बेनिटो मुसोलिनी पर निबंध | Essay on Benito Mussolini in Hindi

1. प्रस्तावना:

जिस तरह हिटलर ने जर्मनी के आत्मसाम्मान और गौरव की पुनर्स्थापना करके उसे विश्व के शक्तिशाली राष्ट्रों में ला खड़ा किया था, ठीक उसी तरह बुनिटो मुसोलिनी ने इटली के प्राचीन गौरव को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किया ।

सन् 1940 तक उसने आपने नेतृत्व गे इटली को विश्व के विकसित और साम्राज्यवादी देशों की पंक्ति में ला खड़ा किया । मुसोलिनी ने अपने क्रान्तिकारी और राष्ट्रवादी जिस दल की स्थापना की, उसे ”फासिस्ट” अर्थात् फासीवाद कहा जाता है ।

2. जीवन वृत्त एवं उपलब्धियां:

बुनिटो मुसोलिनी का जन्म सन् 1883 में उत्तरी इटली के रोमान्या गांव के लुहार परिवार में हुआ था । उसके पिता उग्र क्रान्तिकारी विचारधारा के थे, जिसका प्रभाव मुसोलिनी पर पड़ा । उसकी माता अध्यापिका थी । नार्गल स्कूल में भरती होने के बाद उसने वहां से शिक्षा पूर्ण कर अध्यापक की नौकरी कर ली ।

अअपने समाजवादी विचारधारा के अनुसार मजदूरों के संगठन बनाने तथा हड़ताल करवाने में उसने रुचि ली । जिनेवा विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा ग्रहण की । उन दिनों सरकार ने अनिवार्य रौनिक सेवा का नियम बना रखा था ।

सो उससे बचने के लिए मुसोलिनी स्विटजरलैण्ड चला आया । वहां पर कारीगर का काग करते हुए उसने मजदूर संघों की स्थापना करने के साथ-साथ हडतालें भी करवायीं, जिसकी वजह से स्विटजरलैण्ड की सरकार ने उसे देश निकाला दे दिया ।

23 वर्ष की अवस्था में वह इटली वापस आकर अध्यापक का कार्य करने लगा था । यहां भी उसने अपने क्रान्तिकारी कार्य जारी रखे, जिसके कारण उसे कारावास भी भुगतना पड़ा । कारावास से मुक्ति के बाद वह ट्रेन्ट {आस्ट्रिया} चला आया । वहां पर उसने ट्रेन्ट {आस्ट्रिया} को इटली में मिलाने हेतु अभियान चलाया ।

आस्ट्रिया सरकार ने उसे देश से निकाल दिया । वह इटली लौट आया और पत्रकारिता का काम करने लगा । 1912 में वह इटली के प्रमुख समाजवादी पत्र अवन्टो का सम्पादक बन गया था । 1914 में प्रथम महायुद्ध छिड़ने पर वह उसमें इटली के सम्मिलित होने का विरोधी था ।

बाद में वह इस युद्ध में साधारण सैनिक की भांति सम्मिलित हुआ और घायल होने के बाद सैनिक सेवा से मुक्त हो गया । युद्ध की समाप्ति के बाद वह साम्यवादी क्रान्तिकारी विचारों का विरोधी बन गया । मुसोलिनी इटली को नयी गुलामी से बचाना चाहता था ।

1919 में उसने भूतपूर्व सैनिकों और राष्ट्रभक्त बुद्धिजीवियों की एक बैठक बुलायी, जिसमें देश में व्याप्त अशान्ति और अव्यवस्था को दूर किया जा सके । उसने ”फासिस्ट” नामक पार्टी बनाकर अपने उग्रवादी और फासिस्ट विचारों से इटली की सम्पूर्ण जनता को अपना कट्टर समर्थक बना लिया । धनी लोगों ने इस संगठन को आर्थिक सहायता प्रदान की । सन् 1921 तक इसकी सदस्य संख्या 3 लाख से भी अधिक हो गयी ।

ADVERTISEMENTS:

