Read these 4 Essays on ‘Gender Inequality’ in Hindi

Essay # 1. जेण्डर का अर्थ:

स्त्री एवं पुरुष में यदि अन्तर देखें तो कुछ वे अंतर दिखायी देते हैं जो शारीरिक होते हैं, जिन्हें हम प्राकृतिक अन्तर कहते हैं । इसे लिंग भेद भी कहा जा सकता है किन्तु अधिक अन्तर वे हैं, जिन्हें समाज ने बनाया है ।

चूँकि इस अंतर को समाज ने बनाया है, अत: ये अंतर वर्ग, स्थान व काल के अनुसार बदलते रहते हैं । इस सामाजिक अंतर को बदलने वाली संरचना को जेण्डर कहा जाता है । इसे हम ‘सामाजिक लिंग’ कह सकते हैं ।

जेण्डर शब्द महिला और पुरुषों की शारीरिक विशेषताओं को समाज द्वारा दी गई पहचान से अलग करके बताता है । जेण्डर समाज द्वारा रचित एक आभास है जिससे महिला-पुरुष के सामाजिक अंतर को उजागर किया जाता है । अक्सर भ्रांतियों के कारण जेण्डर शब्द को महिला से जोड़ दिया जाता है ।

जैसे- शिक्षा से सम्बन्धित एक कार्यशाला में चर्चा चल रही थी कि गांव से पाठशाला दूर है तथा बीच में गन्ने के खेत एवं थोड़ा सा जंगल है तो शिक्षा की व्यवस्था कैसी होगी ? तब एक प्रतिभागी ने उत्तर दिया कि बालकों को तो कोई समस्या नहीं होगी किन्तु बालिकाओं को समस्या आयेगी । वह इतनी दूर कैसे जायेगी, उसकी सुरक्षा से सम्बन्धित समस्याएं आयेंगी ।

अत: जेण्डर शब्द के अन्तर्गत निम्न बातों का समावेश होता है:

1. यह महिला एवं पुरुष के बीच समाज में मान्य भूमिका एवं सम्बन्धों की जानकारी देता है ।

2. यह सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक तथ्यों तथा सम्बन्धों की व्यवस्था की ओर इंगित करता है ।

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3. यह महिला एवं पुरुष की शारीरिक रचना से अलग हटकर दोनों को ही समाज की एक इकाई के रूप में देखता है तथा दोनों को ही बराबर का महत्व देता है तथा यह मानता है कि दोनों में ही बराबर की क्षमता है ।

4. यह एक अस्थाई सीखा हुआ व्यवहार है जो कि समय, समाज व स्थान के साथ-साथ बदलता रहता है ।

5. जेण्डर सम्बन्ध अलग-अलग समाज एवं समुदाय में अलग-अलग हो सकते हैं, तथा सामाजिक एवं सांस्कृतिक सन्दर्भों को समझ कर अभिव्यक्त किये जाते हैं ।

उदाहरण स्वरूप मानव जीवन में नीचे दर्शाये गए पहलुओं को जेण्डर परिभाषित करता है:

१. वेशभूषा एवं शारीरिक गठन:

i. स्त्री एवं पुरुषों की वेशभूषा समाज एवं संस्कृति तय करती है जैसे घाघरा, सलवार सूट, धोती-कुर्ता, पैंट शर्ट, जनेऊ, मंगल सूत्र का प्रयोग आदि ।

ii. स्त्री एवं पुरुष के शरीर का गठन कैसा होगा । अक्सर यह भी संस्कृति एवं समाज तय करता है, जैसे- छोटे बाल, बड़े बाल, मोटा, पतला, गोरा, काला आदि होना ।

२. व्यवहार:

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i. बालक-बालिका, स्त्री पुरुष के बोलने का ढंग, उठना बैठना, हंसना बोलना एवं चलना आदि समाज एवं संस्कृति के मानदण्डों के आधार पर तय होता है ।

ii. बड़ों का आदर करना, बड़ों के समक्ष बोलना इत्यादि समाज द्वारा निर्धारित मानदण्डों के अनुसार ही तय होता है ।

