की कि बगीचे सहित राज्य के सारे बंदर मारकर उनकी चरबी राजवैद्य को पहुंचाई जाए । बस, फिर क्या था । बंदरों की शामत आ गई ।

उन्हें पकड़-पकड़कर मारा जाने लगा । अब उन्हें अपने मुखिया के वोल और सीख याद आने लगी, पर अब सिवाए मृत्यु के कोई चारा भी तो नहीं था । आखिर सारे बंदर मार दिए गए । उधर जंगल में मुखिया बंदर को जब राजा द्वारा अपने रिश्तेदार बंदरों की हत्या कराए जाने की सूचना मिली, तो वह बहुत दुखी हुआ ।

उसने खाना-पीना छोड़ दिया । अब वह यहां-वहां भटकता और एक ही बात सोचा करता कि ‘कैसे ! राजा से बदला लिया जाए ?’ एक दिन घूमते हुआ वह पानी पीने एक तालाब के किनारे पहुंचा । वहां कमल के बड़े-बड़े फूल खिले थे ।

उसने तालाब के पास देखा कि वहां कुछ जानवरों और लोगों के चिन्ह बने हैं, जो तालाब कि ओर तो जाते हैं, पर वापसी के नहीं हैं । मुखिया बंदर बड़ा नीतिवान था । वह भांप गया कि जरूर तालाब में कोई भयानक प्राणी रहता है, जो पानी आने वालों को चट कर जाता है ।

बंदर कई दिनों से प्यासा था, इसलिए उसने बड़ी सावधानी से काम लिया और कमल की एक शाखा तोड़कर उसकी नली को तालाब में डाला और मुंह से पानी खींचकर अपनी प्यास बुझाई, तभी तालाब में कोई भयानक प्राणी रहता है, जो पानी पीने आने वालों को चट कर जाता है ।

बंदर कई दिनों से प्यासा था, इसलिए उसने बड़ी सावधानी से काम लिया और कमल की एक शाखा तोड़कर उसकी नली को तालाब में डाला और मुंह से पानी खींचकर अपनी प्यास बुझाई, तभी तालाब में रहने वाला एक बड़ा प्राणी बाहर आया ।

उसका मुंह विशाल था और गले में अमूल्य रत्नों की माला थी । आते ही उसने  कहा : ‘यहां जो भी पानी पीने आता है, मैं उसे खा जाता हूं लेकिन तुम्हारी सूझबूझ से मैं प्रभावित हूं । मांगो, तुम क्या मांगते हो ?’ मुखिया बंदर तो जैसे ऐसे ही मौके की प्रतीक्षा में था ।

उसने कहा : ‘अगर तुम मुझे अपनी यह मूल्यवान माला कुछ दिन के लिए दोगे, तो मैं उसका लालच दिखाकर अपने शत्रुओं को इस तालाब तक ले आऊंगा । फिर तुम उन्हें खा सकते हो ।’  उस प्राणी को बंदर की बात जम गई । उसने तुरंत रत्नों की माला बंदर को दे दी ।

बंदर ने उसे गले में पहना और कूदता हुआ राजा चंद्र के यहां जा पहुंचा । राजा के राज्य में जब लोगों ने मुखिया बंदर को देखा, तो पूछने लगे : ‘मुखियाजी कहां थे इतने समय से ? यह कीमती हार तुम्हें कहां से मिला ?’

बंदर ने लोगों को बताया : ‘यह माला मुझे खुद खजाने के राजा कुबेर ने दी है । कुबेर ने जंगल में एक गुप्त तालाब बनवाया है, वहीं उसका खजाना है । रविवार को जब आधा सूर्य उगा हो, तब तालाब में स्नान करने पर ऐसा हार पुरस्कार स्वरूप मिलता है ।’

बंदर से हार का राज सुनकर लोग लालच में उमड़ने लगे । जब यह बात राजा को मालूम हुई, तो उसने बंदर को बुलवाकर पूछा : ‘क्या वह तालाब हीरों से भरा है ? अगर ऐसा है, तो सबसे पहले अपने परिजनों के साथ मैं वहां जाऊंगा ।’

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बंदर बोला : ‘हां महाराज !’ अब राजा भी लालच में आ गया । वह अपने पूरे परिवार के साथ तालाब की ओर चल पड़ा । राजा ने बंदर को गोदी में उठा रखा था । रानी, मंत्री वगैरह उसकी पीठ सहला रहे थे । जैसे ही तालाब आया, बंदर ने कहा : ‘जब सूर्य आधा उगा हो, तब आप सब एक-एक करके इस ओर से तालाब में जाना और दूसरी ओर से निकलते जाना ।

लेकिन राजा साहब आप मेरे साथ आइये, मैं आपको अलग रास्ते से स्नान कराऊंगा ।’  राजा उसकी बातों में आकर एक तरफ हो लिया, जबकि उसका परिवार और बाकी लोग तालाब में चले गए पर लौटे नहीं । उस प्राणी ने उन सबको खा लिया ।

जब काफी देर तक रानी, राजकुमार, मंत्री-संत्री आदि नहीं लौटे, तो राजा ने मुखिया बंदर से पूछा : ‘यह लोग इतनी देर क्यों लगा रहे हैं ?’ राजा के यह पूछते ही मुखिया बंदर जल्दी से एक पेड़ पर चढ़ गया और वहीं से जोर से बोला : ‘दुष्ट राजा ।

तालाब में रहने वाले प्राणी ने तुम्हारे पूरे परिवार को खा लिया है । तुमने मेरा परिवार मिटाया, इसलिए मैंने तुमसे उसका बदला ले लिया । तुम्हें मैंने इसलिए छोड़ दिया, क्योंकि तुम कभी मेरे स्वामी रहे हो ? जैसी करनी वैसी भरनी ।’

मुखिया बंदर के मुख से अपने परिवार के सर्वनाश की बात सुनकर राजा ने अपने को बहुत कोसा और रोता-रोता अकेला वापस अपने राज्य को लौट गया ।


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