1921 के चुनाव में फासिस्ट दल एक लोकप्रिय दल के रूप में उभरा था । मुसोलिनी ने अपने फासिस्ट गुटों को ”हथियारबन्द काली कुर्ती” में अनुशासित सैनिकों के दल का रूप प्रदान किया । उग्र राष्ट्रीयता की भावना पैदा करने के लिए अभियान छेड़ दिया । उसने साम्यवादियों से छोटे-मोटे संघर्ष किये, जिसमें उसे सफलता मिली । फासिस्ट दल के प्रचार से जनता उसकी पूर्णत: भक्त हो गयी । उसने इटली की अकर्मण्य सरकार को उखाड़ फेंकने का सकल्प लिया ।

27 अक्तूबर 1922 को रोम पर फासिस्ट दल के जवानों ने चढ़ाई कर दी । देश के प्रमुख स्थलों-रेल, डाक, तार आदि पर अपना अधिकार कर लिया । वहां के सम्राट ने अपने मन्त्रिपरिषद् में सम्मिलित होने का प्रस्ताव मुसोलिनी के पास भेजा ।

मुसोलिनी ने इसे अस्वीकार कर दिया और सम्राट से कहा कि वह सत्ता उसके हाथों सौंप दे । सम्राट के सामने सत्ता मुसोलिनी को सौंपने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं था । इस तरह 30 अक्तूबर 1922 को मुसोलिनी इटली का प्रधानमन्त्री बन गया । प्रधानमन्त्री बनते ही उसने शासन की सारी शक्ति अपने हाथों में ले ली ।

ADVERTISEMENTS:

शासन के महत्त्वपूर्ण पदों पर से विरोधियों को निकाल बाहर कर अपने समर्थकों की नियुक्तियां कीं । 1923 में उसने संसद में नया निर्वाचन कानून अपने हक में पारित करवा लिया । इस प्रकार 65 प्रतिशत मत पाकर उसने संसद में फासिस्ट दल को बहुमत का पात्र घोषित करवा दिया ।

चुनाव में धांधली का आरोप लगाने वाले विरोधी दल के नेता मेतिओवी की हत्या करवा दी । समाचार-पत्रों, हड़तालों पर पूर्णत: प्रतिबन्ध लगवा दिये । न्यायालयों में ज्यूरी पद्धति समाप्त कर दी । शिक्षा संस्थाओं की स्वतन्त्रता छीन ली । फासीवादी सिद्धान्तों के अनुसार पाठ्‌यक्रम लागू कर उसे पढ़ाना अनिवार्य कर दिया ।

नया निर्वाचन कानून 1928 में बनाया, जिसमें मतदाताओं का अधिकार केवल सूची के पक्ष और विपक्ष में मत देने का मात्र रह गया था । प्रतिनिधि सभी एक कठपुतली बन गये थे । लोकतन्त्र की हत्या कर मुसोलिनी का शासन पूर्णत: निरंकुश रह गया । उसने कहा कि- ”देश में केवल फासिस्ट दल ही जीवित रह सकता है; क्योंकि यही देश का उद्धार कर सकता है ।”

1938 में उसने सभी दलों, प्रतिनिधि सभा को महत्त्वहीन बनाकर शासन को फासीवादी सिद्धान्तों के अनुसार एकसूत्र में बांध दिया । मुसोलिनी का उद्देश्य युद्ध और क्रान्तिकारी प्रभावों से देश को मुक्त कराना था और देश की उत्पादन शक्ति को बढ़ाना था । उस समय इटली की मुद्रा व्यवस्था पतनोन्मुख थी । राज्य का बजट घाटे में था । मुद्रा का अवमूल्यन हो रहा था । राज्य के व्यय में भारी कटौती कर उसने 1928 में नये कर लगाकर बजट को सन्तुलित कर दिया था ।

मुद्रा का मूल्य स्थिर होकर वृद्धि की ओर बढ़ चला था । रेल-बजट का घाटा भी कम हो गया । युद्ध के दौरान विदेशी कर्जों का बोझ भी उसने हटा दिया । 1930 में सरकारी कर्मचारियों के वेतन में कटौती कर दी । औद्योगिक व्यवस्था में सुधार हेतु उसने छोटे-छोटे उद्योगों को विकसित किया । उसने विद्युत-शक्ति के उत्पादन पर विशेष बल दिया । बीमार उद्योगों को बन्द कर दिया । मजदूरों की सेवा-दशाओं में सुधार लाकर निजी और सार्वजनिक उद्योग-धन्धे प्रारम्भ किये ।