३. भूमिका:

i. स्त्री एवं पुरुषों की अलग-अलग भूमिकाएं हैं, जैसे- माँ, पिता, गृहणी आदि ।

ADVERTISEMENTS:

४. कर्तव्य एवं अधिकार:

एक लड़की तथा एक लड़के के विकास के साथ-साथ उसके कर्तव्य एवं अधिकारों में परिवर्तन होता रहता है एवं यह सब कुछ तय होता है समाज एवं संस्कृति के मानदण्डों के आधार पर । उपरोक्त स्थितियों को देखने के साथ-साथ एक बात पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है कि जेण्डर क्या नहीं है ।

जैसे कि:

ADVERTISEMENTS:

i. जेण्डर शब्द से केवल महिला ही प्रदर्शित नहीं होती है ।

ii. यह पुरुषों को शेष समाज से अलग नहीं देखता है ।

iii. जेण्डर का तात्पर्य सिर्फ नारीवाद नहीं है ।

iv. यह केवल महिलाओं की समस्या को नहीं देखता ।

ADVERTISEMENTS:

v. इसके अन्तर्गत सिर्फ महिलाओं की बात नहीं होती ।

vi. यह लिंग का पर्यायवाची नहीं है इत्यादि ।


Essay # 2. जेण्डर सम्बन्ध विश्लेषण:

जेण्डर सम्बन्ध विश्लेषण एक व्यवस्थित दृष्टिकोण है, इसके जरिए पुरुष व महिलाओं की अलग-अलग भूमिकाओं के कारण, उन पर विकास के अलग-अलग पड़ने वाले प्रभावों एवं परिणामों का अन्दाजा लगाया जा सकता है और उन्हें समझा जा सकता है ।

जेण्डर भूमिकाओं के असर से श्रम का बँटवारा होता है तथा जेण्डर आधारित श्रम विभाजन के चलते वर्तमान सम्बन्ध यथास्थिति बने रहते हैं और संसाधन, लाभ तथा जानकारियों तक पहुँच व निर्णय प्रक्रिया की मौजूदा स्थिति मजबूत बनी रहती है ।

जेण्डर भूमिकाएँ जीवन के हर पक्ष में मिलती हैं इसलिए सार्थक विश्लेषण करने के लिए घर, बाहर तथा कार्यक्रमों के अलग-अलग अवयवों पर विशेष ध्यान दिए जाने वाले क्षेत्रों, जैसे- स्वास्थ्य, आर्थिक विकास, शिक्षा, मानवीय सहायता आदि की सीमाएं पार करते हुए जेण्डर हितों को परखना पड़ेगा । यद्यपि जेण्डर अंतर, जीवन के आरम्भ से ही व्यक्तिगत पहचान की परिभाषा तय करना शुरू कर देते हैं, इसलिए जेण्डर सम्बन्ध विश्लेषण को हर आयु पर लागू करना चाहिए और यह संगत भी है ।

पितृसत्ता:

पितृसत्ता का स्वरूप हर जगह एक जैसा नहीं होता । इतिहास के अलग-अलग कालखण्ड में अलग-अलग समुदाय, समाज तथा वर्गों में इसका स्वरूप भले ही भिन्न हो किन्तु छोटी-मोटी विशेषताएं वही रहती हैं तथा पुरुषों के नियंत्रण का स्वरूप भले ही अलग-अलग हो किन्तु उनका नियंत्रण एवं वर्चस्व तो रहता ही है ।

प्राचीन काल के इतिहास पर यदि एक नजर डालें तो पता चलता है कि जेण्डर भेदभाव की उत्पत्ति एक ऐतिहासिक समय से हुई । पुरातत्वकालीन मूर्तियों एवं प्राप्त चित्रों से पता चलता है कि महिलाओं की प्रजनन शक्ति का पूजन किया जाता है लेकिन किसी कारणवश यह श्रद्धा और भक्ति की भावना बदलकर दमन और शोषण बन गयी ।