ADVERTISEMENTS:

कृषि उत्पादन में सुधार लाने के लिए उसने आयात पर भारी कर लगाकर विदेशों पर निर्भरता कम की और वैज्ञानिक पद्धति से कृषि में सुधार किया । राष्ट्र के बच्चों में राष्ट्रीयता का भाव कूट-कूटकर भरने के लिए उसने 8 से 14 वर्ष के बालकों के लिए ”बलिला” नामक बालचर संस्था की स्थापना की । इसके बाद ”अवान गार्डिसा” 14 से 18 वर्ष के बालकों के लिए थी ।

यहां से निकलकर बालक फासिस्ट दल का सदस्य या सैनिक बनता था । 12 वर्ष से कम तथा उससे अधिक आयु वाली लड़कियों के लिए अलग-अलग संस्थाएं थीं, जो राष्ट्रीय-भावना के विकास पर बल देती थीं । मुसोलिनी ने पोप के साथ समझौता कर चर्च की संस्थाओं का धार्मिक शिक्षा देने का अधिकार स्वीकार कर लिया । वह धर्म को राजनीतिक महत्त्व का विषय समझता था ।

मुसोलिनी ने अपने शासनकाल में हड़ताल और तालाबन्दी पर रोक लगाकर उत्पादन को नियमित किया, मजदूरों को सवैतनिक अवकाश देकर उनके लिए बीमा, चिकित्सा आदि की व्यवस्था की, जिससे उनकी दशा में काफी हद तक सुधार आया । बेरोजगारों को रोजगार मिला ।

रोम के प्राचीन स्मारकों का जीर्णोद्धार करवाकर उनकी सुरक्षा का इन्तजाम किया । सड़कों, विद्यालयों, बांधों आदि का निर्माण करवाया । यहूदियों को देश से निर्वासित कर उनकी हत्याएं तक करवा दीं । इस प्रकार मुसोलिनी की गृहनीति सफल रही और वह जनता में लोकप्रिय हो गया ।

ADVERTISEMENTS:

ADVERTISEMENTS:

मुसोलिनी ने जनसत्ता को अपने हाथों में लेने के बाद से देश में महायुद्ध से उत्पन्न निराशा, हीनता तथा अपमान की भावना को नष्ट करके इटली में अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा की स्थापना की । उसने विश्व के सामने यह सिद्ध किया कि इटली निर्बल नहीं है । मुसोलिनी ने पूर्व शासकों की भूलों को सुधारने का प्रयत्न किया ।

अपनी युद्ध-नीति में उसने अनेक राज्यों को जीतकर अपने अधीन किया । ग्रीस, अल्बानिया, इथोपीया इत्यादि को अपने कब्जे में लेकर द्वितीय विश्व युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की । जब द्वितीय विश्व युद्ध में इटली की भारी तबाही हुई, तो जनता उसके विरोध में हो गयी ।

25 जुलाई 1943 को उसे प्रधानमन्त्री के पद से हटाकर बन्दी बना लिया गया । जर्मनी की सहायता से वह मुक्त हो गया । समानान्तर सरकार बनाने की चाह लिये इटली लौटा, तो देश की जनता ने उसे उसकी प्रेमिका क्लारा पेटासी के साथ पकड़कर दोनों को मार डाला । उसके पश्चात् उन्हें मिलान के एक चौक में उलटा लटका दिया।

ADVERTISEMENTS:

3. उपसंहार:

मुसोलिनी ने यह साफ बता दिया था कि इटली को अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा के लिए और औद्योगिक समृद्धि की प्राप्ति के लिए यदि युद्ध भी लड़ना पड़े, तो वह इसे स्त्री की प्रसूति की तरह ही स्वाभाविक समझेगा । इंग्लैण्ड की तुष्टीकरण की नीति मुसोलिनी के तख्त का कील साबित हुई । मुसोलिनी कहा करता था- ”खतरे के बीच जियो ।”

Home››Personalities››