इस बदलाव के पीछे संभवत: यह कारण था कि जब निजी सम्पत्ति की उत्पत्ति हुई तब महिला पर पुरुष की सत्ता बन गई । पुरुषों ने अपने ही वंश को सुनिश्चित करने के लिए ‘विवाह प्रथा’ को शुरू किया जिसके अन्तर्गत एक महिला केवल एक ही पुरुष के साथ सम्बन्ध रख सकती है, जिससे संतान के पिता का पता हो इससे पितृसत्ता की उत्पत्ति हुई । मानव जीवन के प्रारम्भ के इतिहास में ऐसा भी युग हुआ होगा जब वर्ग एवं लिंग के आधार पर कोई असमानता नहीं होगी ।

प्रसिद्ध समाजशास्त्री ऐंजलस ने समाज के विकास को तीन कालखंडों में विभाजित किया है:

1. जंगली युग,

2. बर्बरता का युग,

3. सभ्यता का युग ।

1. जंगली युग:

मनुष्य जंगलों में लगभग जानवरों की तरह रहता था । शिकार करके खुराक इकट्ठा करना यही उसकी दिनचर्या थी, उस समय में विवाह प्रथा या फिर निजी सम्पत्ति नाम की कोई वस्तु नहीं हुआ करती थी तथा मानव का वंश माँ के नाम से चलता था । स्त्री या पुरुष आवश्यकता पड़ने पर अपनी इच्छा से यौन सम्बन्ध स्थापित कर सकते थे ।

2. बर्बरता युग:

i. इस युग में मानव का विकास हुआ तथा शिकार करके खुराक इकट्ठा करने की गतिविधियों के साथ-साथ कृषि एवं पशुपालन के कार्यों का भी विकास हुआ । पुरुष शिकार करने दूर-दूर तक जाते थे, उस समय बच्चों, पशुओं, कृषि तथा आवास की देखभाल की जिम्मेदारी महिलाओं पर होती थी । इसी समय से लिंग पर आधारित श्रम विभाजन की शुरुआत हुई ।

ii. इस समय अंतराल में सत्ता औरतों के पास थी । वंश (कबीला या सगोत्री पर समुदाय की औरतों का नियंत्रण था ।

iii. पुरुषों ने जब से पशुपालन कार्य की शुरुआत की, तो उनको गर्भधारण की प्रक्रिया का महत्व समझ में आया, शिकार एवं शस्त्र विकसित किए गये, लोगों को जीतकर गुलाम बनाया गया । कबीलों ने ज्यादा से ज्यादा पशुओं एवं गुलामों (विशेष रूप से स्त्री गुलामों) पर कब्जा करना प्रारम्भ कर दिया ।

iv. पुरुष ताकत के बल पर दूसरों पर सत्ता जमाने लगे तथा पशु एवं गुलामों के रूप में ज्यादा से ज्यादा सम्पत्ति इकट्ठी करने लगे । इन सबके कारण निजी सम्पत्ति अस्तित्व में आई ।

v. ज्यादा से ज्यादा सम्पत्ति अपनी ही संतान को मिले, ऐसी सोच का विकास हुआ तथा बच्चा पुरुष का अपना ही है, इसकी जानकारी के लिए यह जरूरी हुआ कि औरत किसी भी एक पुरुष के साथ ही शारीरिक सम्बन्ध रखे ।

vi. इस तरह के उत्तराधिकार पाने के लिए मातृत्व अधिकार को नकार दिया गया ।

vii. पिता के अधिकार को चिर स्थायी बनाने के लिए पुरुषों ने एक ही कबीले में रहकर महिलाओं की यौनिकता को सीमित करने के लिए एवं उनका सारा ध्यान एक ही पुरुष पर केन्द्रित करने के लिए उनके अन्दर एक विशेष मानसिकता पैदा की गई ।

यह सब कुछ धर्म, शिक्षा, संस्कार, गाथा-कविताओं आदि के सहारे किया गया जिससे कि महिलाएं धीरे-धीरे अपनी अधीनता को अपना गौरव मानने लगी । पति के लिए भूखे रहना, उसकी हर प्रकार से सेवा करना, उन्हीं के सुख की चिन्ता करना और अपने बारे में कभी नहीं सोचना, इसी को औरत का धर्म कहकर महिलाओं ने सब कुछ नकार दिया ।

इस प्रवृत्ति को धर्म ने और बढ़ावा दिया । संस्कृति तथा कला ने भी इसी से सम्बन्धित चित्र सामने रखे । घरेलू व औपचारिक शिक्षा ने यही सिखलाया । कानून ने भी इसे बनाये रखा और मीडिया ने भी इसी परिप्रेक्ष्य में बात की । परिणामस्वरूप महिला पर अधिकार या तो उसके पति का होगा या फिर उसके भाई, ससुर, पिता, जेठ या बड़े बेटे का । महिला के जीवन के सारे महत्वपूर्ण निर्णय इन्हीं पुरुषों के द्वारा ही लिए जाने लगे ।

3. सभ्यता युग:

धीरे-धीरे सामाजिक एवं आर्थिक रूप से महिलाएं पुरुषों पर निर्भर होती गई । वंशानुगत सम्पत्ति पर अधिकार बनाये रखने के लिए तथा वंश को चलाने वाले उत्तराधिकारी को जन्म देने के लिए औरतों को घर की चारदीवारी में मर्यादित किया गया ।

साथ ही साथ एक पत्नी वाला परिवार ‘पुरुष प्रधान परिवार’ में परिवर्तित हो गया, जहाँ पर पत्नी के द्वारा घर पर किया जाने वाला श्रम, निजी सेवाओं, में बदल गया एवं पत्नी एक दासी बन गई । इन सबके परिणामस्वरूप जेण्डर भेदभाव सबके अंतर गहराई से फैला हुआ है चाहे वे महिला हों या पुरुष । इसकी जड़ इतने अतीत में है कि इसे मिटाने का काम एक दिन में नहीं हो सकता ।

जेण्डर भेदभाव के कुछ अपवाद भी हैं । कही-कहीं समाज में महिलाओं को अलग दर्जा प्राप्त है, जैसे केरल और मेघालय में देखने को मिलता है । इन प्रदेशों में कुछ जातियाँ ऐसी हैं जिनके समाज में पुरुष शादी के बाद महिला के घर आकर रहने लगते है ।

इन जातियों में महिलाओं की स्थिति कुछ अच्छी है क्योंकि इन्हें अपना घर नहीं छोड़ना पड़ता है । लेकिन सारे अधिकार पति के हाथ में ही रहते हैं । मातृसत्तात्मक समाज में हलांकि सम्पत्ति लड़की को मिलती है परन्तु उस पर नियंत्रण भाईयों या मामाओं का होता है ।

बेटियाँ सम्पत्ति की मालिक न होकर संरक्षक होती है । उन्हें वह पूर्ण आजादी नहीं है जो अन्य समाजों में पुरुषों को मिलती है । मातृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के मुखिया होने के बावजूद उन्हें अधिकार काफी कम है ।

एक पूर्णतया मातृसत्तात्मक समाज उस समाज को कहते हैं जहाँ महिलाओं को पूर्ण अधिकार प्राप्त हों और उनके हाथ में सत्ता हो, धार्मिक संस्थाएं, आर्थिक व्यवस्था, उत्पादन, व्यापार सभी कुछ पर उनका नियंत्रण भी रहे ।

महिलाओं का उत्थान एवं पतन:

चरण १- आदिम समाज:

a. अपेक्षाकृत अधिक जेण्डर समानता,

b. मातृ वंशात्मकता,

c. प्रजनन में पुरुष भूमिका की जानकारी न होना,

d. सार्वभौम रूप से माता की पूजा,

e. स्त्री की शारीरिक प्रक्रियाओं का आदर, अशुद्ध मानकर घृणा नहीं ।

चरण २- एक ही जगह बसना:

a. जनसंख्या वृद्धि,

b. आदिम खेती-बाड़ी और पशु पालन की बेहतर तकनीक,

c. प्रजनन में पुरुष भूमिका की समझ ।

d. जमीन व अन्य प्राकृतिक संसाधनों के लिए होड़,

e. युद्ध में पुरुषों को भेजना,

f. व्यक्तिगत सम्पत्ति का आरम्भ ।

चरण ३- पितृवंशात्मकता / पितृसत्तात्मकता:

बच्चें जैविकीय रूप से उनके हैं, यह सुनिश्चित करने के लिए पुरुषों ने महिलाओं की यौनिकता और प्रजनन पर नियंत्रण किया ।

a. सत्ता और पवित्रता की विचारधारा ।

b. आने-जाने पर बन्धन / अलग-अलग रहना ।

c. आर्थिक स्वतंत्रता से दूर रखना ।


Essay # 3. जेण्डर का उदय:

समाज में जेण्डर को बनाने वाले दो अलग-अलग आयाम हैं:

i. मानसिकता एवं विचारधारा,

ii. शक्ति का विभाजन/बँटवारा ।

i. मानसिकता एवं विचारधारा:

मानव समाज में कभी-कभी कहीं-कहीं किसी सामाजिक वर्ग की एक विशेष मानसिकता होती है । जो यह तय करती है कि महिलाओं और पुरुषों में क्या सामाजिक अंतर होने चाहिए । यह मानसिकता कई कारणों से प्रभावित होकर बनती हैं, जैसे- धर्म, मानव व्यवहार, शिक्षा व्यवस्था, कानून, भौगोलिक क्षेत्रफल, मीडिया, बाजार, परिस्थितियों इत्यादि ।

इस तरह की मानसिकता पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तान्तरित होती जाती है । यह बचपन से ही डाले गए संस्कारों द्वारा सीखी जाती है तो कुछ सामाजिक परम्पराओं के रूप में हमेशा उसी विचारधारा को याद दिलाती  हैं । इस तरह की विचारधारा के अन्तर्गत प्रारम्भ से ही यह माना जाता है कि महिला-पुरुष से कमजोर होती है, उसकी क्षमताओं में कमी होती है और उसका जीवन तभी सार्थक होगा जब वह किसी पुरुष की सेवा करेंगी ।

इस तरह की मानसिकता एवं विचारधारा के आधार पर महिलाओं एवं पुरुषों की समाज में अलग-अलग भूमिकाएँ निर्धारित हो जाती हैं एवं दोनों के लिए ही अलग-अलग व्यवहार एवं बोलचाल का तरीका भी तय होता है ।

उदाहरणार्थ:

1. पुरुष घर के बाहर के काम करेगा ।

2. महिला घर में रहकर काम करेगी ।

3. पति चाय की दुकान पर बैठ सकता है या मित्रों के घर जाकर देर से आ सकता है ।

4. पत्नी किसी के साथ बैठकर बातचीत करती हुई या जोर से हँसती हुई नहीं दिखनी चाहिए । यदि इस तरह की पूर्व निर्धारित भूमिकाओं / व्यवहार को बदला जाता है तो यह समुदाय में चर्चा का विषय बन जाता है ।

उदाहरणस्वरूप:

a. कोई महिला कहे कि वह बच्चों की देखभाल नहीं करना चाहती ।

b. पुरुषों द्वारा घर का काम करना या फिर किसी बात पर आँसू बहाना आदि ।

ii. शक्ति का विभाजन/बँटवारा:

महिलाओं एवं पुरुषों के बीच अंतर को बनाये रखने के लिए शक्ति या ताकत के बहुत सारे साधन हैं, जैसे- धनी / सम्पत्ति, जानकारी / शिक्षा, कार्यक्षमता / कार्यशक्ति आदि । प्रत्येक साधन के स्वामित्व से ताकत मिलती है तो यह ताकत अन्य साधनों तक पहुँच बढ़ाती है । इनमें से अधिकांश संसाधनों पर पुरुषों का नियंत्रण है तथा सत्ता मुख्य रूप से पुरुषों के ही हाथ में होती है ।

उदाहरणार्थ- पहाड़ों पर महिलाएं अधिक काम का बोझ सम्भालती हैं, लेकिन उनके हाथ में पैसे नहीं रहते क्योंकि बाजार पुरुष के नियंत्रण में रहता है, जैसे कि खेतों में अनाज का उत्पादन महिलाओं के द्वारा किया जाता है किन्तु उसके बेचने का काम परिवार के पुरुष सदस्य करते हैं ।

घर की आय, पुरुषों के नाम होती है । महिला को घर के काम-काज को सम्भालना है, अत: उसे अधिक पढ़ाई की आवश्यकता नहीं है । वह अखबार अथवा मैगजीन पढ़ती हुई या खाली बैठकर रेडियो सुनती हुई नहीं दिखनी चाहिए ।

अपना ज्ञान बढ़ाने हेतु वह स्वतंत्र रूप से कहीं नहीं जा सकती क्योंकि उसके समय एवं दिनचर्या पर पुरुषों का ही नियंत्रण रहता है । उपरोक्त उदाहरण से यह स्पष्ट होता है कि स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक अंतर बना ही रहता है ।

जेण्डर को कौन बनाये रखता है ?

यह एक तरह से उलझाने वाला प्रश्न है क्योंकि इसके साथ ही कुछ अन्य प्रश्न भी उठ खड़े होते हैं ।

जैसे:

1. क्या महिलाएं ही इस अन्याय को बनाए रखती हैं ?

2. क्या महिला ही महिला का शोषण करती हैं ?

3. क्या हर चीज के लिए पुरुष ही जिम्मेदार है ?

4. इस जेण्डर भेदभाव को आज तक कम क्यों नहीं किया जा सका ?

5. महिलाओं ने इसे खत्म क्यों नहीं किया ?

इस तरह क प्रश्नों के बहुत सारे उत्तर भी समाज से ही निकल कर आते हैं, जैसे:

i. महिलाओं में आत्मविश्वास नहीं है, भय है ।

ii. महिलाओं में असफलता का डर है, लोकलज्जा है ।

iii. महिलाओं में एकता नहीं है, संघर्ष की क्षमता नहीं है ।

iv. महिलाओं को अन्याय का पूरा एहसास नहीं है ।

वैसे देखा जाए तो समाज के दबे वर्ग में दो तरह की विशेषताएं पाई जाती हैं, चाहे वो महिला हो या दलित । उस वर्ग के सदस्यों पर कोई प्रत्यक्ष रूप से दबाव नहीं दिखता, लेकिन उसके मन में समाज के नियम तोड़ने का दुस्साहस करने की हिम्मत जुटाना उनकी सोच के बाहर है ।

यहाँ तक कि वे अन्याय के बारे में सोचते तक नहीं है और उसे सहते रहना जीवन की नियति मानते हैं । उस वर्ग के लोग स्वयं ही अपनी अगली पीढ़ी को दबे रहना सिखाते हैं । शोषण की परम्परा को अनायास वे स्वयं ही आगे बढ़ाते हैं ।

वे अपनी अगली पीढ़ी में इस प्रकार का अहसास डालते हैं कि उनके मन में कभी भी विरोध की भावना न आये । जैसे यदि कोई दलित बंधुवा मजदूर है तो वह अपने बेटे और पत्नी को भी बंधुवा मजदूर बना देता है । कर्ज के बहाने यह चलन पीढ़ी दर पीढ़ी उस परिवार में चलता रहता है ।

उपर्युक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि दबे वर्गों में मानसिकता ऐसी बनी रहती है कि वे अपनी वर्तमान स्थिति में परिवर्तन के बारे में सोच ही नहीं पाते । इन मानसिकता को बनाए रखने में घरेलू अनौपचारिक शिक्षा और घर का वातावरण मुख्य भूमिका निभाते हैं ।

दूसरी ओर पुरुष का पक्ष है । वे जेण्डर भेदभाव को क्यों नहीं तोड़ते ? इसके लिए हमें यह याद रखना होगा कि हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है । यहाँ भेदभाव निष्पक्ष नहीं है । इससे सत्ता का बँटवारा होता है और ज्यादा ताकत या शक्ति पुरुषों को मिलती है ।

ADVERTISEMENTS:

धन, सम्पत्ति, संसाधन, कार्यशक्ति आदि पर नियंत्रण अधिकतर पुरुषों का ही है, अत: उनको इसका पूरा-पूरा फायदा मिलता है । जिस व्यवस्था से उनका स्वार्थ जुड़ा, वे उसे भला क्यों बदलेंगे ? अत: इसके लिए हमें स्वयं ही प्रयास करने होंगे ।


Essay # 4. जेण्डर भेदभाव:

महत्व इस बात का नहीं है कि लोग जेण्डर भेदभाव क्यों करते हैं । महत्व इस बात का है कि वे कौन से कारण (कारक) हैं जो जेण्डर भेदभाव पैदा करते है, इनके आधार पर उनका प्रभाव कम करना या उन्हें दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए । भेदभाव के लिए प्रयोग होने वाले कुछ घटक अथवा कारक निम्न प्रकार से है-लिंग, धर्म एवं जाति, वर्ग एवं समुदाय, धन/सम्पत्ति, कद अथवा डीलडौल, नस्ल, राजनैतिक विश्वास/जुड़ाव, रंग आदि ।

जेण्डर भेदभाव कम करने हेतु सामान्य रूप से समुदाय स्तर पर जो उपाय किये जा सकते हैं, उनमें से कुछ का उल्लेख नीचे किया गया है:

१. जानबूझ कर किया जाने बाला भेदभाव:

पक्षपात एवं पूर्वाग्रहवश लोगों द्वारा जानबूझ कर किये जाने वाले कार्य जैसे- नीति विशेषज्ञों, अध्यापकों, विकास कार्यकर्त्ताओं, मालिकों आदि के द्वारा लोगों को शिक्षित कर उनके मन मस्तिष्क को बदलना चाहिए ।

२. असमान व्यवहार:

यह समाज में आमतौर पर देखने को मिलता है, जैसे- अमीर-गरीब, ऊँच-नीच, बड़ा-छोटा, बूढ़े-जवान, स्त्री-पुरुष, छुआछूत आदि के साथ विभिन्न समाज एवं वर्ग के लोगों का अलग-अलग व्यवहार होता है । इसे दूर करना चाहिए और सभी समूहों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिए ।

ADVERTISEMENTS:

३. व्यवस्थित एवं संस्थागत भेदभाव:

(क) ऐसे रीति-रिवाज जिनका महिलाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है । हालांकि ये समुदाय आधारित रीति-रिवाज तथा संगठित नीति निर्देश किसी पूर्वाग्रह के साथ या नुकसान पहुँचाने के इरादे से नहीं बनाये गये थे ।

(ख) व्यवस्थित भेदभाव को संस्थागत भेदभाव भी कहा जाता है । संस्थाओं एवं संगठनों की प्रक्रियाओं और रीतियों के भीतर सामाजिक, सांस्कृतिक व भौतिक मानक गहरे होते हैं । लोग इस तरह के भेदभाव को अनुभव तो कर सकते हैं लेकिन इस पर उँगली नहीं उठा सकते । यह ज्यादातर अनचाहा होता है ।

४. अन्तर्संस्थात्मक भेदभाव:

किसी एक क्षेत्र में जानबूझ कर किया गया भेदभाव दूसरे क्षेत्र में अनजाने भेदभाव के रूप में परिणत हो सकता है । मिसाल के लिए महिलाओं को शिक्षा व प्रशिक्षण के अवसर न मिलने पर वे तब नुकसान में रहती है चूँकि पदोन्नति या राजगार के लिए आवश्यक शिक्षण स्तर को आधार बनाया जाता है ।

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